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कार्यस्थल पर यौन हिंसा के संदर्भ जब भी कोई  चर्चा  या  लेख  देखती  हूँ  तो  कई  बातें खुद  से  पूछती  और  जवाब देती रहती हूँ| पर दिमाग में जो लगातार कौंधता है वो ये कि आखिर करता कौन है ये  यौन  हिंसा?  क्या सबकी पहचान हो पाती है? आज तक मैंने इस सवाल को जितना उधेड़ा है उतना ही ये उलझा| एकदम खामोश घाग जैसा लगता है|आप सोच  सकते  है  इस  सीधे  से  सवाल  में  इतनी  क्या  उलझन  है  पर  मुझे  तो उलझन ही नहीं घुटन भी होती है| खासतौर पर तब जब चीफ जस्टिस के हालिया मामले पर जिस तरह की प्रारम्भिक प्रतिक्रियाएं आयी| इसके बाद मन में फिर वही सवाल जवाब “कौन” को लेकर शुरू हो गए तो सोचा आज बाँट लूँ शायद कुछ हल्का महसूस हो जाए|

मैंने अक्सर देखा है कि काम की जगह पर इस तरह की हिंसा करने वाले ज्यादातर शातिर इतने नियोजित और  तरीके से अपने हाथ पैर पसारते है कि उनके बारे में कभी ना तो चर्चा होती है और ना ही  भूले-भटके  उठने वाली चर्चा पर विश्वास अपने इस लेख से एक छोटी-सी कोशिश इन  जीवों  के  प्रकार  पर  रौशनी  डालने की ताकि जब कोई महिला बेहद असमंजस और साहस के बाद इनके इस बर्ताव का उलझे शब्दों में जिक्र करें तो हम में से कोई उस जिक्र को चर्चा और विश्वाश की नजर से देखे| 

शुरुआत करने से पहले बस इतना बता दूँ कि ये  सब  लिखने  का  मकसद  यहाँ  बड़ा  स्वार्थी  और सीमित है| ऐसे लोगों को भी उनकी शातिर तहों के पीछे से पहचान पाना, जो  संवेदनशीलता  का  लबादा  ओढे,  वाह-वाही लुटते हुए  अपना  खेल  खेले  जा  रहे  है  और  कभी  रडार  पर नहीं आते, जिसका  नतीजा  औरत की ख़ामोशी या बचने की जद्दोजहद जबकि उसे मिलना चाहिये हौसला और  हिंसामुक्त  माहौल  में  खुलकर  सांस लेने और मांगने का कुछ  बाते  पहले  ही  कहना  चाहूंगी न्याय प्रक्रिया के बारे में कोई बात नहीं रख रही हूँ|

वैसे भी आजकल न्याय प्रक्रिया की सुप्रीम पावर्स से मन बड़ा खट्टा है  ना  ही  मेरा  ये  मानना  है  कि जिनकी पहचान सरलता से हो जाती है उनके खिलाफ आवाज उठाना या न्याय मिलना सरल होता है| तीसरा, यौन हिंसा के कई प्रकार है जो द्विअर्थी संवादों से लेकर यौन हमले तक फैला है खैर बात करते है खुलकर सामने ना आने वाले शातिर खिलाड़िओ की|

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प्रचलित: जो सत्ता और मर्दानगी के नशे में चूर रहता है, जिसे सब पहचानते है और जो बेख़ौफ़ खुले रूप से इस तरह की हरकते करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है मेरा इशारा सुप्रीम इनजस्टिस की तरफ कतई नहीं है बाकि आप खुद समझदार है दुखद  है इस  तरह  के  लोगो  का  होना  पर इन्हें  पहचाना  जा  सकता  है  पर  इनके खिलाफ आवाज उठाना, न्याय की मांग करना और पाना आसान नहीं है पिछले दिनों जो कुछ भी दिल्ली, बंगलोर, अहमदाबाद, लखनऊ, मुंबई में जो कुछ भी प्रर्दशनकारियों के साथ हो रहा है वो इसकी सटीक मिसाल है पर ऐसे मामले में समानुभूति, विश्वाश, संवेदना, मनोबल, मिलने की सम्भावना होती है,  साथ  हो  सकता  है  जोखिम के रहते न मिले और रही न्याय की बात तो वो फिर कभी…| मेरा  ज्यादा  ध्यान  अन्य  प्रकारो  पर  है  जिन्हे पहचानना या यकीन करना थोड़ा मुश्किल होता है|

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सीधा साधा/ दोहरे व्यक्तित्व वाले: ये बड़े ही घातक किस्म के होते है जो अपनी सीधी साधी छवि जिसमें कई बार  सत्ताहीन कमजोर शिकार का रूप  भी शामिल  होता  है  का  प्रचार  प्रसार  करते  रहते  है  इनकी  खूबी  ये  होती  है  ये  सबके साथ  एक   से  नहीं  होते  ज़्यादातर  लोग  इनके  ऊपर  लिखित  रूप  को  ही  देखते  है जबकि किसी खास के साथ ये उस छवि से बहार अनर्गल व्यवहार करते है ताकि उनकी लम्बे समय से बनी छवि का फायदा उन्हें मिलता रहे महिला या तो हिम्मत ही नहीं कर पाती उस छवि के विपरीत उनके इस चरित्र पर बात करने की या कहती भी है तो समझादिया जाता है “आपको ग़लतफ़हमी हुई होगी” और ये इन का इन गलतफहमियों का आनंद लेते रहते है|

महा संवदेनशील सटीक शब्दावली और व्यव्हार के ज्ञाता: ये आत्म घोषित संवेदनशील पुरुष होते है जो बात दर बात से साबित करने से नहीं चूकते वो कितने जेंडर संवेदनशील है और दुसरो का दर्द उन्हें कितना बैचेन करता है इनकी शब्दावली और तर्क वितर्क इस पितृसत्तात्मक समाज पर आपको गदगद करते है बल्कि ये जिसके साथ यौन हिंसा करते है वो खुद यौन हिंसा झेलने के बाद खुद को समझा देती है “मुझे गलतफहमी हुई होगी” और कभी भूले भटके बार बार के प्रयास उन्हें चेताते भी है तो कुछ कहने या बात रखने की हिचकाहट इस महान पुरुष के प्रति आड़े आती रहती है|

जब कभी महिला ने कुछ कहा छवि के पिटारे में ये उक्त छवि निकली और आपका आरोप निरस्त|

दूसरी महिलाओ का इस्तेमाल करने वाले: इस तरह के पुरुष दूसरी महिला साथिओ को इंगित करते हुए या उनके सहयोग से आपसी सहमति से बने समीकरणों का प्रदर्शन या उद्दरण किसी अन्य महिला को लक्ष्य करके करते है और खुद सुरक्षित रहते हुए निरंतर दबी जबान में आघात करते रहते है इसमें महिला को आपत्ति में सबसे ज्यादा परेशानी और असमंजस होता हैं क्यूंकि या तो वो पुरुष इसे की बेचारगी (भुक्तभोगी) दिखाता है या व्यक्तिगत मामला पर दोनों ही अर्थो में उसका लक्ष्य महिला को ऐसे संदर्भो संवादोमें डालना होता है जो उसे पसंद नहीं होते  

छवि बनाकर रखने वाला सबको बहन मानने वाला: ऐसे पुरुष निरंतर अपनी स्व घोषित छवि बनाने में लगे रहते है की जब कोई  हिला इनके दूसरे आचरण पर सवाल करती है तो इनके अंदर का सदाचारी भाई बेहद ग्लानि और बेचारगी में चला  जाता है ऐसे में महिला खुद भी असमंजस में पढ़ जाती है की आखिर इस बेचारे को क्या खुद को इतनी सज़ा देनी या दिखानी चाहिए इनके आचरण में वैसे तो कोई बदलाव नहीं आता पर महिला जरूर इनके खुद के ग्लानि प्रचार से दबाब मे आ जाती है कई बार तो इनके अपनेप्रति सुनी इस शिकायत के परिणाम स्वरुप जो प्रचारित सजा ये खुद को देते और बताते है, महिला पर दोहरी हिंसा का काम करतीहै और नतीजा किसी को ना पता चले का बोझ महिला पर ही आ जाता है |

छवि बिगाड़ने वाला शुभचिंतक: ये सबसे शातिर और योजनाबद्ध जीव होते है जिनके धीरज की मिसाल देखी ही नहीं जा सकती सीधे तौर पर ये सबंधित महिला से तटस्थ, रूचि नहीं या फिर भला चाहने वाले शुभचिंतक नजर आते है और इन रूपको की आड़ मेंउसकी एक खास छवि बनाने या कहूं तो बिगड़ने  का  काम  करते  रहते  है  जैसे तटस्थ (अपनी मुसीबत थोड़ी बुलानी है इनसे आत्मीयता में), रूचि नहीं (कोई फायदा नहीं कुछ भी समझा लो), शुभचिंतक (मैं सारी बुराइयां और जोखिम लेता हूँ ताकि तुम बिगड़ैल ना रहो) आदि आदि और जब कभी उक्त महिला सम्बंधित व्यक्ति के बारे में कुछ कहे तो ऊपर दिए छविगत तर्क बड़े सहयोगी होते है की महिला ऐसा क्यों कह कह रही है और नतीजा जब कभी महिला ने कुछ कहा छवि के पिटारे में ये उक्त छवि निकली और आपका आरोप निरस्त|

खैर लिखने को तो और भी बहुत कुछ हैं पर अभी एक भारी थकान है मन में अब तक कानून बनाओ, उसमें सब कुछ श्रेष्ठ डालो और न्याय  सुनिश्चित कर दो की सोच और संघर्ष को जीते आ रहे थे अचानक न्याय के सर्वश्रेठ मंदिर के उच्च न्यायधीश पर कार्यस्थल पर यौन हिंसा को आरोप लगा और जिस तरह से कानून कि सभी प्रक्रियों – आंतरिक कमेटी का ना होना, उस कमेटी में बाहरी विशेषज्ञ का ना होना, प्रक्रिया को एक खास तरह से चलना और फिर क्लीन चिट देना को ताक पर रख दिया गया और उसके शांतिपूर्वक विरोध को दिल्ली, बैंगलोर, अहमदाबाद, लखनऊ, मुंबई में जैसे रोंदा गया दुखद इतिहास का हिस्सा बनेगा सोचा था इस केस द्वारा न्याय की एक मिसाल कायम होगी जो स्वर्डीम इतिहास की गवाह बनेगी और दिखा देगी की न्याय के नजर में सब बराबर है पर ऐसा हो न सका पर महिला आंदोलन ने हमेशा आगे बढ़कर साथ, संघर्ष, जीत और बदलाव में यकीन रखा है हम बस पैंतरा बदलेंगे और तैयार इस बार कानून नहीं, कानून के लागू होने पर जोर है अब तक आंदोलन राज्य/स्टेट के साथ मिलकर कानून बनता रहा है इस बार स्टेट से टक्कर ही सही मकसद तो न्याय से है तब तक लड़ेंगे जीतेंगे और ऐसे छुपे शातिरों के खिलाफ सम्बल देंगे हर हिचक, ग़लतफ़हमी, सरसराहट और आवाज को| 


तस्वीर साभार : naco.org

Neetu Routela lives in Deilhi and has completed Information communication from Delhi University. She has completed her PG in political science and library and information science and currently working with Feminist Resource and Knowledge Centre from 13 years.

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