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“उन्होंने मेरी सूरत बदली है, मेरा मन नहीं…” यह डायलॉग हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म छपाक के ट्रेलर से है, जिसकी निर्देशिका मेघना गुलज़ार हैं और मुख्य भूमिका दीपिका पादुकोण निभा रही हैं। दीपिका इस फिल्म में एक एसिड अटैक सरवाईवर मालती का किरदार निभा रही हैं। मालती की यह कहानी काफी हद तक एसिड अटैक सरवाईवर लक्ष्मी की कहानी से प्रेरित है।साल 2005 में पंद्रह वर्षीय लक्ष्मी पर एक 32 वर्षीय व्यक्ति ने एसिड अटैक किया था, जिसका कारण बस इतना था कि लक्ष्मी ने उसे ‘न’ कहा। ज़ाहिर है कि पितृसत्तात्मक समाज में ‘स्त्री की न’ को पुरुष अपने अहंकार पर सीधा वार समझते हैं।

‘उसने मुझे न कहा तो कहा कैसे?’ – पितृसत्ता के इस ज़हरीले विचार से अक्सर कई अपराधों की शुरुआत होती है। ऐसा ही एक अपराध एसिड अटैक भी है।

तो क्या एसिड अटैक सिर्फ जान से मारने के इरादे से किया जाता है ?

जवाब है, नहीं ! थोड़ा गहराई से सोचें, तो हम जानेंगे कि जान से मारने के और भी बहुत से तरीके हो सकते हैं। लेकिन एसिड फेंकने का मकसद महज़ जान लेना नहीं होता, बल्कि इसका असली मकसद उस लड़की से उसकी पहचान, उसका आत्मविश्वास, समाज में सामान्य नागरिक की तरह जीने का उसका हक़ छीन लेना है, जिसने ‘न’ कहने या विरोध करने की जुर्रत की। और एसिड ऐसी किसी भी लड़की की ज़िंदगी आसानी से बर्बाद कर सकता है, इसीलिए भी क्योंकि यह ख़तरनाक हथियार बहुत सरलता से और बहुत सस्ते में किसी भी लोकल दुकान से ख़रीदा जा सकता है।

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पहले भारतीय कानून एसिड अटैक को अलग से एक अपराध न मानते हुए, आईपीसी के सेक्शन 320 के तहत घोर आघात में शामिल करता था। मसलन किसी के शरीर को गम्भीर रूप से आघात पहुँचाना, आँखें फोड़ देना, या किसी भी अंग को इस तरह से चोट पहुँचाना कि सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो जाए।

इसकी अधिकतम सज़ा सात सालों का कारावास थी, सेक्शन 326 के तहत एसिड अटैक के गम्भीर मामलों में आजीवन कारावास या लगभग दस सालों तक के कारवास की सज़ा दी जा सकती थी लेकिन सेक्शन 326 सिर्फ एसिड अटैक के लिए सज़ा निर्धारित नहीं करता था और अधिकतर जिन मामलों में सेक्शन 326 लगाया जाता था, अगर उनमें पीड़ित की एसिड अटैक के कारण मृत्यु नहीं हो जाती थी तो अपराधी को दस सालों से कम की ही सज़ा मिलती थी। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि सेक्शन 326 तभी लगाया जाता था जब घोर आघात के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो सकती हो, और सेक्शन 326 ‘एसिड फेंकने की कोशिश’ के अपराध को कवर नहीं करता था।

‘उसने मुझे न कहा तो कहा कैसे?’ – पितृसत्ता के इस ज़हरीले विचार से अक्सर कई अपराधों की शुरुआत होती है।

साल 2006 में एसिड अटैक सरवाईवर लक्ष्मी ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दर्ज कराते हुए एसिड अटैक के विरुद्ध कानून में बदलाव के साथ ही, पीड़ितों को उचित सहायता प्रदान कराने की माँग की। लक्ष्मी के केस ने कुछ महत्वपूर्ण बदलाव लाने में मदद की, मसलन सरकार द्वारा एसिड अटैक के खिलाफ बेहतर कानून बनाना और पीड़ितों के लिए पुनर्वास योजनाओं को शुरू करना।

एसिड आसानी से उपलब्ध न हो सके, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश भी दिए। एसिड को बेचने पर मनाही है, इसे बेचने के लिए यह ज़रूरी है कि विक्रेता एक रजिस्टर में एसिड की बिक्री से सम्बंधित जानकारियाँ दर्ज करता रहे, जैसे एसिड किस व्यक्ति को बेचा गया, उसका नाम, पता, कितनी मात्रा में एसिड बेचा गया, इत्यादि।

सभी विक्रेताओं के लिए यह नियम है कि वे एसिड को तभी बेच सकते हैं – अगर एसिड ख़रीदने वाला व्यक्ति सरकार द्वारा मान्य फोटो आईडी दिखाए जिसमें उस व्यक्ति का पता भी दर्ज हो। एसिड ख़रीदने का कारण बताए। इसके सभी स्टॉक्स की जानकारी विक्रेता द्वारा एसडीएम को 15 दिनों के भीतर दी जानी चाहिए। 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को एसिड नहीं बेचा जाना चाहिए। अगर विक्रेता ने एसिड के स्टॉक की जानकारी न दी हो, तो एसडीएम स्टॉक को ज़ब्त करा सकते हैं और विक्रेता को 50,000 तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। एसिड बेचने और ख़रीदने से जुड़े किसी भी नियम का उल्लंघन होने पर एसडीएम द्वारा किसी भी व्यक्ति पर 50,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

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इसी तरह, जिन शैक्षणिक संस्थानों, रिसर्च लैब, अस्पतालों, सरकारी दफ़्तरों आदि को एसिड रखने की ज़रूरत होती है, उनके लिए यह गाइडलाइंस हैं कि – एसिड के उपयोग से सम्बंधित एक रजिस्टर रखा जाए और उसे एसडीएम के पास भी जमा कराया जाए। किसी व्यक्ति को ख़ासतौर पर एसिड की निगरानी करने की ज़िम्मेदारी दी जाए। अनिवार्य रूप से उन छात्रों या अधिकारियों की जाँच हो जो लैब या उस स्थान से बाहर निकल रहे हों, जहाँ एसिड का उपयोग किया जा रहा है।

लेकिन क्या इन नियमों का पालन किया जा रहा है ? क्या इस सम्बंध में विक्रेताओं को जागरूक किया गया है ? नहीं ! जिस एसिड को अगर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाए, तो पीड़ित के इलाज में लाखों रुपए लग सकते हैं, उसी एसिड की कीमत सौ रूपए भी नहीं ! इसी साल सितम्बर में सिर्फ दिल्ली शहर में ही 100 से अधिक दुकानों पर कार्यवाही की गई जहाँ गैर कानूनी रूप से एसिड बेचा जा रहा था। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़, साल 2015 में देशभर में एसिड अटैक के क़रीब 249 केस दर्ज किए गए हैं।

हमारे लिए फिल्म ‘छपाक’ सिर्फ मालती की कहानी हो सकती है। लेकिन असल में, चाहे मालती हो या लक्ष्मी, इनकी कहानी महज़ कहानी नहीं है, यह कईयों की ज़िंदगी है।

भारत में हर साल क़रीब 350 केस कानूनी रूप से दर्ज किए जाते हैं, जबकि एसिड सरवाइवर्स फाउंडेशन इंडिया द्वारा की गई रिसर्च के मुताबिक़, भारत में एसिड अटैक के लगभग 500 से 1000 मामले हर साल होते हैं, और इनमें वे केस तो शामिल ही नहीं हैं जिनकी रिपोर्ट समाज, परिवार या अपराधी के डर और धमकियों के चलते दर्ज ही नहीं कराई गई।

चूँकि एसिड अटैक से जुड़ा कोई सटीक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसीलिए यह पता लगाना भी बेहद मुश्किल है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कितनी अच्छी तरह से किया जा रहा है ? यह भी नहीं बताया जा सकता कि कानून के मुताबिक़ एसिड अटैक सरवाईवर को जो सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए, वे उन्हें मिल भी रहीं हैं या नहीं? कितनी सरवाइवर्स को शिक्षा मिली है, कितनों को रोज़गार मिल पाया है, इस सम्बंध में कोई डेटा नहीं है।

एक बार एसिड शरीर पर फेंक दिया जाए, तो इलाज बहुत लम्बा चलता है। पर शरीर के इलाज के अलावा, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाना भी ज़रूरी है। एसिड अटैक का सामना करने वाली सरवाईवर के लिए ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रह जाती, अगर सरवाईवर अपनी ज़िंदगी को पहले जैसा बनाने की कोशिश भी करे तो एक समाज के रूप में हम उन्हें कितना सहयोग देते हैं? सहयोग देते भी हैं या नहीं? अगर हम सहयोग देते, विक्टिम शेमिंग के बजाय सरवाईवर के साथ सामान्य व्यवहार करते, तो शायद उनकी लड़ाई इतनी लम्बी नहीं होती। हमारे लिए फिल्म ‘छपाक’ सिर्फ मालती की कहानी हो सकती है। लेकिन असल में, चाहे मालती हो या लक्ष्मी, इनकी कहानी महज़ कहानी नहीं है, यह कईयों की ज़िंदगी है।

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तस्वीर साभार : sanjeevnitoday

Writer, Blogger, Translator, History & Mythology Lover. Supporting #StopAcidAttack Campaign.

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