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गुजरात के भुज के एक छोटे से गांव की पांच किशोरी लड़कियां पितृसत्तात्मक समाज के नियमों को चुनौती दे रही है। ये लड़कियां हं भुज की ‘छकड़ा’ यानी ऑटोरिक्शा चलाने वाली ड्राइवर्स। इनके गांव के पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को बाहरी काम करने की आज़ादी नहीं है। तो आखिर क्या था जो इन छोटी बस्तियों की गरीब और जरूरतमंद परिवारों की लड़कियों ने छकड़ा ड्राइवर्स बनने की सोची। यह वजह थी इनके सपने और उन्हें पूरा करने का हौसला। ऑटो चालकों की पुरुषों की दुनिया में इन पांच लड़कियों की हिम्मत, संघर्ष और छकड़ा ड्राइवर बनने के सफर को इंडिया फ़ेलो के धर्मेश ने ‘द छकड़ा ड्राइवर्स ऑफ कच्छ’ नामक डाक्यूमेंटरी से बताने की कोशिश की है। महिलाओं के विकास के लिए काम कर रही भुज की एक गैर सरकारी संस्था, कच्छ महिला विकास संगठन (केएमवीएस) की मदद से ये लड़कियां आज ऑटोरिक्शा चलाती हैं।

जहां महिलाओं को घर से निकलकर कोई भी काम करने की आज़ादी नहीं है, ऑटोरिक्शा चलाने के लिए इन्हें और इनके परिवार को मनाना बहुत बड़ी चुनौती थी। केएमवीएस के किशोरी कार्यक्रम के लिए काम कर रही शबाना और राजवी कहती हैं कि जब भुज की बस्तियों में लड़कियों से पूछा गया कि क्या वे कुछ ‘अनोखा’ सीखना चाहती हैं, तो उन्होंने खुद ड्राइविंग सीखने की इच्छा जाहिर की। वे कहती हैं कि इन लड़कियों के परिवार को इस बात के लिए राज़ी करने के दौरान उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनका परिवार इस बात से बिल्कुल खुश नहीं था और उन्हें किशोरी सभाओं में भी जाने से मना किया गया। हालांकि वक्त के साथ धीरे-धीरे परिवारों ने अपनी सहमति दे दी।

इस किशोरी कार्यक्रम के अंतर्गत पहले 10 लड़कियों को चुना गया था। अपने परिवार और समुदाय के विरुद्ध जाकर पांच लड़कियों ने अपने सपनों को पूरा किया और आत्मनिर्भर बनी। राजवी कहती हैं कि लड़कियों को उनके घर जाकर समझाने के क्रम में उन्हें गालियां तक सुननी पड़ी। घर और समुदाय के पुरुष लड़कियों को पार्लर या सिलाई जैसे कामों की प्रशिक्षण देने के लिए कहते जिससे उन्हें बाहर जाने की जरूरत ही ना हो। आखिरकार, पांच लड़कियों को 40 दिन के प्रशिक्षण के लिए अहमदाबाद भेजा गया। यह फिल्म हमें इनके ड्राइवर बनने के उतार-चढ़ाव वाली कहानी को बताती है। 

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चांदनी पिछले दो सालों से ऑटो चला रही हैंं। वह बताती है कि शुरुआत में परिवार से छकड़ा चलाना सीखने की अनुमति तो मिल गई पर असल में रास्तों पर ऑटो चलाना अनिश्चित था। ऑटो चालकों की दुनिया में पुरुषों का वर्चस्व होने और महिलाओं के बाहर ना जाने की परंपरा के कारण, बिरादरी ने लड़कियों के अहमदाबाद जाकर प्रशिक्षण लेने और छकड़ा चलाने का पुरजोर विरोध किया। लड़कियों के परिवारों को भी उन्हें इजाजत देने की वजह से अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अपने सपनों को पूरा करने के लिए इन लड़कियों ने जीवन में कई बदलाव किए। समुदाय में जल्दी शादी के रिवाज के बाद भी, चांदनी ने अपनी शादी फिलहाल स्थगित कर दी है। वह शादी के बाद छकड़ा चलाने की बात को लेकर अनिश्चित है। वह कहती है कि जब आरटीओ में ड्राइविंग की परीक्षा दी, तो लगा कि लड़कियां भी यह काम कर सकती हैं। जबकि पहले घर से बाहर जाने के लिए कोई ना कोई उनके साथ होता था पर छकड़ा ड्राइवर बनने के बाद बाहर जाने के लिए उन्हें किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ती। वह एक दिन बस चलाना भी सीखना चाहती हैं।  

आशा भुज की इस महिला दल की एक और छकड़ा ड्राइवर हैं। वह बताती हैं कि अब पुरुष भी उन्हें सम्मान देते हैं और उनके इस निर्णय की तारीफ करते हैं। हालांकि शुरुआत में कई लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया पर अपने दृढ़निश्चय से आज वह पितृसत्तात्मक समाज के बनाए गए नियमों को बदलने में कामयाब हुई हैं। उनका मानना है कि बतौर छकड़ा ड्राइवर यह सफर पुरुषों से किसी भी मायने में अलग नहीं है। ना ही उन्हें किसी शोषण या दुर्घटना का सामना करना पड़ा। केएमवीएस द्वारा लड़कियों के लिए चुने गए प्रशिक्षक समीर कहते हैं कि उन्हें लड़कियों के छकड़ा सीखने पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। संस्थान के कहने पर वह यह काम पिछले कई सालों से कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश, कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जिन्हें ड्राइवर बनने की इजाज़त नहीं मिली। हमीदा अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद भी खुद से तीन साल छोटे भाई के विरोध के कारण घर पर हैं। केएमवीएस की सचिव अरुणा यह मानती हैं कि संस्था का काम लड़कियों को ऑटो चलाने में प्रशिक्षण देना नहीं बल्कि पितृसत्तात्मक समाज की रूढ़ियों को तोड़ने, आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने के लिए मानसिक रूप से तैयार करना है। बहरहाल, केएमवीएस की शबाना और राजवी जैसी कार्यकर्ता उम्मीद करती हैं कि ना सिर्फ ज्यादा से ज्यादा लड़कियां छकड़ा सीखें बल्कि किसी दिन भुज में लड़कियों का एक छकड़ा स्टैन्ड भी हो!   

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तस्वीर साभार : धर्मेश चौबे

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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