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साल 2019 के संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग के आंकड़ों पर आधारित संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ़) ने कोरोना महामारी के बीच मई 2020 में बढ़ती बच्चों की संख्या पर एक विश्लेषण जारी किया था। इस विश्लेषण में दुनियाभर में कोरोना महामारी की घोषणा के बाद लगभग 116 मिलियन बच्चों के पैदा लेने की संभावना जताई गई। यूनिसेफ़ ने इस विश्लेषण के माध्यम से चेतावनी दी थी कि कोविड-19 के रोकथाम के उपाय जीवन रक्षक स्वास्थ्य सेवाओं जैसे बच्चे के जन्म या देखभाल को बाधित कर सकते हैं, जिससे लाखों गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों को खतरा हो सकता है। कोरोना महामारी की घोषणा के बाद से नौ महीनों में यानी 11 मार्च से 16 दिसंबर तक अनुमानित रूप से सबसे अधिक बच्चों के जन्म होने वाले देशों में भारत शीर्ष पर है। भारत में महामारी की घोषणा के बाद 20.1 मिलियन बच्चों के जन्म लेने की आशंका है। चीन में 13.5 मिलियन, नाइजीरिया में 6.4 मिलियन, पाकिस्तान में 5 मिलियन और इंडोनेशिया में 4 मिलियन बच्चे पैदा होने का अनुमान लगाया जा रहा है। बता दें कि भारत महामारी के पहले ही बढ़ती जनसंख्या के अलावा नवजात मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर और बच्चों एवं महिलाओं में कुपोषण जैसी समस्याओं से जूझता आया है। ये समस्याएं कोविड-19 की स्थितियों के कारण बढ़ सकते हैं।

बीते दिनों ब्राजील ने महिलाओं को तब तक बच्चे न पैदा करने की सलाह दी है जब तक कि कोरोना महामारी का सबसे बुरा दौर नहीं बीत जाता। ब्राजील प्रशासन ने कहा कि दक्षिण अमरीकी देश को तबाह करने वाला कोरोना वायरस का वेरीएंट पुराने वेरीएंट के मुकाबले में गर्भवती महिलाओं को अधिक प्रभावित कर रहा है। इसलिए महिलाओं के गर्भधारण से बचने से उन्हें और बच्चे दोनों को बचाया जा सकेगा। पिछले साल से शुरू हुई कोरोना महामारी से आज कोई भी देश या व्यक्ति अछूता नहीं है। पिछले साल महामारी के शुरू होते ही भारत में महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर होते देखा गया था। जहां कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित देश ब्राजील अपने नागरिकों के हित में ऐसी सलाह दे रहा था, वहीं पहले से ही बढ़ती आबादी से जूझते और महामारी के प्रकोप के बावजूद भारत में केंद्र या राज्य सरकारों की ओर से ऐसी कोई दिशानिर्देश नहीं मिला।

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गौरतलब हो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अप्रैल 2021 तक के कोविड-19 एपीडेमिओलॉजिकल साप्ताहिक अपडेट के अनुसार दोनों ही देशों में कोविड-19 के तीनों वेरीअन्ट पाए जा चुके हैं जिससे गर्भवती महिलाएं अधिक प्रभावित हो रही हैं। इस अपडेट के अनुसार पिछले कुछ सप्ताहों में भारत में सबसे अधिक कोरोना के नए मामले पाए गए। हालांकि दोनों ही देशों में बड़े पैमाने पर संक्रमण को रोकने और बढ़ती मृत्यु दर के लिए सरकार के विफल फैसलों और लापरवाही की निंदा हुई और जिम्मेदार भी ठहराया गया। भारत कोरोना की दूसरी लहर के बाद अब ब्राजील को पीछे छोड़ चुका है। भारत में कोरोना महामारी के बीच यह समस्या बहुपक्षीय है और अलग-अलग स्थिति, आय, वर्ग और स्थान आदि पर निर्भर करती है। जहां महामारी की घोषणा होते ही कई परिवारों, विशेष कर अभिजात्य वर्ग ने लॉकडाउन में परिवार को बढ़ाने की योजना बना ली। महामारी के बीच गर्भवती महिला के चिकित्सा या देखभाल में कमी नहीं आने देने का आत्मविश्वास, परिवार के सामाजिक और आर्थिक अवस्था से भी जुड़ा है। एक ओर लॉकडाउन के कारण निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए बुनियादी जरूरतों के साथ-साथ यौन स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों भी मिलना मुश्किल हो गया, वहीं, दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग के पास ऑनलाइन माध्यम से अपनी जरूरतें पूरी करने के विकल्प मौजूद थे। 

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भारत की गिनती निम्न आय वाले देशों में होने के बावजूद, आर्थिक तंगी में भी बच्चे करने की निर्णय आम जनता की संसाधनों तक पहुंच, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित है।

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ऑनलाइन डॉक्टर, दवा, व्यायाम या गर्भवती मांओं के समूह से जुड़ने की सुविधा भले शहरी और संभ्रांत परिवारों के पास हो, निचले और अशिक्षित तबके का इनसे जुड़ाव होना असंभव ही होता है। बच्चों की संख्या में वृद्धि का सीधा संपर्क बाल विवाह से भी है और बाल विवाह का गरीबी और अशिक्षा से। कोरोना महामारी घोषित होते ही बच्चियों के स्कूल ड्रॉप आउट, बाल विवाह, मानव तस्करी, यौन शोषण, घरेलू हिंसा आदि की खबरें लगातार आती रहीं। यूनिसेफ़ के अनुसार इस दशक के अंत से पहले दस मिलियन अतिरिक्त बाल विवाह हो सकते हैं, जिससे इस प्रथा को कम करने के दिशा में की गई सालों की प्रगति खतरे में पड़ सकती है। दुनियाभर में, अनुमानित 650 मिलियन जीवित लड़कियों और महिलाओं की शादी बचपन में कर दी गई थी। इनमें से लगभग आधी शादियां बांग्लादेश, ब्राजील, इथियोपिया, भारत और नाइजेरिया में हुई।

भारत के मुकाबले अमरीका और ब्रिटेन जैसे विकसित और धनी देशों की बात करें, तो महामारी के बीच कुछ युवा बच्चे ना पैदा करने के फैसले पर विचार कर रहे हैं। इस प्रवृत्ति के पीछे जल्दी रिटायर होने की इच्छा और कोरोना महामारी से उपजी आर्थिक तंगी की चुनौतियां शामिल हैं। द गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट अनुसार ऑनलाइन पेंशन देनेवाली कंपनी पेंशनबी द्वारा किया गया शोध बताता है कि हर दस में एक 18 से 23 वर्ष के निसंतान युवाओं के बच्चे नहीं करने के निर्णय के पीछे प्रमुख कारण जल्दी रिटायर होने की योजना है। शोध में यह भी पाया गया कि औसतन अपनी कम कमाई वाले समकक्षों की तुलना में अधिक वेतन वाली नौकरियां करने वालों में यह प्रवृत्ति अधिक थी। टाइम में छपी सार्वजनिक नीतियों पर काम कर रही गैर सरकारी संस्था ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की जून की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि अमरीका में साल 2021 में जन्म लेनेवाले बच्चों की संख्या में पांच लाख तक की कमी होगी।

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पिछले साल ही सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल एण्ड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने साधारण महिलाओं की तुलना में गर्भवती महिलाओं में गंभीर कोविड​​​​-19 संक्रमण का खतरा होने से जुड़ी चेतावनी जारी की थी। सीडीसी ने पाया था कि गर्भवती महिलाओं को अन्य महिलाओं की तुलना में आईसीयू में भर्ती होने और मैकेनिकल वेंटिलेटर पर रखने की अधिक संभावना है। लेकिन भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने महामारी की शुरुआत से अब तक ऐसी कोई चेतावनी जारी नहीं की है। हालांकि देश में कोरोना महामारी के दूसरी लहर के बाद विभिन्न राज्यों में गर्भवती महिलाओं और बच्चों के संक्रमित होने और मौत की खबरें आ रही है। द हिन्दू में छपे प्रसूति और स्त्री रोग की वरिष्ठ विशेषज्ञ जयश्री गजराज के बयान अनुसार आज भारत में लगभग तीन में से एक गर्भवती महिला कोविड-19 संक्रमण का शिकार हो रही हैं। इन में से कम से कम 50 प्रतिशत महिलाओं में कोविड-19 के कुछ न कुछ लक्षण पाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल कभी किसी गर्भवती महिला को आईसीयू में रखने की जरूरत नहीं पड़ी थी। इससे पहले भारत की यूनिसेफ प्रतिनिधि यास्मीन अली हक देश में हर साल 27 मिलियन जन्म और 30 मिलियन गर्भधारण के साथ कोविड-19 के दौरान महिलाओं को गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय दी जानी वाली जीवन रक्षक सेवाओं को मौजूदा स्थिति में जारी रखने में कठिनाइयों की बात कर चुकी हैं।

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक चिकित्सकीय मासिक पत्रिका जामा पीडियाट्रिक में छपी वाशिंगटन और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा 18 देशों की लगभग 2100 महिलाओं पर किए गए एक विश्वव्यापी अध्ययन अनुसार, कोरोना संक्रमित गर्भवती महिलाओं में मृत्यु की संभावना कोरोना संक्रमण रहित गर्भवती महिलाओं की तुलना में 20 गुना अधिक थी। भारत की गिनती निम्न आय वाले देशों में होने के बावजूद, आर्थिक तंगी में भी बच्चे करने की निर्णय आम जनता की संसाधनों तक पहुंच, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित है। जिस देश में परिवार के ‘पूरा’ होने में बच्चों का होना अनिवार्य माना जाता हो और उनके जन्म को भगवान की इच्छा मान लिया जाता हो, वहां चिकित्सकीय जरूरत, आर्थिक तंगी और तर्क को ताक पर रख दिया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। साथ ही, रूढ़िवादी सोच और पितृसत्तात्मक नियमों में जकड़े हमारे समाज में आज भी महिलाओं का अपने जीवन के इस अहम फैसले में नगण्य हिस्सेदारी है। यौन स्वास्थ्य या यौन जीवन के बारे बातचीत वर्जित है और महामारी के बीच यह और भी प्रत्याशित हो गई है। केंद्र या राज्य सरकार की कोई चेतावनी या दिशा निर्देश के अभाव में दिशाहीन जोड़े समाज के नियम या समय का सदुपयोग करने की योजना बनाते नजर आ रहे हैं।

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तस्वीर साभार : UNICEF

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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