FII Hindi is now on Telegram

भारतीय परिपेक्ष में यह तर्क बहुत आसानी से दे दिया जाता है कि सभी महिलाएं एक ही तरह के शोषण का सामना करती हैं, इसीलिए उनकी लड़ाई सिर्फ पितृसत्ता से है। ऐसा कहना जातिगत भेदभाव को दरकिनार करना और सवर्ण वर्चस्व से मिलने वाले विशेषाधिकार नहीं पहचानना है। दलित महिलाओं और सवर्ण महिलाओं का शोषण ब्राह्मणवादी पितृसत्ता करती है लेकिन दलित महिलाएं जातिगत भेदभाव और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता दोनों शोषकों से एकसाथ जूझती हैं। इसीलिए यह लड़ाई सभी महिलाओं के लिए एक जैसी बिल्कुल नहीं है। जातीय पहचान को ध्यान में रखना ज़रूरी है वरना दलित महिलाओं के साथ जातिगत हिंसा कभी विमर्श में नहीं आ पाएगा जैसा कि हाथरस रेप केस में देखने में आया। 

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ दलित स्टडीज द्वारा साल 2013 में दलित महिलाओं की मृत्यु दर पर किए गए शोध का हवाला लेते हुए 2018 में जेंडर इनइक्वॉलिटी 2030 एजेंडा के तहत यूनाइटेड नेशंस वीमन की रिपोर्ट के अनुसार, “दलित महिलाएं सवर्ण महिलाओं के मुकाबले औसतन 14 साल कम जीती हैं।” आगे रिपोर्ट बताती है कि सामाजिक स्थिति के अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, उच्च जाति की महिलाओं और दलित महिलाओं की मृत्यु की औसत आयु के बीच 5.8 वर्ष का अंतर रहता है। ऐसा ही कुछ 2013 के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ दलित स्टडीज द्वारा किए गए शोध में पाया गया। इस शोध के मुताबिक जब दलित महिलाओं को एक जैसी सामाजिक परिस्थितियां दी गईं, जैसे स्वच्छता और साफ पानी तब भी दलित महिलाओं का जीवनकाल सवर्ण महिलाओं के मुकाबले 11 साल कम रहा।

दोनों ही रिपोर्ट्स बताती हैं कि दलित महिलाओं की जल्दी होनेवाली मौत में, उम्र में इस फैसले के पीछे स्वच्छता, साफ पानी आदि का न होना, ख़राब स्वास्थ्य सेवाएं, जैसी वजहें शामिल हैं। ये कारण भी वाजिब कारण ज़रूर हैं लेकिन एकमात्र नहीं। अगर हम कारणों का मूल्यांकन करें तो तीन अलग-अलग खांचों में बांटकर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है। मानसिक और शारीरिक परिस्थितियां, सामाजिक परिस्थितियां और आर्थिक परिस्थितियां।

और पढ़ें : जातिगत भेदभाव और कोरोना की दूसरी लहर वंचित तबको पर दोहरी मार है

Become an FII Member

दलित महिलाएं इस तरह सवर्ण पुरुष, सवर्ण महिलाएं,दलित पुरुष तीनों तरफ का शोषण झेलती हैं। तब मानसिक रूप से वे कमज़ोर या बीमार हो जाती हैं जिसका असर उनके शरीर पर, पड़ता है। सही और उचित स्वास्थ्य सेवाएं ना मिलने पर वे सवर्ण महिलाओं की उम्र से कम जाती हैं। 

1. मानसिक और शारीरिक परिस्थितिया

हर दिन किसी भी रूप में शोषण झेलना और बहिष्कृत महसूस करवाए जाने से अत्यधिक तनाव और गुस्सा व्यवहार में भरने लगता है जिसे ‘माइनॉरिटाइज़्ड स्ट्रेस’ कहते हैं। जाति का व्यवस्थित शोषण ‘इंटरजेनेरेशनल ट्रॉमा’ पैदा करता है यानि वह ट्रॉमा जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ‘पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस’ के रूप में आता रहता है। महिलाओं के साथ ये दोहरे रूप में आता है। जैसे जातिगत भेदभाव के साथ ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक शोषण भी। जीन पिजेट एक स्विस मनोवैज्ञानिक हैं जिन्होंने बच्चों के विकास पर शोध किया जिसमें उन्होंने ‘स्केमा’ की अवधारणा पर अपनी स्टडी केंद्रित रखी। ‘स्केमा’ हमारी मानसिक दुनिया के निर्माण खंड हैं जो हमें जानकारी की समझ बनाने में मदद करते हैं। वे प्रभावित करते हैं कि हम कैसे राय बनाते हैं और हम समुदायों के सदस्यों के रूप में कैसे व्यवहार करते हैं। हम बचपन से क्या देख- सुन रहे हैं। एक व्यक्ति की रूढ़िवादी मानसिकता भी यही स्केमा बनाते हैं जिससे बाद में उन्हें नई जानकारी स्वीकारने में दिक्कत होती है। उदाहरण के तौर पर सवर्ण महिलाओं या पुरुषों को जब यही सिखाया जाता है कि कैसे वे जातिगत रूप से श्रेष्ठ हैं तब वे कोई भी तरीके अपनाते हैं लेकिन श्रेष्ठता का भाव नहीं छोड़ पाते और जातिगत हिंसा करते हैं। ठीक ऐसे ही पुरुषों में जब महिलाओं से श्रेष्ठ होने की मानसिकता डाली जाती है तब वे भी पुरुष श्रेष्ठता नहीं छोड़ते। दलित महिलाएं इस तरह सवर्ण पुरुष, सवर्ण महिलाएं,दलित पुरुष तीनों तरफ का शोषण झेलती हैं। तब मानसिक रूप से वे कमज़ोर या बीमार हो जाती हैं जिसका असर उनके शरीर पर, पड़ता है। सही और उचित स्वास्थ्य सेवाएं ना मिलने पर वे सवर्ण महिलाओं की उम्र से कम जाती हैं। 

2. सामाजिक परिस्थितियां

समाज बहुत सारी इकाइयों का गठजोड़ है जिसकी अपनी संस्कृति, ढ़ांचा, सामाजिक नियम होते हैं और इनके बलबूते ही किसी की पहचान बनती है। कोई स्त्री कैसी होनी चाहिए, कोई पुरुष कैसा होना चाहिए वह ये समाज ही अपने नियमानुसार निर्धारित करता है। भारतीय समाज जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के के सहारे अपने काम करता है। किसे नौकरी जल्दी मिलेगी, किसको कितना सम्मान और गरिमा मिलेगी, किसकी अपनी ज़मीन और घर होगा ये सब इसी पर निर्भर है। चूंकि लेख का पूरा परिपेक्ष सवर्ण महिला और दलित महिला के इर्द-गिर्द है तब हम देखते हैं कि सवर्ण महिला और दलित महिला में किसी को मौका देना या चयन करना होगा तब वह मौका सवर्ण महिला को ही जाता है क्योंकि इस समाज में जाति ही सर्वोपरि है। यहीं से बहिष्कृत होने के भाव का पैदा होता है। वहीं, दलित महिला जो गरीब भी हो और उसके पास अपनी ज़मीन या कोई संपत्ति, संसाधन ना हो तब उसका जीवनयापन और भी मुश्किल होता है। सामाजिक जातीय पहचान संसाधनों की पहुंच में एक अहम भूमिका निभाती है।

और पढ़ें : रेप कल्चर और दलित महिलाओं का संघर्ष

3. आर्थिक परिस्थितियां

आर्थिक मजबूती ज़मीन, नौकरी आय, संपत्ति से सुनिश्चित होती है और इसे भी शिक्षा और पुरखों द्वारा अर्जित की गई ज़मीन सुनिश्चित करती है लेकिन दलितों से ज़मीन रखने का अधिकार सवर्णों ने हमेशा छीना, उनकी ज़मीनों पर हमेशा से कब्ज़ा किया गया है। वहीं, शिक्षा पर पाबंदियां भी किसी से छिपी नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार अनुसूचित जाति के पास देशभर की कुल 7.6 प्रतिशत संपत्ति में हिस्सा है। गरीब दलितों में यह स्थिति और भी गंभीर है। हमारा समाज ऐसा है जिसमें औरतों को संपत्ति का अधिकार संवैधानिक तौर पर तो है लेकिन जमीनी तौर पर इसे कोई नहीं अपनाता। ऐसे समाज में दलित महिलाओं के संपत्ति के अधिकार तो बिल्कुल न्यूनतम हैं। शोषण से मुक्त होने का एक तरीका खुद का भरण-पोषण है लेकिन संपत्ति और शिक्षा के अभाव में ऐसा हो नहीं सकता। आर्थिक कारणों की वजह से लड़कियां पढ़ाई भी नहीं कर पातीं। सरकारी विद्यालयों में एक हद तक वे शिक्षा प्राप्त भी कर लेती हैं लेकिन आज भी लड़कियों को पढ़ाना एक सामान्य विचार नहीं है जिसकी वजह से उनकी शादी जल्दी कर दी जाती है। साल 2013 की इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ दलित स्टडीज़ ही रिपोर्ट के अनुसार गरीब, ग्रामीण, दलित लड़कियों की शादी सवर्ण लड़कियों के मुकाबले 5.1 वर्ष के अंतर के साथ 18 उम्र से पहले कर दी जाती है। 

ये सभी कारण भी पर्याप्त कारण नहीं हैं। हम जितना समझ पा रहे हैं, अध्ययन कर पा रहे हैं समस्या उससे भी गहरी है। स्वच्छता और साफ पानी मानसिक, सामाजिक, आर्थिक परिसथितियों का निवारण नहीं है इसीलिए सवर्ण और दलित महिलाओं को एक बराबर ये सुविधाएं दी गईं तब भी मृत्यु दर में अंतर बना रहा। एक ही समाज की अलग-अलग वर्ग, जातियों से आती महिलाओं में मृत्यु दर के बीच इतना बड़ा फासला चिंताजनक है। एक सामाजिक पहचान के चलते स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच ना होना, शिक्षा ना देना, संपत्ति में हिस्सा ना होना मानव के प्राकृतिक अधिकारों तक की अवहेलना है यानि समाज का एक वर्ग/जाति दूसरे वर्ग/जाति को इंसान ही नहीं समझ रहा है। हमें यह सोचने की जरूरत है कि एक समाज और उससे पहले इंसान होने के नाते किस ओर हम चल रहे हैं। जिस समाज की नींव समानता, मानवता पर होनी चाहिए हमने उस समाज की नींव में जातिवाद, लिंगभेद भरकर खोखला कर दिया है।

और पढ़ें : ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और जातिवाद है दलित महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा की वजह


तस्वीर साभार : PTI

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply