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हम जब कभी भी हिंसा, भेदभाव और संघर्ष की बात करते हैं तो हमेशा महिला के संदर्भ में इसे समझने की कोशिश करते हैं। अगर हमारा विश्लेषण थोड़ा और गहरा हुआ तो हम जाति और वर्ग के नज़र से हाशिए में रहनेवाली महिलाओं के बारे में और उनसे जुड़े मुद्दों पर बात करते हैं और उनके संघर्ष की परतों को देख पाते हैं। लेकिन हमारी नज़र अभी भी विकलांग महिलाओं तक नहीं पहुंच पाती है और जिन लोगों की नज़र यहां तक पहुंचती भी है उनकी संख्या काफ़ी सीमित है। हमारे समाज में अगर कोई महिला है इसलिए उसे हमारे समाज में कभी न कभी ज़रूर किसी न किसी हिंसा का सामना करना पड़ता है, अगर वह किसी ख़ास जाति से है तो इस हिंसा का रूप अधिक क्रूर हो जाता है पर जब एक महिला विकलांग हो तो तब हिंसा का रूप कितना भयानक होगा यह हमारी सोच से परे है। अब तक महिला हिंसा को मैंने इस नज़रिये से नहीं देखा था। ऐसा नहीं कि मैंने कभी विकलांग महिला के अनुभवों को पास से नहीं देखा, बल्कि मेरे परिवार में कुछ लड़कियां विकलांग हैं पर ये ज़रूर था कि कभी भी विकलांग महिलाओं की समस्या के बारे में कभी नहीं सोचा।

हाल ही, हमारी स्वयंसेवी संस्था की तरफ़ से ग्रामीण क्षेत्रों में विकलांग व्यक्तियों को लेकर एक सर्वे का काम हमलोगों को दिया गया। इसके लिए जब मैंने गांव में घर-घर जाकर विकलांग लोगों से मिलना शुरू किया तब विकलांग इंसान के संघर्ष खासकर विकलांग महिलाओं के साथ होने वाली दिक़्क़तों को देखना-समझना शुरू किया। अब तक मैं बनारस के पांच से अधिक गांव में सर्वे कर चुकी हूं जिसमें बीस से अधिक विकलांग महिलाओं और लड़कियों से बात हुई या उनके परिवारवालों से बात हुई। इन बातों या ये कहूं कि उनके अनुभवों को सुनने के बाद हमारे समाज में ग्रामीण परिवेश के मज़दूर परिवार में रहने वाली विकलांग महिलाओं का संघर्ष कितना ज़्यादा है ये धीरे-धीरे समझ आने लगा। अगर बात करें उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले की तो साल 2011 की जनगणना के अनुसार विकलांग लोगों की संख्या 9,6,924 है।  

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इतना ही नहीं, विकलांग महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा का स्तर भी ज़्यादा देखने को मिला। जब मैं राने गांव की दलित बस्ती में तीस साल की अविवाहित विकलांग महिला से मिली तो उसके परिवार वालों ने उसका परिचय देते हुए कहा, “यह विकलांग है। इसका नाम मुन्नी (बदला हुआ नाम) है। पिछले जन्म का पाप है जो यह भोग रही है और हम लोगों के परिवार ने कोई बड़ा पाप किया है जो इसको भोग रहा है।” ये शब्द मुन्नी के पिता के थे। मुन्नी मानसिक दिक़्क़तों की वजह से चल नहीं पाती और न बोलने या कुछ समझ पाती है लेकिन कोई पिता अपनी बेटी के लिए ऐसा कैसे बोल सकता है यह ताज्जुब वाली बात थी। मुन्नी की मां ने बताया कि उसे कोई प्यार नहीं करता है, परिवार का रवैया उसके साथ अनचाहे जैसा ही रहता है।

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विकलांगता के मुद्दे पर गांवों में इस सर्वे के दौरान मैंने यह पाया है कि अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में विकलांगता को लेकर लोग पाप और पुण्य की बात में फंसे हैं। लोगों की आज भी यह मान्यता है कि विकलांगता इंसान के पिछले जन्म के बुरे कर्मों का फल होता है।

ह्यूमन राइट वॉच की साल 2018 में ज़ारी की गई एक रिपोर्ट Invisible Victims of Sexual Violence: Access to Justice for Women and Girls with Disabilities in India के अनुसार विकलांग महिलाओं के साथ हिंसा होने की आशंका ज़्यादा रहती है और उन्हें न्याय मिल पाना भी बहुत मुश्किल होता है। जब कभी भी किसी विकलांग महिला के साथ कोई हिंसा, ख़ासकर यौन हिंसा होती है तो गांव में अक्सर लोग यह कह देते हैं कि इसके साथ कोई क्यों यौन हिंसा करेगा। यह तो विकलांग है या ये सुंदर नहीं है। विकलांग महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को नजरअंदाज़ करना तो जैसे अपने समाज की आदत बन चुकी है। अब जब यौन हिंसा के लिए परिवार और समाज की ये सोच है तो हमलोग अनुमान लगा सकते है कि उन्हें साथ घर में होने वाली हिंसा जैसे, गाली देना, दुर्व्यवहार करना और मारपीट करने को कितनी गंभीरता से लिया जाता होगा।

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विकलांगता के मुद्दे पर गांवों में इस सर्वे के दौरान मैंने यह पाया है कि अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में विकलांगता को लेकर लोग पाप और पुण्य की बात में फंसे हैं। लोगों की आज भी यह मान्यता है कि विकलांगता इंसान के पिछले जन्म के बुरे कर्मों का फल होता है। उन्हें लगता है कि विकलांगता इंसान के बुरे कर्मों का फल है और इसलिए वे इंसान को बुरा मानकर उसके साथ किसी भी तरह से बुरा करने में पीछे नहीं हटते हैं। विकलांग महिलाओं के साथ घर में बुरे तरीक़े से बातचीत और भेदभाव करना तो मानो आम बात है और ये भेदभाव इतना ज़्यादा होता है कि ये विकलांग इंसान ख़ासकर महिलाओं के विकास के सभी रास्ते बंद कर देता है।

बीस साल की पूनम (बदला हुआ नाम) ने पोलियो होने के बाद जब घरवालों से उसने पढ़ाई की बात कही तो उनलोगों ने यह कहकर मना कर दिया कि अब उसे पढ़ाकर क्या करेंगे। शादी-ब्याह तो होगा नहीं ज़िंदगीभर और वह उन लोगों की छाती पर ही रहेगी पर पूनम पढ़ना चाहती थी। जब भी विकलांग महिला को उसके विकास के लिए अवसर देने की बात आती है तो लोग अपने हाथ पीछे खींचते दिखते है। इसपर जब मैंने कुछ परिवारों से बात की तो ज़्यादातर लोगों की चिंता यही थी कि विकलांग लड़कियों की वे शादी करवा पाने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए उन्हें पढ़ने या आगे बढ़ने के लिए भेजने में वे ख़ुद का नुक़सान समझते हैं। हालांकि, यह सोच सिर्फ़ इन परिवारों की नहीं हमारे समाज की भी, जिसे लगता है कि विकलांगों को अगर बढ़ाया गया तो उनके लिए अलग समाज का विकास करना होगा, क्योंकि हमारे इस समाज के तय किए गए किसी इंसान के जीवन की सफलता-विफलता के शादी वाले नियम में विकलांग हर बार फिट नहीं होंगे। इसलिए विकलांग को बेचारा और दयनीय समझकर समाज उन्हें अपने साथ लेकर आगे बढ़ने से कतराता है।

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हम जब गांव की या समाज की बात कर रहे हैं तो हमें समाज की हर परत या हर पहलू पर बात करनी होगी। अलग-अलग गांव और घर-घर जाकर सर्वे करने, विकलांग लोगों और उनके परिवार वालों से बात करने बाद मैं अब ये समझ पा रही हूं कि एक विकलांग इंसान के क्या संघर्ष हैं पर विकलांगता के साथ उनके अनुभव को सिर्फ़ एक विकलांग इंसान ही अच्छे से समझ सकता है और वही इसके बारे में मुझसे बेहतर तरीक़े से बात कर सकता है। लेकिन इस बात से पहले हमें ये भी समझना होगा कि हमने विकलांग इंसानों के लिए ख़ासकर ग्रामीण परिवेश के गरीब विकलांगों के लिए कोई रास्ता ही कहां बनाया है, जिसपर चलकर वे आगे आए और अपनी बात करें। चाहे ग्रामीण स्तर पर कोई बैठक, गोष्ठी या कार्यक्रम हो उनमें कभी भी बतौर विचारक या वक्ता हम विकलांग लोगों को शामिल होते नहीं देखते, क्योंकि उन्हें बात करने और अपने अनुभव साझा करने के लिए कभी बुलाया भी नहीं जाता है। अगर विकलांग लोगों को किसी कार्यक्रम में बुलाया भी जाता है तो ज़्यादातर वो कार्यक्रम विकलांग लोगों में कुछ चीजें मुफ़्त में बांटने के लिए होता है।

इसलिए ये ज़रूरी है की विकलांग लोगों और ख़ासकर महिलाओं को ग्रामीण स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों में बिना किसी भेदभाव के उनकी भागीदारी सुनिश्चहित की जाए और उन्हें विचारों को साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। यह सब सिर्फ़ तभी संभव हो पाएगा जब हम उनके प्रतिनिधित्व से पहले अपने और समाज के विचारों की बात करें, अपने नज़रिए पर चर्चा करें और विकलांगों के अनुभव उन्हें लिखने दें पर उनके साथ अपने अनुभव या अवलोकन को लिखने से कहीं भी पीछे न हटे। मुझे विश्वास है कि मेरे ये विचारों लोगों के विचारों तक विकलांगता के मुद्दे को पहुंचा पाएंगें और आमजन को प्रेरित करेंगें कि वे भी विकलांगता पर अभी समझ बढ़ाए और समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करें। हमें ये अच्छे से समझना होगा कि विकलांग लोगों के लिए अपने समाज को लायक़ बनाने के लिए हमें किसी दान की ज़रूरत नहीं बल्कि अपनी सोच को सकारात्मक बनाने की ज़रूरत है, जो विकलांग इंसानों को इंसानों की तरह बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करे।  

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तस्वीर साभार : Village Square

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