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भारतीय संगीत जगत की शुरुआत ऐसे वक्त में हुई थी जब महिलाओं का घर से बाहर कदम रखना एक सपने जैसा हुआ करता था। संगीत जगत से उभरते गीतों एक माध्यम बना महिलाओं को चार दीवार के बाहर की दुनिया को अनुभव करने का मौका मिल लेकिन उनके आकांक्षाओं को इन गीतों ने जगह देने से नकारा। अगर हम ध्यान दें तो पिछले कुछ दशकों के गीतों को सुनकर यह पता लगता है कि हमारे संगीत जगत ने कभी महिला संगीतकारों, गीतकारों, गायकों को अभिव्यक्त करने का उचित स्थान और अवसर नहीं दिया गया है। आज कल के कई गानों में लैंगिक भेदभाव, महिलाओं का ऑब्जेक्टिफिकेशन, रूढ़िवाद सोच हावी नज़र आती है। भले ही महिलाएं इसके ख़िलाफ़ अपनी नाराज़गी व्यक्त करती रहती हैं, लेकिन इस समस्या की गंभीरता की चिंता संगीत जगत को नहीं है। इस अज्ञानता का मुख्य कारण संगीत जगत से महिला संगीतकारों की गैर-मौजूदगी है। संगीत या फिल्म जगत को समावेशी और महिलाओं, क्वीयर समुदाय के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए अलग-अलग जाति, समुदाय, वर्ग से आनेवाली पर्याप्त आवाजों की उपस्थिति ज़रूरी है।

सोना महापात्रा बॉलीवुड की एक जानी-मानी गायिका हैं। वह अक्सर बॉलीवुड इंडस्ट्री में मौजूद लिंगभेद के खिलाफ बोलती नज़र आती हैं। उनके अनुसार गायिकाओं को गानों में ‘चार लाइनें’ देने से या सौ में से आठ गीत गवाकर संगीतकारों और गीतकारों का कर्तव्य खतम नहीं होता। अगर आंकड़ों को गौर से देखा जाए तो यह संगीत के क्षेत्र में मौजूद लिंगभेद की गंभीरता को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय आर्ट्स कलेक्टिव FEMWAV द्वारा साल 2016 से 2018 के बीच की गई स्टडी के मुताबिक बॉलीवुड में महिला संगीतकारों और निर्माताओं की संख्या पुरुष समकक्षों के तुलना में था 1:80 थी। गीतकार, संगीत निर्माता, साउंड इंजीनियर, प्रबंधकों इत्यादि जैसी भूमिकाओं में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाममात्र है।

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यह समस्या अमरीका जैसे तथाकथित प्रगतिशील और विकसित समाज में भी मौजूद है। वेबसाइट रोलिंग स्टोन के मुताबिक सिल्विया रोन अमरीका के 13 प्रमुख संगीत रिकॉर्डिंग कंपनियों में सिर्फ एक संस्था-एपिक रिकार्ड की इकलौती महिला अध्यक्ष हैं। कोचेला (coachella) जो कि अमेरिका का एक बेहद प्रसिद्ध सालाना संगीत समारोह है। वहां भी पुरुष गायकों को ज़्यादा मौका दिया है। बिलबोर्ड (Billboard) संगीत क्षेत्र की एक जान-मानी पत्रिकाओं में से एक है। इसने साल 1970 से अपने ‘हॉल ऑफ फेम’ में 439 गीतकारों को स्थान दिया जिनमें केवल 31 गीतकार महिला हैं। अमरीकी संगीत जगत में 2 फीसद से भी कम संगीत निर्माता महिलाएं हैं। फिलहाल, महिला गायकों की भारी लोकप्रियता के बावजूद लैंगिक भेदभाव के इस अंतर में और बढ़ोतरी आई है।

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संगीत या फिल्म जगत को समावेशी और महिलाओं, क्वीयर समुदाय के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए अलग-अलग जाति, समुदाय, वर्ग से आनेवाली पर्याप्त आवाजों की उपस्थिति ज़रूरी है।

सुरों का क्षेत्र हमेशा ऐसा नहीं था। कोलकाता की गौहर जान पहली कलाकार थीं जिन्होंने अपने गीतों को रिकार्ड किया। उस दौर में भी पुरुष संगीतकारों ने इस पर आपत्ति जताई थी। संगीत क्षेत्र में 3 मिनट के फॉर्मेट की रचना का श्रेय गौहर जान को ही दिया जाता है। इस दौर में अधिकतर गायिकाएं लेखन कार्य में भाग लेती थीं। इन शुरुआती दिनों में महिला संगीतकारों की मौजूदगी ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में संगीत के क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं के लिए कई रास्ते खोले। इशरत सुलताना और जद्दन बाई अपने क्षेत्र में सबसे प्रमुख संगीत दिग्गजों में से एक थीं लेकिन आज साल 2021 में भी हमारे सामने चुनिंदा महिला संगीतकारों के नाम ही मौजूद हैं। पुरुषों की तुलना में आज भी महिलाएं इस क्षेत्र में काफी कम हैं।

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रोलिंग स्टोन इंडिया के साथ हुई बातचीत में रिकॉर्डिंग इंजीनियर हीरल विराडिया ने बताया कि पुरुष गायक अकसर आश्चर्यचकित हो उठते हैं एक महिला इंजीनियर को उनका गाना रिकार्ड करते देख। पितृसत्ता ने महिला रचनाकारों की छवि बनाई है कि वे एक कम बुद्धि वाला प्राणी होती हैं जिन्हें हर परिस्थिति में एक पुरुष की जरूरत हो। इन भेदभावों ने पुरुष संगीतकार और निर्माताओं की बड़ी मदद की और वहीं महिलाओं को आगे बढ़ने से रोका। महिला वादकों को संगीत समारोह में उनके अधिकार और मान से वंचित रखा जाता है। महिला तकनीशियनों को अयोग्य समझना साधारण बात हो गई है।

संगीत जगत में महिला कलाकारों को भी उतना ही दुर्व्यवहार और भेदभाव का सामना करना पड़ता है जितना कि किसी आम महिला को। भारतीय-अमेरिकी गीतकार और गायिका अमांडा सोधी द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक भारती की म्यूज़िक इंडस्ट्री में करीब 70 फीसद महिलाएं यौन उत्पीड़न का सामना करती हैं। इस सर्वे में 100 महिलाएं शामिल थीं। वहीं, गायिका अलिशा चिनॉय ने भी #MeToo के दौरान संगीतकार अनु मलिक पर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। सोना महापात्रा, नेहा भसीन और श्वेता पंडित ने भी अनु मालिक पर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे लेकिन ये आरोप सिर्फ शब्द बनकर खबरों में कहीं गुम हो गए। जिन पुरुषों पर आरोप लगाए गए उनका करियर शायद ही प्रभावित हुआ लेकिन आवाज़ उठानेवाली महिलाओं के करियर पर असर ज़रूर होता नज़र आया, उन्हें चुप कराने की कोशिश की गई।

लिंगभेद सिर्फ महिलाओं के साथ नहीं होता। भारत जैसे देश में जाति, वर्ग, यौनिकता, धर्म, विकलांगता के बिना लिंगभेद पर बात करना अधूरा है। यही कारण है कि आज भी तथाकथित मुख्यधारा में दलित, बहुजन, आदिवासी, विकलांग, एलजीबीटी समुदाय से संगीतकार बहुत कम दिखने को मिले क्योंकि इस जगत को उनकी पहुंच से बाहर रखा गया है। संगीत की कोई सीमा नहीं है, लेकिन इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए हमने जिन कारणों की चर्चा की वे बेहद मायने रखते हैं।

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तस्वीर साभार: Forbes

मैं मधुरिमा माईती हूँ। कलकत्ता की हूँ, लेकिन रहती मैं सोशल मीडिया में हूँ। लिखना और चित्र बनाना मुझे बेहद पसंद है, लेकिन इंटरनेट पर बिल्लियों को ताड़ना ज़्यादा पसंद है। बाकी आम लोगों की तरह खाली समय में समय बर्बाद कर लेना एक स्वभाव बन गया है। कभी कभी कहीं से ढेर सारी प्रेरणा मिल जाती है और मैं Netflix खोल के बैठ जाती हूँ। अगर काम की बात करूं तो मुझे पितृसत्ता और Heteronormativity को शब्दों और तस्वीरों से भंग करना अच्छा लगता है।

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