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एडिटर्स नोट : यह लेख हमारी नई सीरीज़ ‘बदलाव की कहानियां’ के अंतर्गत लिखा गया पांचवा लेख है। इस सीरीज़ के तहत हम अलग-अलग राज्यों और समुदायों से आनेवाली उन 10 महिलाओं की अनकही कहानियां आपके सामने लाएंगे जिन्हें साल 2021 में पद्म पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। इस सीरीज़ की पांचवी कड़ी में पेश है पद्मश्री पप्पाम्मल की कहानी।

किसी किसान की छवि अपने मन में सोचिए। कहीं धूप में फावड़ा चलाते हुए, मेहनत करते हुए, पसीने से तरबतर। किसकी छवि आई? आपको कौन दिखा? आपको दिखा होगा एक दुबला- पतला आदमी जो बड़ी मेहनत से काम कर रहा है। उसने सिर पर गमछा लपेट रखा होगा, जिसकी उम्र करीब पचास से साठ साल के करीब होगी। वाकई, काफी सही सोचा लेकिन कुछ बदलाव है इसमें। पहले तो उम्र 100 के ऊपर कर दीजिए। अब उस आदमी को औरत कर दीजिए। एक काम करिए, नाम भी रख दीजिए, उस महिला किसान का तो, उसका नाम है-पद्मश्री पप्पाम्मल। पप्पाम्मल देश की सबसे बुजु़र्ग किसान मानी जाती हैं। उनकी उम्र 105 साल है। वह रसायन वाली खेती नहीं करतीं बल्कि खुद खाद बनाकर जैविक खेती करती हैं। सुबह चार बजे उठती हैं, साढ़े पांच बजे तक तैयार होकर अपने खेत में पहुंच जाती हैं। फिर पूरा दिन अपने खेतों को, फसलों को समर्पित कर देती हैं। उनकी उम्र को उनकी मेहनत का पैमाना ना मानिएगा। वह बुजुर्ग ज़रूर हैं पर पूरी हिम्मत से आज भी खेती में सक्रिय हैं। 

देश की आज़ादी से लगभग 33 साल पहले पप्पाम्मल का जन्म हुआ। साल 1914 में तमिलनाडु के कोयंबटूर के देवलापुरम् में। देश आज़ाद नहीं था। पिछड़ेपन का दौर था। पढ़ाई- लिखाई की कोई खास व्यवस्था नहीं थी। लिहाज़ा पप्पाम्मल कभी स्कूल नहीं गईं। उन्होंने जो भी गुणा-भाग या गिनती सीखी, खेल-खेल में सीखी। वह उस समय बहुत छोटी थीं, जब उनके माता-पिता गुज़र गए। पप्पाम्मल को देवलापुरम् छोड़ना पड़ा। वह अपनी दादी के घर थेक्कमपट्टी आ गईं। यहां उन्होंने परिवार की दुकान संभाली। अपनी दो बहनों का ख्याल भी रखा। वह उस समय भी बहुत मेहनती थीं। दुकान से होनेवाली कमाई को बचाकर 30 साल की उम्र में उन्होंने गांव में ही दस एकड़ ज़मीन खरीद ली। तब से ही वह खेती- किसानी में सक्रिय हैं। बचपन याद करते हुए उन्होंने द वायर से बातचीत में कहा, “हमें आराम करने या फिर खेलने का समय बमुश्किल ही मिलता था। हम लड़कियों को जुताई, बुवाई, सिंचाई, कटाई और फिर कटाई के बाद भूसा पिसाई जैसे सभी काम करने पड़ते थे।” उन्होंने यह भी कहा कि शादी के बाद ज़िम्मेदारियां दोगुनी हो जाती हैं। उन्हें घर के साथ बाहर का भी काम करना पड़ता था। महिलाओं को ऐसी ज़िंदगी ही सहन करनी पड़ती है। उनके पास कोई और विकल्प ही कहां है? वे ‘अच्छा खाना’ कभी- कभार ही खाते हैं। त्योहारों पर उनके यहां चावल खाया जाता है। ये ही अच्छा होता है।

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पप्पाम्मल ने शादी की लेकिन कोई बच्चा नहीं हुआ इसलिए उन्होंने अपनी बहन की शादी अपने पति से करा दी। अब वह अपनी बहन के बच्चों का ख्याल रखती हैं। पप्पाम्मल 2.5 एकड़ पर कृषि और जैविक खेती करती हैं। उनके फॉर्म से दो किलोमीटर दूर भवानी नदी बहती है। वह दाल, दलहन, सब्जी, बाजरा और रागी की खेती करती हैं। पिछले कुछ सालों से उन्होंने केले की खेती भी शुरू कर दी है। इतना ही नहीं, खेती के साथ- साथ पप्पाम्मल थेक्कमपट्टी में ही एक दुकान भी चलाती हैं। यहां वह अपने खेतों में उगी जैविक वस्तुएं बेचती हैं। खेती को लेकर उनकी समझ यूं ही नहीं बनी। यह बदलाव साल 1983 के बाद से आने शुरू हुए। वह कोयंबटूर जिले में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) से जुड़ीं। यह अविनाशीलिंगम महिला गृह-विज्ञान संस्थान के तत्वावधान से संचालित था। यहां उन्होंने जैविक खेती के बारे में और खेती करने की बारीकियां सीखीं। कह सकते हैं कि उन्होंने लैब वर्क को ज़मीन पर साबित कर दिया था। ऑन-फील्ड ट्रेनिंग ने उन्हें खेती की छोटी- छोटी बारीकियां सिखा दीं। बुनियादी प्रशिक्षण लेने के बाद वह केवीके की लोकल मैनेजमेंट कमेटी में लीडर बन गईं। लीडर बनकर उन्होंने गांव की दूसरी महिलाओं को खेती से जोड़ा। 

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कुछ समय बाद, लोकल मैनेजमेंट कमेटी, वैज्ञानिक सलाहकार समिति (SAC) बन गई। पप्पाम्मल इसकी सदस्य थीं। कभी स्कूल न जाने वाली लड़की अब वैज्ञानिक सलाहकार समिति की सदस्य थी। वह तमाम सेमिनार और कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेती हैं। यहां वह किसानों और आम लोगों को जैविक खेती की तकनीक और फायदों के बारे में बताती हैं। उन्होंने तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के साथ मिलकर भी काम किया। विश्वविद्यालय की तरफ से वह कई विजिट करने भी जाती हैं। विद्यार्थियों को जैविक खेती के बारे में बताती हैं। ‘विलेज स्टे प्रोग्राम’ के तहत बच्चे उनके फॉर्म में भी आते हैं। द हिन्दू से बात करते हुए वह बताती हैं कि उन्होंने जैविक कृषि क्यों चुनी। वह कहती हैं, “उर्वरकों और कीटनाशकों को लेकर मेरी अपनी नापसंदगी और डर है। जब खेती में केमिकल्स का खूब प्रयोग होने लगा, मैंने तब भी जैविक खेती जैसा प्राकृतिक तरीका अपनाए रखा। मैंने वो तरीके अपनाए, जो मैंने अपने पापा के खेत में सीखे थे। केमिकल्स वाली फसलें हमारी मिट्टी और ग्राहकों के लिए नुकसानदेह हैं। उन्होंने केवीके के अंतर्गत गाँव की महिला किसानों के लिए पहला ‘स्वयं सहायता समूह’ भी खोला।” 

6 फ़ीट लंबी, दमदार आवाज़ और मजबूत इरादों वाली पप्पाम्मल कॉफी या चाय नहीं पीतीं। सिर्फ गर्म पानी पीती हैं। पौष्टिक आहार खाती हैं। वह टूथपेस्ट की जगह नीम की दातून से दांत साफ करती हैं। यहां तक कि वह आज भी नहाने के साबुन की जगह मिट्टी और हाथ धुलने के लिए राख का इस्तेमाल करती हैं। पप्पाम्मल सिर्फ खेती में ही नहीं, राजनीति में भी खूब सक्रिय रही हैं। वह साल 1959 में थेक्कमपट्टी पंचायत की वार्ड मेंबर रहीं। करमदई पंचायत संघ में वह पार्षद रहीं। द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) की सदस्य और एम. करुणानिधि की प्रशंसक पप्पाम्मल को लगता है कि सिर्फ एक किसान का जैविक खेती करना मुश्किल है। इससे फसल तैयार करने और बेचने में दिक्कत आती है। किसानों को एक साथ आकर जैविक खेती करनी चाहिए। इससे लागत कम लगेगी और खेती का दाम अच्छा मिलेगा। ऑक्सफैम इंडिया की साल 2013 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कृषि क्षेत्र का 80 फीसदी काम महिलाएं करती हैं जबकि सिर्फ 13 फीसदी महिलाओं के पास खुद की ज़मीन है। ग्रामीण भारत में साठ से अस्सी फीसदी फसलों का उत्पादन, खेती से जुड़े अन्य काम महिलाएं करती हैं। इन्हीं महिलाओं को हमारे यहां किसान नहीं माना जाता और न ही उन्हें किसानों को मिलने वाले लाभ मिलते हैं। इसी पितृसत्तात्मक सोच के बीच पप्पाम्मल लगातार महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। वह गांववासियों में जागरूकता भी फैला रही हैं।

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मेरा नाम अदिति अग्निहोत्री है। मैं आईआईएमसी में "हिंदी पत्रकारिता" स्नातकोत्तर डिप्लोमा की विद्यार्थी हूँ। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से मैंने 'हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार' में स्नातक किया है। मेरा उद्देश्य जनसरोकार और हाशिये के समाज के लोगों के लिए पत्रकारिता करना है। उनकी बात मुख्यधारा की मीडिया में पहुँचाना है।

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