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क्या आपको याद है आपने अपने लिए पहली लिपस्टिक कब खरीदी थी ? मैं 19 साल की थी, कॉलेज का पहला साल था। मुझ जैसी कई और लड़कियां थीं जिन्हें काफ़ी कम उम्र से इतना सिखा दिया गया था कि लिपस्टिक लगाने के परिणाम होते हैं। देश में महिलाओं के खिलाफ़ होनेवाली हिंसा की तुलना में उनके लिपस्टिक लगाने पर अधिक प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, उनके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं। समाज ने इसी तरीके के पितृसत्तात्मक सोच का इस्तेमाल कर महिलाओं को ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ में विभाजित करने में सफलता प्राप्त की। ‘अच्छी’ विशेषण का उपयोग उन महिलाओं के लिए किया जाता है जो पितृसत्ता के नियमों के अनुसार अपने पहनावे पर ध्यान देती हैं और ‘बुरी’ उनके लड़कियों के संबंध में किया जाता है जो गहरे रंग की लिपस्टिक लगाती हैं या मेकअप करती हैं और अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहनती हैं।

‘मेकअप शेमिंग’ अंग्रेज़ी भाषा में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। इसका मतलब उस स्थिति से जहां एक व्यक्ति को मेकअप इस्तेमाल करने पर शर्मसार या अपमानित किया जाता है। ‘मेकअप शेमींग’ की प्रक्रिया घर से शुरू होकर स्कूल या कॉलेज से होते हुए दुनिया के हर कोने में मिल जाती है। पितृसत्तात्मक समाज के अनुसार महिलाओं का मेकअप करना या सजना-संवरना पुरुषों को बहकाने, आकर्षित करने के तरीके हैं। बहकाने का काम उन महिलाओं के स्वभाव से होता है जिनके चरित्र को यह समजा अलग-अलग तरह के तमगे देता आया है। इसी वजह से समाज मानता है कि लड़कियों को मेकअप और फैशन करने से दूर रखना चाहिए, नहीं तो वे अपने चरित्र के साथ घर के ‘सम्मान’ को भी डुबा देंगी।

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यह पितृसत्तात्मक समाज कहता है कि साधारण यानि मेकअप न करनेवाली लड़कियों से सिर्फ ‘इश्क़’ किया जाता है। मेकअप से लदी लड़कियों से फ्लर्ट तक ही बातचीत सीमित रखनी चाहिए। इंटरनेट के मीम अकाउंट से लेकर कॉमेडियन अकसर मेकअप शेमिंग को प्रोत्साहन देने में सफल होते हैं। इस मानसिकता का सामना महिलाओं और मेकअप नियमित रूप से इस्तेमाल करने वाले उन सभी लोगों को करना पड़ता है। इन्हें खारिज कर समाज अपने पितृसत्तात्मक मापदंडों को इन पर थोपता है। जैसे कि महिलाएं शृंगार पुरुषों के लिए करती हैं या मेकअप इस्तेमाल करने पर पुरुष अपनी मर्दानगी खो बैठेंगे।

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यह पितृसत्तात्मक समाज कहता है कि साधारण यानि मेकअप न करनेवाली लड़कियों से सिर्फ ‘इश्क़’ किया जाता है। मेकअप से लदी लड़कियों से फ्लर्ट तक ही बातचीत सीमित रखनी चाहिए।

आज की दुनिया में फिल्म, कला, सोशल मीडिया की मशहूर हस्तियां आमतौर पर अपने मेकअप-रहित चेहरे को पोस्ट कर ‘सेल्फ लव’ के उपदेश का प्रचार करते हैं। हो सकता है इनका इरादा बुरा न हो। प्रचलित धारणाओं के अनुसार मेकअप लगाने का अर्थ है कि लगाने वाला अपनी बदसूरती छिपा रहा है। यूट्यूब के मेकअप आर्टिस्टों को नियमित रूप से धमकाया, बेतुके मज़ाक का हिस्सा बनाया जाता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज के लिए उन सारी चीजों का उपयोग करना गलत है। हालांकि पितृसत्ता अपना दोहरापन यहां भी नहीं छोड़ती। इस समाज के अनुसार मुंहासे रहित और गोरी त्वचा, गुलाबी होंठ, काली आंखें, लंबी पलकें, बाल, सुंदर नाक, कान, सफेद दांत एक औरत में होने ज़रूरी हैं। ऐसा नहीं की सिर्फ भारत में ऐसे मापदंड पाए जाते हैं। जहां महिलाओं होती हैं, वहां इन मापदंडों का होना सामान्य है। सुदंरता के इन तथाकथित मापदंडों के कारण खोए हुए आत्मविश्वास को खरीदने की सुविधा पूंजीवादी और पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं को मेकअप के रूप में दी और अब वह महिलाओं की मेकअप शेमिंग कर उन्हें सज़ा भी दे रहा है।

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लंबे समय तक मेकअप बनानेवाली कंपनियों में केवल उन लोगों की ही चलती थी जो कभी मेकअप इस्तेमाल नहीं करते थे या जो केवल अपनी ज़रूरत के लिए मेकअप बनाते थे, यानि पुरुष और व्हाइट महिलाएं। इसीलिए आज भी मेकअप में कई खामियां रही हैं। मेकअप प्रॉडक्ट जैसे फाउंडेशन कुछ रंगों में ही बाज़ार में उपलब्ध होते हैं। ज्यादातर प्रॉडक्ट गोरी रंगत को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। मेकअप को समावेशी बनाने की चेष्टा कुछ अरसे से की जा रही है, लेकिन इन चेष्टाओं के परिणाम कुछ देशों में ही देखा जा रहा है। जैसे, अमरीकी कास्मेटिक इंडस्ट्री में न सिर्फ महिला बल्कि अफ्रीकी, लैटिन, एशियन, ट्रांस महिला अधिकारों के संख्या में बढ़ोतरी आई है।

भारत में आज भी मेकअप के क्षेत्र में रंगभेद, समलैंगिकों के प्रति घृणा, जातिवाद हावी है। इस पूरी इंडस्ट्री को कुछ वर्गों तक ही सीमित रखा गया है। हमें मेकअप शेमिंग को बंद करने की ज़रूरत है। मेकअप शेमिंग बंद करने का एक अर्थ है कि क्वीयर समुदाय के प्रति घृणा और विषाक्त मर्दानगी से छुटकारा। मेकअप के ज़रिए महिलाओं को अपने स्त्रीत्व, लैंगिकता पर प्रयोग करने का उपयुक्त मौका दिया जाता है। इससे ही थर्ड वेव फेमिनिज़म में लिपस्टिक फेमिनिज़म का ज़िक्र आया। यह नारीवाद स्त्रीत्व के उन पहलुओं को रीक्लेम करने में विश्वास करता है जिन्हें पहले शक्तिहीन और घृणा के नजर से देखा गया। हालांकि इसकी तमाम आलोचनाएं भी सामने आई हैं। नारीवाद महिलाओं को अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार देने के बारे में है, न कि महिलाओं के मेकअप इस्तेमाल करने पर उनके साथ भेदभाव करने के बारे में है। शेम करने की ज़रूरत है पूंजीवादी पितृसत्तात्मक सोच को।

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मैं मधुरिमा माईती हूँ। कलकत्ता की हूँ, लेकिन रहती मैं सोशल मीडिया में हूँ। लिखना और चित्र बनाना मुझे बेहद पसंद है, लेकिन इंटरनेट पर बिल्लियों को ताड़ना ज़्यादा पसंद है। बाकी आम लोगों की तरह खाली समय में समय बर्बाद कर लेना एक स्वभाव बन गया है। कभी कभी कहीं से ढेर सारी प्रेरणा मिल जाती है और मैं Netflix खोल के बैठ जाती हूँ। अगर काम की बात करूं तो मुझे पितृसत्ता और Heteronormativity को शब्दों और तस्वीरों से भंग करना अच्छा लगता है।

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