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महिला और लड़कियों को एक बात अपने जीवन में सुनने को ज़रूर मिलती है, “तुम यह काम नहीं कर पाओगी, तुम्हारें बस के बाहर की बात है, तुम कमजोर हो।” हमारे समाज के लोगों के बीच यह धारणा होती है कि महिलाएं कमजोर होती हैं। वे हर वह काम नहीं कर सकती जो एक पुरुष कर सकता है। उन्हें जीने के लिए एक सहारे की आवश्यकता पड़ती है। बिना पुरुष के महिला जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकती है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट 2021 के अनुसार, दुनिया में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा जिंदा रहने की क्षमता होती है। भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट कहती है कि भारतीय महिलाओं की जीवन आयु पुरुषों से अधिक हैं, लेकिन जब बात स्वास्थ्य की आती है तो भारतीय महिलाएं इसमें पीछे रह जाती है।

हमारे समाज में पूरे घर के लिए काम करने वाली, रोटी बनाने वाली महिला की जब अपने खाने की बात आती है तो वह बासी रोटी और पानी पीकर भी पेट भर लेती है। वही बहुत बुरी परिस्थितियों में वह परिवार को खिलाकर खुद भूखी भी रह जाती है। भारत में महिला को बलिदान की मूरत कहकर उससे हर वह चीज़ छीन ली जाती है जो एक इंसान के लिए आवश्यक है। स्वास्थ्य पुरुष का हो या स्त्री का हर व्यक्ति के लिए ‘जान है तो जहान’ का मंत्र ही सबसे ज़रूरी है। वहीं हमारे देश की सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था में महिला को लिंगभेद के चलते बहुत परेशानियों और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। खाने की थाली से लेकर जीवन की अन्य ज़रूरतों तक लड़के-लड़कियों का यह अंतर उसकी जिंदगी की शुरुआत से लेकर अंत तक चलता रहता है।

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क्या कहती है विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट 2021

कोविड-19 महामारी से घिरी दुनिया के लिए यह एक अच्छी खबर है कि विश्वभर में लोगों के जिंदा रहने की आयु में वृद्धि हुई है। साल 2019 में वैश्विक औसत जीवन प्रत्याशा 73.3 साल रही तो स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 63.7 साल थी। जीवन के पहलू में दुनियाभर में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा जीती है। इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में कोविड-19 को मात देने में भी महिलाओं की संख्या ज्यादा है। कोविड पॉजीटिविटी रेट महिलाओं में 51.3 प्रतिशत पाया गया और पुरूषों में 48.7 प्रतिशत का मिला। वहीं, जब मृत्युदर की बात आती है तो 57.6 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले 42.4 प्रतिशत महिलाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। यह आंकड़े दिखाते हैं कि महिलाओं ने महामारी में भी पुरुषों से ज्यादा जीवन की जंग जीती है।

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हाल ही में विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट 2021 के अनुसार, दुनिया में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ज्यादा जिंदा रहने की क्षमता होती है। भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट कहती है कि भारतीय महिलाओं की जीवन आयु पुरुषों से अधिक हैं, लेकिन जब बात स्वास्थ्य की आती है तो भारतीय महिलाएं इसमें पीछे रह जाती है।

भारत के संदर्भ यह रिपोर्ट दिखाती है कि भारतीय महिला तमाम तरह की असमानताओं को सामना करने के बावजूद भी जीवन की जंग में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा जीवन आयु रखती है। भारत में जीवन प्रत्याशा 70.8 साल रही और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 60.3 साल रही। भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाएं 2.7 साल अधिक जीती हैं लेकिन बात जब स्वस्थ जीवन की आती है तो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के जीवन में मात्र 0.1 साल का ही अंतर देखने को मिलता है। भारत उन देशों में शामिल नाम हैं जहां स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के मामले में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर सबसे कम है। उम्र के मुकाबले स्वस्थ जीवन में महिलाओं का अंतर उनकी उस सामाजिक स्थिति को भी बयान करता है जहां पर लड़की या महिला के स्वास्थ्य को कोई तरहीज नहीं दी जाती है। उनकी बीमारी को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। पितृसत्ता की सोच खुद महिला को उसकी सेहत के प्रति लापरवाह रवैया अपनाने की सीख देती है। महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच की कमी होना भी इसमें से एक है। इसमें जेंडर के साथ-साथ जाति, वर्ग, विकलांगता, क्षेत्र आदि के आधार पर भी महिलाओं की पहुंच स्वास्थ्य सुविधाओं तक कितनी है यह देखा जाना ज़रूरी है।

ग्लोबल जेंडर रिपोर्ट 2018 के अनुसार भारत में महिला स्वास्थ्य को बहुत कम प्राथमिकता दी जाती है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की आर्थिक स्थिति कम होना उनके स्वास्थ्य की स्थिति को प्रभावित करती है। महिला स्वास्थ्य में जेंडर के साथ जाति, वर्ग, विकलांगता की सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। यूनाइटेड नेशंस वीमन की रिपोर्ट भी इस बात को कहती है कि सवर्ण महिलाओं के मुकाबले दलित महिलाएं औसतन 14 साल कम जीती हैं। दलित महिलाओं की सामाजिक स्थिति उनकी शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों को अन्य सवर्ण महिलाओं के मुकाबले अधिक जटिल बनाती है। महिला की जातीय और धार्मिक पहचान भी उसको संसाधनों से दूर करने का काम करती है। महिला स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति उनके जीवनयापन पर भी आधारित होती है, घर और सामाज की व्यवस्था में उनका जीवन पिछड़ेपन पर बीतता है।

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क्यों होती है महिला के स्वास्थ की अनदेखी

दुनिया में भारत वह देश है जहां कुपोषण से ग्रस्त सबसे ज्यादा बच्चें हैं। गरीबी, आर्थिक असमर्थता के अतिरिक्त इन बच्चों में लड़कियों की संख्या कम हो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बेटी के मुकाबले बेटे को अधिक तरहीज देना इसका प्रमुख कारण है। भारत में पांच साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और 15 से 49 साल की उम्र की लगभग आधी महिलाएं को एनीमिया हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 2019-20 में बताया गया है कि 15 से 49 साल की महिलाओं के बीच एनीमिया के मामले ज्यादा देखे गए हैं। देश के लगभग 16 राज्यों में, पिछले सर्वे के मुकाबले इस बार के सर्वे में महिलाओं में एनीमिया के मामलों में बढ़ोत्तरी देखी गई। गर्भवती महिलाओं में 47.8 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक पाई गई।

लिंगभेद के कारण बचपन से ही एक लड़की के साथ घर-परिवार में अंतर किया जाता है। व्यस्क होने तक यह व्यवहार उसको पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में पीछे धकेल देता है। महिला स्वास्थ्य वह विषय है जिसकी पितृसत्तात्मक सोच के समाज में कुछ अहमियत नहीं है। महिला की सेहत को फिजू़लखर्ची बताकर उसे लगातार काम करने के आदेश दिए जाते हैं। आज भी महिला की शारीरिक बीमारियों पर खुलकर बात नहीं की जाती है। इसे शर्म का विषय मानकर और खुलकर बात न करने के कारण महिलाएं पीड़ा के भंवर में फंसी रहती है। महिला के प्रजनन स्वास्थ्य के मुद्दे पर बात न करने के कारण बहुत सारी लड़कियां कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में पहुंच जाती हैं। गर्भवती महिला के स्वास्थ्य के प्रति लाहपरवाही कर कई बार उसे मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है। अपने शरीर के बारे में निर्णय न लेने की क्षमता भी एक प्रमुख कारण है। स्वस्थ महिला स्वस्थ समाज का निर्माण करती है लेकिन महिला स्वास्थ्य की यह उपेक्षा हमारे समाज को बीमार बना रही है। स्वस्थ्य महिला ही देश के भविष्य को स्वस्थ्य कर सकती है। स्वस्थ आहार और स्वास्थ्य सेवाओं की सभी तक एकसमान पहुंच ही महिला की पोषण स्थिति में बदलाव ला सकती है।

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तस्वीर साभार : Sabrang India

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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