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बच्चे का जन्म लेना हमारे भारतीय परिवारों में किसी त्योंहार से कम नहीं होता। शादी-ब्याह, बच्चे ये कुछ ऐसे मौके होते हैं जिनका हमारा समाज बहुत ज़ोर-शोर से स्वागत करता है। यह सब स्वाभाविक है और समझ आता है मगर समस्या शुरू होती है बच्चे के जन्म के बाद। आमतौर पर, हमारे देश में बच्चे के जन्म लेते ही पति और पत्नी के बीच काम का बंटवारा हो जाता है। जहां मां को बच्चे को पालने के काम में मशगूल करवा दिया जाता है, वहीं पिता को उस बच्चे और परिवार के लिए पैसा कमाने के लिए। इस पूरी व्यवस्था को हमारा समाज बिना ऊंगली उठाए काफी सदियों से निभा रहा है। मगर सवाल ये है कि क्या यह व्यवस्था ठीक है? जब बच्चा मां और बाप दोनों का है, तो फिर उसे पालने की, उसका ध्यान रखने की, उसे बड़ा करने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ मां की क्यों है? बच्चे की देखरेख में पिता की ज़िम्मेदारी सिर्फ उसके लिए धन जोड़ने तक सीमित क्यों है और यहां पर ये बात गौर करने लायक है कि कामकाजी महिलाएं भी बच्चे पालती हैं। अगर वे ऐसा कर सकती हैं तो कामकाजी पुरुष ऐसा क्यों नहीं?

ये कुछ ऐसे सवाल है जिस पर न सिर्फ महिलाओं को बल्कि मर्दों को भी मंथन करने की ज़रूरत है। क्या मर्द पूरी ज़िंदगी सिर्फ पैसे कमाने वाली मशीन की तरह बिताना चाहते हैं? क्या वे अपने पिता की तरह, अपने बच्चों के साथ सिर्फ डर और पैसों की पूर्ति करने वाला रिश्ता बनाना चाहते हैं? क्या वे एक ऐसे पिता नहीं बनना चाहेंगे जिनके साथ बच्चे अपने मन की हर बात खुलकर साझा कर सकें और ऐसा करने के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि बच्चे के जीवन के शुरुआती दौर से ही वे उसके साथ समय बिताएं, जैसे की उसे खिलाना, उसकी नैपी बदलना, उससे बातें करना, उसके लिए रातों को जगाना, और न जाने ऐसे कितने ही काम जो सिर्फ ‘मां’ के लिए ही बंधे हुए हैं।    

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मगर जैसा कि हम सभी जानते हैं कि चाहकर भी किसी भी पुरुष के लिए ये सब करना आसान नहीं है। हमारे हमारा परिवार, हमारा पितृसत्तात्मक समाज, हमारा धर्म, हमारे रीति-रिवाज और यहां तक कि हमारा कानून भी मर्दों को इस ज़िम्मेदारी को देता नज़र नहीं आता। हमारा कानून ये मानता ही नहीं है कि किसी भी पुरुष के लिए पिता बनना एक बहुत ही सुखद एहसास होता है और उस एहसास के नतीज़न आने वाली जिम्मेदारियां सिर्फ पंद्रह दिन की नहीं होती, बल्कि जिंदगी भर की होती है। मगर अफ़सोस की बात तो यह है कि कानून के तहत, बच्चा होने पर किसी भी पुरुष को ज्यादा से ज्यादा 15 दिन की ही पेड छुट्टियां मिल सकती हैं और ये छुट्टियां भी सिर्फ उन पुरुषों को मिल सकती है जो सेंट्रल गवर्नमेंट के कर्मचारी होते हैं। क्या सिर्फ सेंट्रल गवर्नमेंट के कर्मचारियों को ही पिता बनने का सुख मिलता है? क्या बच्चे के पैदा होने पर अभिभावकों की जिम्मेदारी पंद्रह दिनों में खत्म हो जाती है? क्यों देश के हर पुरुष को, फिर भले ही वह सेंट्रल गवर्नमेंट का कर्मचारी हो या नहीं, उसे अपने बच्चे के जन्म लेते ही, पेड लीव पर, कम से कम कुछ महीनों का वक़्त बिताने का हक़ नहीं मिलना चाहिए?

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कामकाजी महिलाएं भी बच्चे पालती हैं। अगर वे ऐसा कर सकती हैं तो कामकाजी पुरुष ऐसा क्यों नहीं?

ये सोचने लायक बात है कि देश का कोई कानून (सेंट्रल सिविल सर्विसेज (लीव) रूल्स,1972 और कुछ स्टेट गवर्नमेंट के रूल्स को छोड़कर) पेड पेटर्निटी लीव्स का ज़िक्र तक नहीं करता है। वहीं, महिलाओं को मैटरनिटी बेनिफिट एमेंडमेंट एक्ट, 2017 के अंतर्गत बच्चा पैदा होने पर लगभग 26 हफ्ते की पेड छुट्टियां मिलती हैं। कोई भी ऐसी महिला जो एक ऐसी जगह काम कर रही है जहां 10 या 10 से ज्यादा लोग काम करते हैं तो उसे इन पेड छुट्टियों का फायदा मिलता है। गौरतलब है कि इस प्रावधान का लाभ उन्ही महिलाओं को मिलता है जो संगठित सेक्टर में काम कर रही हैं। हालांकि, सिर्फ 1 फ़ीसद कामकाजी महिलाएं ही इस प्रावधान का फायदा उठा पाती हैं। यही नहीं, एक महिला सेंट्रल गवर्नमेंट कर्मचारी को बच्चे के बड़े होने के बाद भी चाइल्ड केयर के लिए लगभग दो साल की छुट्टी मिल सकती है। जैसे कभी बच्चे की परीक्षा के लिए, उसकी तबीयत ख़राब होने पर, वगैरह-वगैरह। वहीं, इसके उलट, ऐसी कोई छुट्टी पुरुषों के लिए नहीं है।

पितृसत्ता से पोषित ऐसा भेदभाव पुरुषों की सिर्फ पैसे कमाने वाली तस्वीर को और मजबूती देता है और उन्हें अपने बच्चे के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने से रोकता है। कानूनन होने वाले इस भेदभाव की वजह से इस सामाजिक सोच को भी ताकत मिलती है जो ये मानती है कि बच्चों को पालना, उन्हें बड़ा करना, उनका ख्याल रखना, पैसों के अलावा उनकी सारी ज़रूरतों को पूरा करना फिर भले ही वह इमोशनल ज़रूरत हो या खाना बनाने की औरतों का ही काम है। देखा जाए तो एक तरीके से हमारा कानून मजबूर कर देता है माओं को बच्चे और करियर दोनों में से किसी एक को चुनने के लिए। 

यहां ये बताना ज़रूरी है कि देश की कुछ जानी-मानी कंपनियां पेड पेटर्निटी लीव्स देती है। फ़िनलैंड में नई माता और पिता दोनों को 7 महीने के पेड लीव्स मिलती है। स्वीडन में, नए माता-पिता को 480 दिनों की पेड छुट्टियां मिलती हैं, जिसमे से प्रत्येक माता-पिता के लिए न्यूनतम 90 दिन की छुट्टियां तय होती है। ऐसे में सवाल ये है कि हमारे देश का कानून कब और कैसे बदलेगा? 

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तस्वीर साभार : UNICEF

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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