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भारत में कोरोना महामारी की शुरुआत से ही महिलाओं के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। पुरुषों की तुलना में कमज़ोर सामाजिक और आर्थिक स्थिति में रह रही महिलाएं महामारी में शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक प्रभावित हुई हैं। ग्लोबल कंसल्टिंग फ़र्म डालबर्ग द्वारा भारत में कम आय वाले घरों की महिलाओं पर कोविड-19 के प्रभाव पर एक रिपोर्ट जारी की गई। इस सर्वेक्षण में शामिल हर दसवीं महिला ने खराब आर्थिक स्थिति के कारण अपने भोजन को सीमित करने या खाद्य वस्तु का पूरी तरह खत्म हो जाने की सूचना दी। इसके अलावा, 16 फीसद महिलाओं ने पीरियड्स के लिए पैड इस्तेमाल नहीं कर पाने और महामारी में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के बंद होने से 33 फीसद से अधिक विवाहित महिलाओं ने गर्भ-निरोधकों का उपयोग नहीं कर पाने की सूचना दी। आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना किसी व्यक्ति के संसाधनों तक पहुंच और उसके वर्चस्व से सीधे तौर पर जुड़ा होता है। परिवार में आम तौर पर महिलाएं आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर और प्राथमिकता की श्रेणी में सबसे नीचे होती हैं। ऐसे में अक्सर महिलाओं को अपने परिवार के लिए प्यार और त्याग के नाम पर खुद को मानवाधिकारों से वंचित रखने की परंपरा के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

हाल में जारी हुए गैर सरकारी संस्था ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में हर मिनट कम से कम 11 लोग भूख और कुपोषण से मर रहे हैं। यह दर कोविड-19 की वर्तमान वैश्विक मृत्यु दर यानी प्रति मिनट सात लोगों की मृत्यु से भी अधिक है। हालांकि गरीबी और अशिक्षा कुपोषण और भूखमरी से जुड़ी है, लेकिन इसमें सुधार करने के लिए सिर्फ ये कारक पर्याप्त नहीं है। भारत में महिलाओं के कुपोषित होने और खाद्य सामाग्री की कमी का संपर्क उनका परिवार में सबसे आखिरी और सबसे कम पोषित आहार खाने के प्रचलन से भी है। पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों के कारण, अमूमन महिलाएं खाद्य असुरक्षा से असमान रूप में प्रभावित होती हैं। पितृसत्ता महिलाओं को आखिर में खाने को अपना कर्तव्य मानने पर आश्वस्त करती हैं। अपने पौष्टिक आहार के साथ कोई समझौता न करना उनको खराब मां, बेटी या बहू साबित कर देता है। अधिकतर घरों में सबसे संतुलित आहार की थाली घर के पुरुष सदस्यों के लिए सुनिश्चित होती है। ऐसे में महिलाएं बचा हुआ कम पौष्टिक खाना खाने को बाध्य होती हैं जिससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य लगातार प्रभावित होता है।

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साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने उत्तर प्रदेश के दो जिलों के घरों में भोजन वितरण और खपत को नियंत्रित करने वाले मानदंडो और प्रथाओं का अध्ययन किया जो घर के सदस्यों, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों के खाने को प्रभावित करते हैं। सर्वेक्षण में शामिल हुए महिलाओं में से हर पांचवीं ने आर्थिक तंगी के कारण पिछले तीस दिनों से कम खाना खाने की बात बताई। पर्याप्त भोजन खरीदने में असमर्थ होने की वजह से हर चौथी महिला ने अपने भोजन के मात्रा को कम करने की सूचना दी। सर्वेक्षण में शामिल कुछ महिलाओं ने खाने की चीज़ें खरीदने के पैसे न होने के कारण बिना कुछ खाए पूरा दिन बिताने की बात बताई। इस शोध के अनुसार गरीबी के अलावा, काम के दबाव ने भी महिलाओं के भोजन की खपत को प्रभावित किया। दोनों जिलों की लगभग एक-चौथाई से अधिक महिलाओं को काम के दबाव के कारण दिन में खाने का समय नहीं मिल पाया। लगभग सभी महिलाओं ने अपने परिवार के हित में पुरुषों और बच्चों के लिए अपने भोजन के हिस्से को त्याग करने की प्रथा को न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि उचित भी ठहराया।

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अधिकतर घरों में सबसे संतुलित आहार की थाली घर के पुरुष सदस्यों के लिए सुनिश्चित होती है। ऐसे में महिलाएं बचा हुआ कम पौष्टिक खाना खाने को बाध्य होती हैं जिससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य लगातार प्रभावित होता है।

महिलाओं का कुपोषण भले आज सरकार के लिए मुद्दा बना हो, लेकिन न तो यह भारतीय घरों में चिंता का विषय है और न ही महिलाओं के स्वास्थ्य में कोई उल्लेखनीय सुधार हुआ है। आम तौर पर महिलाओं में कुपोषण पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। अक्सर कुपोषित माँएँ कुपोषित बच्चे को जन्म देती है, जिससे माँ और बच्चे का स्वास्थ्य खतरे में होता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के अनुसार 15-49 आयु वर्ग की 53 फीसद महिलाओं के तुलना में महज 23 फीसद पुरुष एनीमिक यानी खून की कमी से ग्रसित हैं। 40 फीसद महिलाएं हल्के अनिमिया, 12 फीसद मध्यम अनिमिया और 1 फीसद गंभीर अनिमिया से ग्रसित हैं। वहीं 12 फीसद पुरुषों को हल्के अनिमिया, 10 फीसद को मध्यम अनिमिया और 1 फीसद को गंभीर अनिमिया से ग्रस्त होने के रूप में चिन्हित किया गया है। साल 2020 की विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति की रिपोर्ट अनुसार भारत में कुल जनसंख्या का लगभग 14 फीसद यानी 190 मिलियन लोग कुपोषित हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि 15 से 49 वर्ष की प्रजनन आयु की 51 फीसद महिलाएं अनिमिया से ग्रसित हैं। एनएफएचएस-3 और एनएफएचएस-4 के बीच 10 वर्षों के अंतराल के बावजूद महिलाओं में अनिमिया की व्यापकता में अधिक बदलाव नहीं आया है। साल 2005-06 में यह 55 प्रतिशत से घटकर साल 2015-16 में 53 फीसद रहा।

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चूंकि कोरोना महामारी से पहले भी वैतनिक श्रम बल यानी पेड लेबर फोर्स में महिलाओं की कोई महत्वपूर्ण भागीदारी नहीं थी, इसलिए लॉकडाउन के कारण हुई आर्थिक मंदी में मूलभूत जरूरतों जैसे पैड या खाद्य सामाग्री की कमी संभावित है। पिछले साल मार्च से अक्टूबर की अवधि को कवर करने वाली डालबर्ग की रिपोर्ट अनुसार हर चार में से एक महिला को अबतक अपने काम का भुगतान पूरी तरह नहीं मिला है। वैतनिक श्रम बल में आंकड़ों की बात करें, तो देश में महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी पूरी तरह असंतुलित है। देश की आबादी का आधा हिस्सा होने के बावजूद किसी भी प्रकार के रोजगार में महिलाओं का योगदान 24 फीसद है जबकि वैतनिक श्रम बल में महज 28 फीसद। सेंटर फॉर मोनिट्रिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) की एक रिपोर्ट बताती है कि कोरोना महामारी की लगातार दूसरे साल के बाद रोजगार के नुकसान में जेंडर आधारित अंतर साफ तौर पर दिखाई देता है। महिलाओं की वैतनिक श्रम बल में मामूली भागीदारी होते हुए भी, रोज़गार जाने के मामले में उनकी हिस्सेदारी 23 फीसद रही। यह रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2021 तक 399 मिलियन से अधिक नौकरियों में से महिलाएँ लगभग 42 मिलियन नौकरियां कर रही थीं। लेकिन पिछले वर्ष कुल 6.3 मिलियन रोजगार नुकसान में से महिलाओं ने 1.5 मिलियन नौकरियां गवाई।

आंकड़ों के अनुसार कोरोना महामारी के दौरान मनरेगा से 12 मिलियन, जन-धन से 100 और पीडीएस से लगभग 180 मिलियन महिलाओं को मदद मिली। हालांकि यह गौर करने वाली बात है कि सरकार पीडीएस के लिए अब तक 2011 की जनगणना पर निर्भर करती है जो स्पष्ट रूप से पीडीएस सिस्टम में पंजीकृत नहीं करवा पाए आबादी को अलग कर देती है। इसके अलावा महिलाओं को अपने गतिशीलता पर प्रतिबंध, सुरक्षा की चिंता और बाहर के काम के अलावा घर के कामों को संतुलित रखने का दबाव होता है। मनरेगा के लाभार्थियों में कम से कम एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी होने पर प्राथमिकता दी गयी है। सरकार द्वारा इस वित्तीय वर्ष मनरेगा योजना के तहत अब तक की सबसे अधिक 90 करोड़ से ज्यादा रुपए खर्च की गई है। इसके बावजूद ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार मनरेगा में साल 2020-21 में महिलाओं की भागीदारी घटकर पिछले पांच सालों के सबसे निचले स्तर पर जा पहुंची।

कई शोध मुताबिक निम्न-आय वाले घरों की हाशिए पर रह रही महिलाएं जैसे मुस्लिम समुदाय, प्रवासी या एकल महिलाएं और साथी से अलग रह रही या तलाकशुदा महिलाओं को किसी भी आपदा में सबसे ज्यादा कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। डालबर्ग की रिपोर्ट अनुसार पिछले साल जहां निम्न आय वाले घरों की महिलाओं का रोजगार नुकसान 3-7 फीसद हुआ, वहीं यह मुस्लिम महिलाओं के लिए 13 और प्रवासी महिलाओं के लिए 10 फीसद रहा। रोजगारहीन संकटग्रस्त महिलाओं के लिए आश्रय सुविधा, स्वाधार गृह की बात करें तो ऑक्सफैम इंडिया देश के हर जिले में कम से कम 30 महिलाओं की क्षमता वाला एक स्वाधार गृह होने की जरूरत दर्शाती है। जबकि देश में अभी केवल 417 ऐसे गृह कार्यरत हैं जो जरूरत से लगभग आधी है। ऑक्सफैम इंडिया बताती है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्वाधार गृह में प्रति व्यक्ति की प्रतिदिन भोजन की लागत मात्र 31.23 रुपए है, जो इन आश्रयों की और वहाँ रहने वाली महिलाओं की खराब स्थिति बयान करती है। देश में मौजूदा जेंडर पे गैप, महिलाओं का गैर मान्यता प्राप्त क्षेत्र और अकुशल श्रम बल में भागीदारी, यौन हिंसा उनकी स्थिति को और बदतर बनाती है। पितृसत्तात्मक मानदंडो और रूढ़िवादी नियमों से बाहर निकलने से ही महिलाओं को आर्थिक स्वाधीनता मिल पाएगी और विकास का रास्ता सुनिश्चित होगा।

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तस्वीर साभार : BBC

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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