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एडिटर्स नोट : यह लेख हमारी नई सीरीज़ ‘बदलाव की कहानियां’ के अंतर्गत लिखा गया नौंवा लेख है। इस सीरीज़ के तहत हम अलग-अलग राज्यों और समुदायों से आनेवाली उन 10 महिलाओं की अनकही कहानियां आपके सामने लाएंगे जिन्हें साल 2021 में पद्म पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। सीरीज़ की अगली कड़ी में पेश है पद्मश्री अनीता पौलदुरई की कहानी।

भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में 10 साल की एक लड़की मैदान के किनारे खड़ी है। वह वॉलीबॉल और एथलेटिक्स के खिलाड़ियों को देख रही है। असल में उसे ये दो खेल बहुत पसंद हैं। लड़की ने सोचा है कि बड़ी होने पर वह इन दोनों में से एक खेल खेला करेगी। धीरे-धीरे साल बीतने लगता है। स्कूल के बास्केटबॉल कोच एन. संपत लड़की की हाइट देखकर समझाते हैं कि उसे बास्केटबॉल खेलना चाहिए। बेमन से ही सही पर वह मान जाती है। 11 साल की छोटी सी उम्र में वह बास्केटबॉल सीखना शुरू कर देती है। लड़की बास्केट में बॉल डाल- डालकर इतना नाम कमाती है कि मात्र 36 साल की आयु में पद्मश्री सम्मान पा जाती है। ये लड़की है, अनीता पौलदुरई। खास बात यह है कि अनीता के बार-बार सार्वजनिक मंचों पर कहने के बाद भी अब तक इन्हें अर्जुन अवार्ड नहीं मिला है। इसके पीछे वजह है कि खेल की दुनिया में सिर्फ कुछ खेलों का ही वर्चस्व है।

अनीता का जन्म 22 जून 1985 को चेन्नई में हुआ। स्कूल में पढ़ने के दौरान उनका झुकाव बास्केटबॉल की तरफ होना शुरू हुआ। फिर वह बीकॉम करने के लिए मद्रास विश्वविद्यालय पहुंची। उसी दौरान, उनके स्कूल कोच संपत ने एक क्लब बनाया, राइज़िंग स्टार क्लब। इस क्लब के लिए अनीता ने खेलना शुरू किया। स्थानीय स्तर पर उनका यह पहला डेब्यू था। खेलने के साथ- साथ वह लगातार पढ़ाई भी कर रहीं थीं। अन्नामलई यूनिवर्सिटी से उन्होंने एमबीए किया। 2003 में स्पोर्टस कोटा से उन्होंने दक्षिणी रेलवे ज्वाइन की। क्लब में खेलने के दौरान ही उन पर नेशनल टीम स्काउट की नज़र पड़ी। अनीता की तेजी- फुर्ती और मेहनत उन्हें पसंद आ गई। वह नेशनल टीम में चुन ली गईं। फिबा बास्केटबॉल को वह खुश होकर बताती हैं, “पहली बार भारत की जर्सी पहनना मेरे लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। इस भावना को शब्दों में बयां कर पाना बहुत मुश्किल है। जब मैं पहली बार देश के लिए खेलने उतरी तब मन में एक तरह की संतुष्टि थी।”

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फिर साल आया 2004। अनीता तब 19 साल की युवा थीं। उन्हें नेशनल टीम का कप्तान बना दिया गया। एक या दो साल नहीं बल्कि वह लगातार आठ सालों तक यह पद संभाले रहीं। साल 2009 में वियतनाम में एशियाई इंडोर गेम्स आयोजित किए गए। इसमें उन्होंने रजत पदक जीता। दो साल बाद, श्रीलंका के दक्षिण एशियाई बीच गेम्स में वह स्वर्ण पदक पर बाजी मार गईं। अगले ही साल, भारत के पड़ोसी देश चीन में तीसरे एशियाई बीच गेम्स को खेला जाना था, अनीता इसके लिए लगातार तैयारी कर रही थीं। साल 2012 में सबको पछाड़ते हुए उन्होंने चीन के हयांग प्रांत में स्वर्ण छंटा बिखेर दी। वह एक कप्तान और खिलाड़ी के तौर पर लगातार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहीं थीं। मई 2013 में पहले 3×3 FIBA एशियन बास्केटबॉल खेलों का आयोजन होना था। पहला विजेता हमेशा ही खास होता है। भारत इसका विजेता रहा और इस जीत का श्रेय गया, अनीता को। वह इसके काबिल भी थीं।

अनीता पौलदुरई, तस्वीर साभार: अनीता पौलदुरई के ट्विटर से

साल 2012 के अगस्त महीने में उनका चयन थाइलैंड में खेली जाने वाली अंतरराष्ट्रीय महिला प्रोफेशनल लीग के लिए हुआ। यहां उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया। अनीता कई इंटरनेशनल टूर्नामेंट भी खेल चुकी हैं। जैसे- एशियाई चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स 2006, एशियन गेम्स 2010। इसी बीच उनकी शादी भी हो चुकी थी। साल 2015 में एशिया कप खेलने के बाद उन्होंने मातृत्व अवकाश लिया। इस दौर तक बास्केटबॉल में ऐसी एक भी महिला खिलाड़ी नहीं थी, जिसने बच्चे को जन्म देने के बाद मैदान पर वापसी की हो। डर अनीता के मन में भी था, लेकिन उससे बढ़कर उनके मन में उत्साह था। उन्हें खुद पर विश्वास था कि सब सही होगा। उन्होंने रोज़ एक घंटा खुद को देना शुरू किया। वह खुद को फिट रखने के लिए रोज़ कसरत करतीं।

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साल 2017 में उन्होंने कमबैक किया। ऐसा करने वाली वह पहली खिलाड़ी बनी। इस साल तक भारत को बास्केटबॉल के डिवीज़न बी में डाल दिया गया था। अनीता ने सोच रखा था कि चाहे जो हो जाए, वह भारत की वापसी करा कर रहेंगी। बेंगलुरू में कजाकिस्तान के खिलाफ फाइनल मैच था। अगर भारत इस मैच में जीत जाता है तो वह डिवीज़न ए में आ जाएगा। ठीक ऐसा ही हुआ। भारत मैच जीत गया। इतना शानदार कमबैक कम खिलाड़ियों को ही नसीब होता है। वह साल 2000 से 2017 तक भारत के लिए खेलीं। इन 18 सालों में उन्होंने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। अनीता 9 एशियन बास्केटबॉल कन्फेडरेशन यानी ABC खेलने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी हैं। इतना ही नहीं, नेशनल चैंपियनशिप के 30 पदक भी इनके नाम हैं। एक खिलाड़ी के तौर पर खेलने के बाद उन्हें भारत की अंडर-16 टीम का सहायक कोच बनाया गया। आज वह रेलवे में चीफ वेलफेयर इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हैं।

साल 2017 में उन्होंने कमबैक किया। ऐसा करने वाली वह पहली खिलाड़ी बनी। इस साल तक भारत को बास्केटबॉल के डिवीज़न बी में डाल दिया गया था। अनीता ने सोच रखा था कि चाहे जो हो जाए, वह भारत की वापसी करा कर रहेंगी।

अनीता के व्यक्तित्व की खास बात ये है कि वह समग्रता में सोचती हैं। कई खिलाड़ियों को सिर्फ अपने प्रदर्शन से ही मतलब होता है। एक सच्चा कप्तान सबकी सोचता है। वह ऐसी ही एक कप्तान हैं। अनीता बास्केटबॉल खेल को आगे बढ़ाने और इसकी समस्याओं पर खुलकर बात करती हैं। द ब्रिज के लिए लिखे एक लेख में वह कहती हैं, “लड़कियों को खेलने के लिए आज़ादी और सुरक्षा चाहिए। उन्हें एक सुरक्षित नौकरी और खुद की पहचान चाहिए। मैं एक मां हूं। अगर मेरा बच्चा कभी बास्केटबॉल में करियर बनाना चाहेगा तो मैं दो बार सोचूंगी कि आखिर इसमें भविष्य क्या है? जो मेहनत मैंने इस खेल में की, अगर उतनी क्रिकेट या कबड्डी में की होती तो मैं इससे बेहतर जगह पर होती। पैसा ज़रूरी है। हमें प्रोफेशनल सेटअप चाहिए। हर खिलाड़ी प्रतिभावान है लेकिन एक टीम के तौर पर हमें इसे और बढ़ाना होगा। अगर कोई सही स्ट्रक्चर नहीं होगा, तब आप लोगों से उम्मीद नहीं कर सकते कि वे आएं और बास्केटबॉल खेलें। ये कहीं सिर्फ शो- ऑफ खेल बनकर न रह जाए।” 

अनीता को साल 2018 में तमिलनाडु सरकार ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया। इस साल के पहले महीने में उन्हें देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री मिला। पुरस्कार जीतने पर उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा, “इस सम्मान के मिलने को मैं अब तक पचा नहीं पा रही हूं। मैं बहुत ही खुश हूं और इस खुशी को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं हैं। ये सम्मान पहचान है कि मैंने मेहनत की है और इस बात का सबूत भी कि खिलाड़ी का अच्छा प्रदर्शन कभी भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है।”

अनीता ने एक ऐसे खेल में अपना करियर बनाया जो हमेशा से दरकिनार किया गया। जिसे हमारे देश के कई हिस्सों में 12वीं तक का खेल समझा जाता है। एक ऐसे समय में जबकि दूसरे खेल अपने चरम पर रहे, उन्होंने बास्केटबॉल को आगे बढ़ाया। उन्हें हमेशा इस बात का अफसोस रहा कि कुछ अधिक प्रसिद्ध खेलों के चलते उनके खेल और मेहनत को लंबे समय तक दरकिनार किया गया। लेकिन, हौसले की बात है कि उन्होंने कभी इस खेल का साथ नहीं छोड़ा। जब तक दिल ने कहा, उन्होंने ये खेल जीया। देर से ही सही, उनके खेल को आज पहचान मिल गयी है। पद्मश्री अनीता पौलदुरई हर उस खिलाड़ी का अभिमान है जिसने दिल से खेला है। वह प्रेरणा हैं उन सभी की, जो बास्केटबॉल में आना चाहते हैं। वह गर्व हैं उस खेल के अतीत का। वह रोशनी हैं एक खेल के उज्ज्वल भविष्य की।  

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मेरा नाम अदिति अग्निहोत्री है। मैं आईआईएमसी में "हिंदी पत्रकारिता" स्नातकोत्तर डिप्लोमा की विद्यार्थी हूँ। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से मैंने 'हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार' में स्नातक किया है। मेरा उद्देश्य जनसरोकार और हाशिये के समाज के लोगों के लिए पत्रकारिता करना है। उनकी बात मुख्यधारा की मीडिया में पहुँचाना है।

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