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हमारे यहां शादियों में या किसी फंक्शन में आमतौर पर सज-धजकर आने का बहुत रिवाज़ है। कोई इंसान अगर भारी कपड़े नहीं पहनता या समाज द्वारा स्थापित की गई परिभाषाओं में फिट नहीं बैठता तो उसे बहुत ही सहजता से जातिसूचक शब्दों के टैग से नवाज़ दिया जाता है। लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम के कामकाज़ की इस नई संस्कृति के चलते मुझे अपने पुराने दोस्तों और कंजिंस से मिलने का मौका मिला। कुछ दिन पहले मैं अपने एक कज़न के यहां गई थी। वहां मुझ से कहा गया, “तेरा रंग थोड़ा और काला होता तो तू बिल्कुल नी@#$ लगती। अभी भी ऐसा लगता है जैसे अफ़्रीका से आई हो।” इस दौरान अपने कुछ दोस्तों से मिली तो उनसे बात करते समय यह महसूस किया कि वे बातें कम करते हैं और मां-बहन पर केंद्रित गालियां ज़्यादा देते हैं। 

यह तीन अलग-अलग बातें हैं किंतु यह तीनों बातें एक कड़ी से जाकर जुड़ती हैं, वह है हमारी भाषा। भाषा को भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम कहा जाता है यानि जो आप सोचते और समझते हैं, उसे बताने के लिए आप शब्दों का प्रयोग करते हैं किंतु हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि हम किस प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। ऊपर मैंने अपनी और हम सबकी ज़िंदगी से जुड़ी तीन परिस्थितियां के बारे में बात की। अब जब ख़ुद इन शब्दों को सुनती और इनका इस्तेमाल लोगों को धड़ल्ले से करते देखती हूं तो पता चलता है कि यह कितने आपत्तिजनक हैं। 

जातिवादी शब्दों का इस्तेमाल

हमारे समाज में जाति प्रथा इतनी आम हो गईं है कि लोगों को, ख़ासकर तथाकथित उच्च जाति को यह लगने लगा है कि यही हमारी ज़िंदगी के संचालन के लिए सही व्यवस्था है। जातिवाद के चलते हमारे समाज के दलित-बहुजन-आदिवासी तबके को सवर्ण जातियों के शोषण और अत्याचार का आज तक सामना करना पड़ता है। देश के आज़ाद होने के साथ जातिवाद को खत्म करने के लिए कई कानून और नियम लागू किए गए लेकिन ये बदलाव भी सवर्ण लोगों की जातिवादी मानसिकता को बदल नहीं पाए।

किसी के रंग-रूप, उसकी नस्ल को मज़ाक का मुद्दा बनाना हमारे यहां बहुत आम है। मैंने बचपन से देखा है कि मेरे परिवार में लोगों को उनके कपड़ों, उनके रंग, बालों, कद-काठी के आधार पर जज करने की बहुत आदत है।

हमारा समाज खुद को भले जितना ही प्रोग्रेसिव कह लें लेकिन ऐसी धारणाएं हमारे मन से हमारी ज़ुबान तक आने में देर नहीं लगाती। हम सतही तौर से इसे नज़रंदाज़ कर सकते हैं किंतु वास्तविकता यह है कि ऐसी जातिवादी भाषा का प्रयोग हम अपने आस-पास रोज़ सुनते होंगे और शायद करते भी होंगे। तारक मेहता का उल्टा चश्मा की एक्टर मुनमुन दत्ता ने अपने एक यूट्यूब वीडियो में कहा, “जब मैं ‘मेकअप’ नहीं करती, तब मैं भंगी की तरह लगती हूं।” कई लोगों ने तो इस पर ध्यान भी नहीं दिया होगा और लोगों का इस पर ध्यान न जाना या इसका समर्थन करना दर्शाता है कि ये हमारे समाज में कितनी सामान्य बात है। 

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रंगभेदी मानसिकता और हमारे शब्द

दूसरे मुद्दे की बात करें तो किसी के रंग-रूप, उसकी नस्ल को मज़ाक का मुद्दा बनाना हमारे यहां बहुत आम है। मैंने बचपन से देखा है कि मेरे परिवार में लोगों को उनके कपड़ों, उनके रंग, बालों, कद-काठी के आधार पर जज करने की बहुत आदत है। मेरे ही भाई का बात-बात पर मेरे रंग का मज़ाक उड़ाना एक सामान्य बात है। एशियाई और ब्लैक लोगों को अक्सर पश्चिमी देशों द्वारा उनके रंग और नस्ल के लिए हिंसा और शोषण झेलना पड़ता है। यह कोई आज-कल का किस्सा नहीं है। लोगों के मन में बसी पुरानी धारणाओं और कुरीतियों पर आधारित उनकी मानसिकता की अभिव्यक्ति है। जब मेरे भाई ने मेरे रंग और मेरे बालों को देखकर यह कमेंट दिया तो उसे टोकने पर वह हंसने लगा और कहा कि जब इंसान के पास कमबैक नहीं होता तो वे ऐसे मुद्दे ही उठाते हैं। यह कोई ‘कमबैक’ का मुद्दा नहीं है। बात जागरूक होकर इन शब्दों को नार्मल न बनाने की है। 

औरतों पर केंद्रित पितृसत्तात्मक शब्द

आखिरी स्थिति इतनी सटीक है कि हो सकता है आप जब यह लेख पढ़ रहे हो तो इसी बीच आपको औरतों से संबंधित आपत्तिजनक शब्द सुनने को मिल जाएंगे। अपने दोस्तों के बीच एक औरत होने के नाते इनकी गालियों का हिस्सा बनना बहुत खलता है। टोकने पर कह दिया जाता है “यार! तू ओवर-रिएक्ट क्यों कर रही है? चिल कर।” ये शब्द इतने सामान्य हो गए हैं कि हमें इनमें कुछ गलत लगता ही नहीं है बल्कि ऐसे ही शब्द रेप कल्चर को बढ़ावा देते हैं। पितृसत्तात्मक जड़ें हमारे अंदर इस क़दर बसी हुई हैं कि हमें इस भाषा में कुछ भी बुरा या आपत्तिजनक नहीं नज़र आता। 

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मैंने ये तीन पक्ष इसलिए उठाए क्योंकि अपने आस-पास मैंने ऐसे आपत्तिजनक शब्दों का सामान्यकरण होते देखा है। लोगों को जागरूक करने पर वह माफ़ी मांग भी लेते हैं लेकिन बात माफ़ी तक ही सीमित नहीं रहती। हमारी आम बोल-चाल की भाषा में ऐसे शब्दों का प्रयोग हमारी रूढ़ीवादि, जातिवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाता है। हम सतही तौर पर अगर यह मान भी लेते हैं कि इस तरह की भाषा का उपयोग करना, जिससे किसी विशेष वर्ग का अपमान हो, गलत है लेकिन हमारी शुरुआत से गढ़ी गई यह सोच हमें इन सबका हिस्सा बना देती है। बात किसी एक शब्द या वर्ग की नहीं है, बात है संवेदनशीलता की। एकबार यदि हम इन शब्दों के सही मायने समझ कर, वर्ग विशेष के सालों से चल रहे संघर्षों की ओर ध्यान दें तो हमें ऐसी भाषा के दोष और इसकी कमियां समझ आ पाएंगीं। ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे लोगों को टोकने और रोकने की ज़रूरत है। उन्हें यह याद दिलाना चाहिए कि ये शब्द सामान्य नहीं है, बल्कि समुदाय विशेष के लिए अपमान हैं।

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तस्वीर साभार: Teamwork Leadership

प्रेरणा हिंदी साहित्य की विद्यार्थी हैं। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने अनुवाद में डिप्लोमा किया है। अनुवाद और लेखन कार्यों में रुचि रखने के इलावा इन्हें चित्रकारी भी पसंद है। नारीवाद, समलैंगिकता, भाषा, साहित्य और राजनैतिक मुद्दों में इनकी विशेष रुचि है।

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