संस्कृतिसिनेमा क्लिकबेट्स के बाज़ार में महिला-विरोधी कॉन्टेंट परोसता मीडिया

क्लिकबेट्स के बाज़ार में महिला-विरोधी कॉन्टेंट परोसता मीडिया

बाज़ारवादी मीडिया में खबरों को जनसरोकार से परे ज्यादा से ज्यादा हिट्स के लिहाज़ से लिखा जाता है। किस तरह से ज्यादा हिट क्लिक मिलेंगें उसे सोचकर जो लिखा जा रहा है

“अमीषा पटेल के खूब रहे हैं अफेयर्स, जानते हैं? सफल नहीं रही इन 5 महिला नेताओं की लव मैरिज, बच्चा होने के बाद पति संग हुआ तलाक। 24 साल में माहिरा पहुंची बुलंदियों पर, ये ग्लैमरस तस्वीरें बना देंगी आपका दिन, मोटापे पर ट्रोल हुईं ये एक्ट्रेसेज, ऐश्वर्या भी शामिल”

खबरों को परोसती इस तरह की पंच लाइनें खासतौर पर डिजिटल मीडिया में आसानी से मिल जाएंगी। ये तो बस कुछ उदाहरण हैं। मीडिया में रोज़ इस तरह की खबरें प्रकाशित की जा रही हैं। हिट्स के लिए बेहद असंवेदनशील, महिला-विरोधी और बचकानी भाषा का इस्तेमाल आम हो गया है। डिजिटल मीडिया के दौर में सुर्खियों के लिए पाठकों की पंसद बताकर इसे थोपा जा रहा है जो हर लिहाज से पत्रकारिता के मूल्यों के विपरीत है। ऑनलाइन पत्रकारिता के दौर में क्लिकबेट पत्रकारिता का पर्याय बन गया है। इस तरह की पत्रकारिता में खासतौर से पेज थ्री न्यूज में अभिनेत्रियों को केन्द्र में रखकर खबरें लिखी जा रही हैं।

क्या है क्लिकबेट और हिट न्यूज़ ?

क्लिकबेट पत्रकारिता मौजूदा दौर के डिजिटल मीडिया के काम करने का सबसे प्रचलित तरीका है। आज के समय का विज्ञापन आधारित मीडिया में इस तरह का रवैया सामान्य हो गया है। डिजिटल मीडिया के एक बड़े हिस्से में इस तरह की प्रस्तुति ही उसका हथियार है। सनसनीखेज शीर्षक लगाकर लोगों को स्टोरी पढ़ने पर मजबूर करना, स्टोरी पर मात्र एक क्लिक करने के लिए पाठकों में उत्सुकता डालना, वर्तमान में मीडिया के एक बड़े वर्ग की पत्रकारिता की पहचान बन गई है। स्वघोषित नंबर वन न्यूज़ चैनल से लेकर अन्य डिजिटल मीडिया स्टार्टअप क्लिकबेट और हिट्स बटोरने की बीमारी से पीड़ित हैं।

बाज़ारवादी मीडिया में खबरों को जनसरोकार से परे ज्यादा से ज्यादा हिट्स के लिहाज़ से लिखा जाता है। किस तरह से ज्यादा हिट क्लिक मिलेंगें उसे सोचकर जो लिखा जा रहा है

सनसनीखेज सुर्खियां का इस्तेमाल कर पाठकों को क्लिक करने के लिए मजबूर करना, खबरों के लिहाज से बहुत ज्यादा भ्रामक है। खबरों के बाजार में विज्ञापन पाने के लिए साइट्स पर ज्यादा से ज्यादा हिट्स की आवश्यकता होती है और जितने ज्यादा हिट्स होंगे उनता ही ज्यादा विज्ञापन के लिए अधिक पैसा ले सकते हैं। इस बाज़ारवादी मीडिया में खबरों को जनसरोकार से परे ज्यादा से ज्यादा हिट्स के लिहाज़ से लिखा जाता है। किस तरह से ज्यादा हिट क्लिक मिलेंगें उसे सोचकर जो लिखा जा रहा है।

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बॉलीवुड की खबरें ज्यादा से ज्यादा सनसनीखेज़

इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए हर तरह की कोशिश की जाती है। इस कोशिश में बॉलीवुड की खबरों को आकर्षित बनाने के लिए क्लिकबेट सुर्खियों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। हिट्स इकठ्ठा करने के लिए लिहाज से तैयार किए गए इन शीर्षकों में महिला कलाकारों के बारे में बेहद भ्रामक और अश्लील तरह की खबरें दी जाती है। बॉलीवुड अदाकारों के बारे में ऐसी सुर्खिया बनाकर पेश की जाती हैं जिसमें जानकारी के नाम पर कुछ नहीं होता है। किसका किससे अफेयर रहा, कौन किसे डेट कर रहा है, यहां तक कि किस महिला अभिनेत्री का वजन बढ़ गया है, इन अभिनेत्रियों की हुई लड़ाई जैसे शीर्षक लिखकर खबरें लगाई जा रही हैं।

डिजिटल मीडिया में हिट्स बटोरने के लिए महिला को केन्द्र में रखकर जिस तरह खबरों को लिखा जा रहा है वह पितृसत्तात्मक सोच को सूचनाओं के माध्यम से लोगों के जेहन में और मज़बूत कर रहे हैं। इस तरह की खबरें पढ़नेवालों के मन में पहले से ही मौजूद महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच को और मज़बूती से स्थापित करने का काम कर रही हैं।

हाल में अधिक से अधिक भारतीय मीडिया क्लिकबेट शीर्षकों का उपयोग कर रहा है। सनसनीखेज़ जानकारियों को इसलिए रिपोर्ट कर रहा है ताकि साइट पर अधिक से अधिक ट्रैफिक बढ़ाया जा सके। सुर्खियों में बेवजह ऐसे शब्दों को इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सीधे-सीधे खबर से कोई वास्ता नहीं है। उदाहरण के तौर पर “इन मुस्लिम एक्स्ट्रेस ने पर्दे पर की थी बोल्डनेस की हद पार”, “मुस्लिम अभिनेत्रियों का बिकनी अवतार” जैसे शीर्षकों में जानबूझकर मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। बॉलीवुड की इन खबरों में मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल करना खबर के लिए तो कोई मायने नहीं रखता है। किसी भी एक्ट्रेस की इस तरह की खबर बताने के लिए उनके धर्म को जाहिर करने की आवश्यकता तो नहीं है।

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महिलाओं के निजी जीवन को परोसने वाला मीडिया

वर्तमान में मीडिया में सनसनीख़ेज खबरों के चलन में निजी जीवन को परोसने का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया। फिल्मी सितारों से लेकर नेताओं तक के निजी जीवन पर आधारित खबरों को लगातार सुर्खियां बनाया जा रहा है। पाठकों की पंसद का हवाला देकर महिला नेता और अभिनेत्रियों के निजी जीवन को केन्द्र में रखते हुए मीडिया में खबरों को खूब लिखा जा रहा है। हाल में कुछ वक्त पहले तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां के निजी जीवन को लेकर मीडिया में सबसे ज्यादा क्लिकबेट खबरों का इस्तेमाल किया गया। नुसरत जहां के बच्चे और पति को लेकर डिजिटल मीडिया में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया वह किसी भी सभ्य समाज में मान्य नहीं है। उनके जीवन की छोटी-छोटी निजी बात को सुर्खियों में बदलकर खबरों में लाया गया। इस तरह की निजी खबरों में वैसे भी जानकारी के नाम पर कुछ नहीं होता है। बॉलीवुड में निजी रिश्तों की खबरों का चलन तो इतना सामान्य कर दिया गया है कि रोज किसी न किसी अभिनेत्री के जीवन को गॉसिप बनाकर पेश किया जाता है। मीडिया में महिलाओं के निजी जीवन की घटनाओं को सार्वजनिक किया जाना उस पितृसत्तात्मक सोच को भी दिखाता है जहां एक महिला की स्वतंत्रता और उसकी निजता का कोई महत्व नहीं है।  

मीडिया महिलाओं के शरीर पर क्लिक्स बटोरता मीडिया          

“भारत की सबसे हॉट अभिनेत्रियां, देखिए कौन सी हीरोइनों ने लूटा फैंस का दिल, क्रॉप टॉप-स्कर्ट में हीरोइन ने बढ़ाया इंटरनेट का पारा, देखिए टॉप हीरोइनों के फोटो जिन्हें देख आपका दिन बन जाएगा” जैसी बातें लिखकर सुर्खियां बनाकर डिजिटल मीडिया में एक तस्वीरों की गैलरी का एक अलग सेक्शन ही हो गया है। महिलाओं की तस्वीरों के लिए अक्सर इस तरह की भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है। “दिल टूटना, दिन बन जाएगा, जलवा बिखरेती अदाएं” जैसे शब्दों को लिखकर पाठकों का ध्यान खींचने के लिए बहुत ही दोयम और गरिमाहीन भाषा का प्रयोग किया जाता है। खबरों के नाम पर तस्वीरों में महिला के शरीर को ऑब्जेक्ट की तरह पेश किया जाता है। क्लिकबेट और हिट्स के खेल में मीडिया जिस तरह की भाषा औरकंटेट का इस्तेमाल कर रहा है वह पत्रकारिता के किसी भी मूल्य में शामिल नहीं है। यही नहीं महिला के विरुद्ध होने वाली हिंसा की खबरों में भी मीडिया में असंवेदनशील, भ्रामक और उत्तेजक भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।

मौजूदा इंटरनेट के दौर में जहां हर इंसान जल्दी से ज्यादा से ज्यादा खबरें जानना चाहता है। ऐसे में क्टिलबेट और हिट बटोरनेवाली खबरें सूचना के तंत्र के लिए बहुत ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। पत्रकारिता की प्राथमिकताओं को नकारते हुए भ्रामक और गलत जानकारियों का जाल का एक ट्रेंड बनाया जा रहा है। इस तरह की हल्की जानकारियां और महिला-विरोधी भाषा समाज को अज्ञानता की ओर बढ़ाती हैं। फूहड़ मनोरंजन की तरह खबरें पेश करने का यह तरीका मीडिया की गंभीरता को खत्म कर रहा है। मीडिया का काम समाज में जागरूकता लाना है, डिजिटल मीडिया में हिट्स बटोरने के लिए महिला को केन्द्र में रखकर जिस तरह खबरों को लिखा जा रहा है वह पितृसत्तात्मक सोच को सूचनाओं के माध्यम से लोगों के जेहन में और मज़बूत कर रहे हैं। इस तरह की खबरें पढ़नेवालों के मन में पहले से ही मौजूद महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच को और मज़बूती से स्थापित करने का काम कर रही हैं।

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