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हर बुनियादी सुविधाओं से दूर, किस तरह का जीवन जीने को मजबूर हैं मुसहर समुदाय
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चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती की मधु (बदला हुआ नाम) बारह साल की है। बस्ती में साफ़ पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है और जातिगत भेदभाव इतना ज़्यादा है कि गाँव के किसी भी बच्चे का कोई टीकाकरण नहीं हुआ, जिसका ख़ामियाज़ा मधु को भुगतना पड़ा। जैसे ही हम लोगों को मधु की तबीयत के बारे में पता चला हम लोग अपनी टीम एक साथ मधु के पास पहुंचे और उसे स्थानीय प्राइवेट क्लिनिक में लेकर गए जहां उसका इलाज चल रहा था। पिछले हफ़्ते मधु की तबीयत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई और हम लोगों ने अपनी संस्था के माध्यम से मधु को बेहतर इलाज के लिए बनारस ले जाने का फैसला किया।

मधु के परिवारवालों ने शहर आकर हॉस्पिटल में भर्ती करवाने का निर्णय तो कर लिया पर उन्हें शहर जाने के लिए घंटों तक कोई साधन नहीं मिल पाया। इसलिए नहीं कि उनके पास पैसे नहीं थे बल्कि इसलिए कि वे मुसहर जाति से ताल्लुक़ रखते हैं जिन्हें आमतौर पर हमेशा गरीब माना जाता है, जो किसी भी तरह के भुगतान के लिए असक्षम ही होंगें। साधन मिलने में भेदभाव से लेकर अच्छी और सुरक्षित ज़िंदगी के लिए बुनियादी ज़रूरतों तक, किस तरह आज भी हमारे समाज में वंचित समुदाय के साथ भेदभाव किया जाता है, इसका अनुभव हमेशा देखने को मिलता है। मैं मुसहर समुदाय के साथ काम करती हूं, जिनके साथ काम करने के अनुभव और अपने विशेषाधिकारों का एहसास मुझे हमेशा होता है।

मैं खुद भी दलित जाति से हूं, लेकिन इस दलित जाति में कई परतें और अन्य जातियां है जिनमें से एक है मुसहर। इस लेख के ज़रिये आज हम चर्चा करेंगे उन भेदभाव, शोषण और विशेषधिकारों की, जो अभी भी मुसहर जाति को समाज के वंचित समुदाय के सबसे मिचले पायदान पर बनाए हुए हैं।

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वोट देने और चुनाव लड़ने के बुनियादी अधिकार से दूर मुसहर

गाँव की जिन मुसहर बस्तियों में  मैं काम करती हूं, वहां कई ऐसी बस्तियां हैं, जहां अभी तक किसी भी मुसहर परिवार का वोटर कार्ड नहीं बन पाया है। नतीजतन पूरी की पूरी बस्ती के लोग वोट नहीं देते हैं। लोकतंत्र में वोट देने के अधिकार से वंचित मुसहर परिवारों की स्थिति यह है कि उन तक न तो आवास योजनाएं पहुंचीं, न साफ़ पीने के पानी की व्यवस्था और न ही अन्य बुनियादी सुविधाएं। लेकिन ऐसा नहीं है कि पंचायत चुनाव में अनुसूचित जाति की सीट नहीं आती। सीट आती है और अनुसूचित जाति के प्रत्याशी चुनाव भी लड़ते हैं लेकिन उनमें से कोई मुसहर नहीं होता। ज़ाहिर है, जिस समुदाय को वोट देने के अधिकार तक से वंचित रखा गया है, वह समुदाय अगर सत्ता में आना भी चाहेगा तो हमारा जातिवादी समाज उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर देगा।

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“जब मैंने एक़ बार मुसहर बस्ती के बच्चों से बात करके यह जानने की कोशिश की कि वे स्कूल क्यों नहीं जाते तो उनका कहना बेहद साफ़ था कि गाँव में बच्चे उन लोगों को मुसहर जाति के होने की वजह से चिढ़ाते हैं, कई बार मारपीट तक कर लेते हैं जिसकी वजह से वे स्कूल नहीं जाना चाहते हैं।”

मुसहर समुदाय के साथ समाज का भेदभावपूर्ण रवैया और नज़रिया  

मधु के परिवार को उसी शहर के हॉस्पिटल तक पहुंचाने में हमें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि समाज ने मुसहर को लेकर अपना एक बहुत पक्का जातिवादी नज़रिया बनाया है। वह नज़रिया यह कहता है कि मुसहर के साथ भेदभाव करना चाहिए, क्योंकि वे समाज के विकास के मानकों में कहीं भी खड़े नहीं होते। वे शिक्षित नहीं हैं, उनके पास पैसे नहीं हैं, वे गंदगी से रहते हैं, वग़ैरह-वग़ैरह। ये धारणाएं मुसहर समुदाय के साथ क्रूर व्यवहार करती हैं और यह क्रूरता कई बार इतना ज़्यादा बढ़ जाती है कि उसकी क़ीमत उन्हें अपनी जान गंवा कर चुकानी पड़ती है।

शिक्षा की योजनाओं से दूर मुसहर

जिन मुसहर बस्तियों में मैं काम कर रही हूं, वहां बहुत कम या ये कहूं कि न के बराबर बच्चे स्कूल जाते हैं। पर ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूल के हाज़िरी वाले रजिस्टर पर उनका नाम नहीं। उनका नाम वहां मौजूद है पर वे स्कूल नहीं जाते। इसकी कई वजहें हैं। जैसे, स्कूल का दूर होना, घर में काम का दबाव, स्कूलों में जातिगत भेदभाव। इन सबमें सबसे मुख्य वजह है समाज का भेदभावपूर्ण जातिवादी रवैया। जब मैंने एक़ बार मुसहर बस्ती के बच्चों से बात करके यह जानने की कोशिश की कि वे स्कूल क्यों नहीं जाते तो उनका कहना बेहद साफ़ था कि गाँव में बच्चे उन लोगों को मुसहर जाति के होने की वजह से चिढ़ाते हैं, कई बार मारपीट तक कर लेते हैं जिसकी वजह से वे स्कूल नहीं जाना चाहते हैं।

ये सब ऐसी बुनियादी बातें है जो हमेशा मैं मुसहर समुदाय के साथ काम करने के दौरान महसूस करती हूं। हमारे समाज में विशेषाधिकार और दमन की परतें कितनी मोटी हैं, इसका अहसास मैं लगातार अपने काम के दौरान महसूस करती हूं।

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तस्वीर साभार : मुहीम

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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