भारत एक ऐसा देश है जहां सभी धर्मों और समुदायों में पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो स्त्री को उसका यह नाम और जन्म से मिली पहचान भी त्यागने पर विवश कर देती है।
तस्वीर साभार : Sabrang India
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यथार्थ में देखा जाए तो जन्म से ही व्यक्ति का नाम उसकी ऐसी पहचान बन जाता है कि नाम लेते ही व्यक्ति का संपूर्ण चित्र-चरित्र हमारे ज़ेहन में उतर जाता है। भारत एक ऐसा देश है जहां सभी धर्मों और समुदायों में पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो स्त्री को उसका यह नाम और जन्म से मिली पहचान भी त्यागने पर विवश कर देती है। यह सर्वविदित है कि विश्व के कई प्राचीन समुदाय मातृसत्तात्मक थीे और माता के नाम पर ही इनका वंश चलता था। भारत में आज भी गारो, खासी आदि ऐसी जनजातियां हैं जहां मातृसत्तात्मक व्यवस्था है और परिवार की बेटी ही परिवार की उत्तराधिकारी या संरक्षक होती है। किंतु पितृसत्तात्मक समाज में अन्य व्यवस्थाओं को छोड़ भी दें तो सबसे बड़ी विसंगति यह है कि स्त्री का विवाह शादी के बाद नाम और उपनाम बदलने की रीति है।

हाल ही में स्त्री शिक्षा में आए सार्थक परिवर्तनों के कारण एक बहुत बड़ी समस्या यह देखने को मिली है कि महिलाओं के शैक्षिक दस्तावेजों में विवाह पूर्व माता-पिता द्वारा जन्म से मिला नाम और उपनाम लिखा होता है और विवाह के बाद स्त्री का नाम और उपनाम सामाजिक रूप से और मैरिज प्रमाणपत्र में पति के उपनाम पर आधारित हो जाता है। विवाह के बाद उपनाम बदलने की इस पूरी प्रक्रिया में स्त्री को शिक्षा और रोजगार में आवेदन पत्र भरने से लेकर, सैलरी लेने तक कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

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नारीवादी लेखिका चिमामांडा नारीवाद की परिभाषा देती हैं कि जो जैसा है उसे वैसे ही रहने देना चाहिए। किसी को भी मजबूर नहीं करना चाहिए एक निश्चित खांचे में ढलने के लिए। लेकिन भारतीय समाज के संबंध में सच यह है कि स्त्री के जन्म से ही उसे एक निश्चित खांचे में ढाल दिया जाता है कि वह परायी अमानत है, शादी के बाद उसे अपने पति का घर संभालना है इत्यादि।

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भारत एक ऐसा देश है जहां सभी धर्मों और समुदायों में पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो स्त्री को उसका यह नाम और जन्म से मिली पहचान भी त्यागने पर विवश कर देती है।

विवाह के बाद पिता के घर के साथ ही पिता का उपनाम भी स्त्री को त्याग कर पति का उपनाम अपनाना पड़ता है। लेकिन घर से बाहर कार्यक्षेत्र में कदम रखने पर उसके समक्ष पहचान का सवाल खड़ा हो जाता है। व्यावहारिक और तात्कालिक तौर पर इसका समाधान यह सुझाया जाता है कि स्त्री को कार्यक्षेत्र/ नौकरी में दसवीं और बारहवीं के दस्तावेजों में लिखित नाम ही प्रयोग में लाना चाहिए। भारत में कानूनी रूप से इसका स्थायी समाधान यह है कि नाम परिवर्तन का एफिडेविट बनवाकर राजपत्र के माध्यम से स्थाई रूप से स्त्री अपना नाम बदल लिया जाए लेकिन सामाजिक स्तर पर यह निश्चित ही दोषपूर्ण व्यवस्था है जहां स्त्री को अपने नाम और पहचान के संदर्भ में अनेक बार इस तरह के अनुभवों से गुज़रना पड़ता है।

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दूसरी व्यावहारिक समस्या और अधिक गंभीर है। स्त्री की पहचान का एक अन्य प्रश्न है कि वह मिस है या मिसेज है? सामजिक मापदंड स्त्री को कई तराजुओं में तौलते हैं। पुरुषों के लिए हिंदी में श्री और अंग्रेज़ी में मिस्टर का संबोधन ही पर्याप्त है जबकि स्त्री के लिए अविवाहित होने पर सुश्री और विवाहित होने पर श्रीमती संबोधन का प्रयोग किया जाता है। जबकि अंग्रेज़ी में भी अविवाहित होने पर मिस एवम् विवाहित होने पर मिसेज संबोधन का प्रयोग किया जाता है।

हालांकि अब अंग्रेज़ी में विवाहित और अविवाहित दोनों के लिए मिस संबोधन मान्य है। किंतु हमारे समाज में अविवाहित या अकेली महिला को अक्सर ऐसे प्रश्नों का सामना करना पड़ता है जिससे उनके निजी जीवन पर प्रकाश पड़ता है। जमीनी स्तर पर नारीवादी भाषा विज्ञान आंदोलन के माध्यम से भाषा में लिंगभेद की व्याख्या और विश्लेषण पूरे 80 और 90 के दशक में जारी रहा, जिसमें जर्मनी और फ्रांस जैसे भाषाओं और भाषण समुदायों में अध्ययन शामिल है।

निश्चित रूप से भारत ने स्त्री की मूलभूत समस्याओं का समाधान करते हुए उसके सामाजिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा की है तथा स्त्री के लिए पहले से अधिक सुरक्षित और पूर्वाग्रह मुक्त वातावरण का निर्माण किया है। लेकिन यह भी सत्य है कि एक जटिल पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना होने के कारण भारतीय समाज में सामाजिक विकास और नारीवादी जागरूकता की गति अत्यंत धीमी रही है। भारतीय समाज के संदर्भ में नारीवादी विशेषज्ञों को स्त्री से संबंधित व्यावहारिक समस्याओं और भाषाई असमानताओं को दूर करने के संबंध में ठोस बदलाव लाने की अब भी आवश्यकता है।

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तस्वीर साभार : Sabrang India

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