'बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ' सिर्फ प्रचार में खर्च हो गया योजना का 80% बजट: रिपोर्ट
तस्वीर साभारः Wikimedia Commons
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यदि आप सड़कों पर जगह-जगह ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के विज्ञापन देखते हैं। इंटरनेट पर भी लगातार इस योजना के विज्ञापन आपको दिखते रहते हैं तो वह इसलिए क्योंकि इस योजना के तहत जारी कुल राशि का एक बड़ा हिस्सा इसी प्रचार-प्रसार के लिए ही खर्च हुआ है। सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर कितनी संवेदशील है इस बात का पता चलता है, महिला सशक्तिकरण पर संसदीय समिति की लोकसभा में पेश रिपोर्ट में।

समिति की रिपोर्ट के मुताबिक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की लगभग 80 प्रतिशत धनराशि सिर्फ प्रचार में खर्च की गई। समिति ने कहा कि सरकार को लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में भी निवेश करना चाहिए। दीवारों और मोबाइल स्क्रीन पर दिखने वाले विज्ञापनों के माध्यम से योजना का प्रचार तो हो गया लेकिन धरातल पर बालिकाओं की स्थिति पहले जैसी ही बनी हुई है। खासतौर पर बालिका शिक्षा, स्वास्थ्य, और लिंग परीक्षण को खत्म करने की इस योजना ने वास्तविक रूप से कोई प्रभावी काम नहीं किया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शुरुआती बड़ी योजनाओं में एक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश की बेटियों को समर्पित करते हुए उनके जीवन-विकास के लिए कई बड़े-बड़े वादे किए। खासतौर पर बालिका लिंगानुपात को सुधारने और शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए यह एक महत्वपूर्ण योजना है। सरकार के जारी फंड के सही तरीके से खर्च न होने पर समिति ने कहा है कि सरकार को ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के विज्ञापनों के बजाय शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हिस्से पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

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क्या कहती है संसदीय समिति की रिपोर्ट

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के अनुसार समिति ने पाया कि साल 2014-15 से लेकर साल 2019-20 तक के समय में इस योजना के लिए कुल 848 करोड़ रूपये का फंड जारी हुआ। यही नहीं साल 2020-21 में कोविड-19 के समय भी इस योजना के लिए फंड आवंटित किया गया। इस दौरान कुल 622.48 करोड़ की धनराशि राज्यों को जारी की गई। संसद समिति ने पाया कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश सरकारों ने इस राशि का केवल 25.13 प्रतिशत ही खर्च किया। उन्होंने कहा कि बालिका कल्याण के लिए कुल राशि का 156.46 करोड़ रूपये ही खर्च किया जाना चिंता का विषय है। समिति ने पाया कि 2016-19 के दौरान 446.72 करोड़ रुपये जारी किए गए। इस धनराशि का 78.91 फीसद मीडिया के माध्यम से योजना के प्रचार में खर्च कर दिया गया।

केंद्र सरकार की विकास योजनाओं के बड़े-बड़े विज्ञापन अब खबरों की शक्ल तक में पेश किए जा रहे है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना पर संसद की समिति की रिपोर्ट से पता यह बात कही जा सकती है कि सरकार जमीनी स्तर पर काम न करके प्रचार तंत्र के माध्यम से लोगों के बीच विकास की डीगें हांक रही है।

समिति ने कहा कि ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना के माध्यम से लोगों में जागरूकता संदेश पहुंचाना जितना आवश्यक है उतना ही जरूरी योजना के मुख्य उद्देश्यों को पूरा करना भी था। अब समय आ गया है कि धनराशि का प्रयोग योजना के मुख्य उद्देशयों को पूरा करने के लिए लगाना चाहिए। समिति ने सुझाव दिया है कि सरकार को महिला एवं बाल कल्याण विभाग को राज्य, केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ फंड के माध्यम से बालिकाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधा मुहैया करवाई जाए। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरुआत साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य बाल लिंगानुपात को सुधारना है। यह योजना देश के 405 ज़िलों में लागू की गई।

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना के मुख्य लक्ष्य

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा शुभारंभ इस योजना का मुख्य उद्देश्य बाल लिंगानुपात में लड़के और लड़की के बीच के अंतर को कम करना।

लैंगिक असमानता को खत्म कर बच्चियों की सुरक्षा करना।

लिंग चयन की जांच पर रोक लगाना।

बालिकाओं को शिक्षा के माध्यम से समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ाना।

योजनाओं के बाद नहीं बदल रही तस्वीर

सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वन की कमी पहला कारण है कि कागजों पर बनी योजना असमानता को दूर नहीं कर पा रही है। द हिंदू की खबर के अनुसार संसद में महिला व बाल विकास मंत्रालय की ओर से दिए गए जवाब से यह पता चलता है कि बालिकाओं के उत्थान के लिए बनी योजनाओं के होने के बाद उनकी सामाजिक दशा में परिवर्तन नहीं आ रहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से कहा गया कि देश में माध्यमिक स्कूल शिक्षा के स्तर पर आज भी 17.3 फीसद लड़कियां अपनी स्कूली शिक्षा पूरी किए बगैर ही स्कूल जाना छोड़ देती है। प्राथमिक स्तर में 4.74 फीसदी बच्चियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती है।

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योजनाओं के वादे और इरादों में अंतर

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का मूल्याकंन करती संसदीय रिपोर्ट यह कहती है कि सरकार द्वारा किए गए कदम कितने अप्रभावी हैं। योजनाओं का निर्माण होने के बावजूद वास्तविक रूप से कार्य करने की बहुत आवश्यकता है। जागरूकता के साथ धरातल की तस्वीर बदलने के लिए गंभीर रूप से कार्य करने की भी आवश्यकता है। संसदीय रिपोर्ट से तो यह साफ पता चलता है कि बालिकाओं के जीवनस्तर को सुधारने को लेकर सरकार में उस संवदेनशीलता की कमी है जितनी आवश्यकता है। दूसरी और सरकार की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की बड़ी धनराशि प्रचार तंत्र में खर्च होने पर विपक्ष और लोगों ने भी सरकार की सोशल मीडिया पर खूब आलोचना की।

बालिकाओं की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को दूर करने के लिए उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, गरीबी आदि से जुड़े पहलूओं पर बालिकाओं के सशक्तिकरण के तहत गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए यूनिसेफ के सुझावों में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान देने के लिए कहा गया है। भारत के संदर्भ में यूनिसेफ ने यह भी कहा है कि भारत तब तक पूरी तरह विकास नहीं कर पाएगा जबतक लड़की और लड़के को समान अवसर नहीं दिए जाएंगे। देश के विकास में लैंगिक असमानता एक बड़ी बाधा है।

बीजेपी सरकार का विज्ञापनों पर बड़ा खर्च

ऐसा पहली बार नहीं है कि बीजेपी प्रचार-प्रसार के लिए किए गए खर्च के कारण घेरे में आई है। इससे पहले भी केंद्र सरकार के भारी-भरकम विज्ञापनों में जनता के पैसे की बर्बादी पर बात हुई है। नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में सरकार के प्रचार-प्रसार पर बहुत ही ज्यादा खर्च किया जा रहा है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा आरटीआई में पूछे गए सवालों के जबाव में मिली जानकारी के अनुसार साल 2014 के बाद से मोदी सरकार ने विज्ञापन पर कुल 5,749 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इससे पहले मनमोहन सरकार ने अपने 10 साल के कार्यकाल में केवल 3,582 करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस वक्त देश में कोविड-19 कहर बरपा रहा था, उस वक्त सरकार ने अपनी खामियों के छिपाने के लिए विज्ञापनों पर ज्यादा पैसा खर्च किया।

साल 2018 के आखिर से लेकर साल 2020 की शुरुआत तक सरकार ने आयुष्मान योजना के प्रचार पर 25 करोड़ की राशि खर्च की। अप्रैल 2020 से लेकर जनवरी 2021 के बीच मोदी सरकार ने विज्ञापनों पर कुल 212 करोड़ रूपये खर्च किए हैं। सरकार का विज्ञापनों पर विशेष ध्यान शुरुआत से ही बना हुआ है। केंद्र सरकार की विकास योजनाओं और प्रधानमंत्री की यात्रा के बड़े-बड़े विज्ञापन अब खबरों की शक्ल तक में पेश किए जा रहे है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना पर संसद की समिति की रिपोर्ट से पता यह बात कही जा सकती है कि सरकार जमीनी स्तर पर काम न करके प्रचार तंत्र के माध्यम से लोगों के बीच विकास की डीगें हांक रही है।

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तस्वीर साभारः Wikimedia Commons

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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