गुजरात दंगें पर आधारित यह फ़िल्म ज़रूर देखी जानी चाहिए

0
‘फ़िराक’ नंदिता दास के निर्देशन में बनी ये फ़िल्म 2002 के गुजरात दंगो पर आधारित है, जो बिना किसी हिंसा के इसमें दंगो का दर्द महसूस कराया गया है।
छपाक

छपाक : एसिड पीड़िताओं के संघर्षों और भेदभाव की परतों को उकेरती एक ज़रूरी...

1
छपाक कई मायनों में इंटरसेक्शनल फ़िल्म बनकर सामने आयी, जिसमें दो दलित एसिड पीड़िताओं के ज़रिए जाति-आधारित दुर्व्यवहार को बेहद संजीदगी से उजागर किया गया है।
आदिवासियों की ज़िंदगी के संघर्षों और ख़ूबसूरती को बयां करती हैं ये फ़िल्में

आदिवासियों की ज़िंदगी के संघर्षों और ख़ूबसूरती को बयां करती हैं ये फ़िल्में

0
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में हर साल करीब 1600 फिल्में बनती हैं। लेकिन इनमें आदिवासियों को या उनके जीवन और संघर्षों को ना के बराबर जगह मिलती है।
छपाक

छपाक : एसिड अटैक सरवाइवर की महज़ कहानी नहीं, उनकी ज़िंदगी की हक़ीक़त है!

0
हमारे लिए फिल्म ‘छपाक’ सिर्फ मालती की कहानी हो सकती है। लेकिन असल में, चाहे मालती हो या लक्ष्मी, इनकी कहानी महज़ कहानी नहीं है, यह कईयों की ज़िंदगी है।
ड्रीमगर्ल

बाज़ारवादी ज़िंदगी के रिश्तों की हकीकत और उत्पीड़क संस्कृति का जंजाल वाया ‘ड्रीमगर्ल’

ड्रीमगर्ल नए तरह की कॉमेडी फिल्म है, जिसमें नया विषय है, जिसमें फेंडशिप कॉलसेंटर में फीमेल की जगह काम करने वाला असामान्य स्किल का सामान्य हीरो करन है।
प्यार ‘इज़्ज़त’ से पनपता है ‘मारपीट’ से नहीं – फ़िल्म 'कबीर सिंह' एक पुरुष के चश्मे से

प्यार ‘इज़्ज़त’ से पनपता है ‘मारपीट’ से नहीं – फ़िल्म ‘कबीर सिंह’ एक पुरुष...

3
हमारे देश के वर्तमान में महिलाओं की स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है, ऐसे में कबीर सिंह जैसी फ़िल्में आग में घी डालने के जैसा है।
प्यार ‘इज़्ज़त’ से पनपता है ‘मारपीट’ से नहीं – फ़िल्म 'कबीर सिंह' एक पुरुष के चश्मे से

मिसोजिनी, नायकत्व और ‘कबीर सिंह’

1
‘कबीर सिंह’ की समीक्षाओं में कबीर को एक ‘रिबेलियस एल्कोहोलिक’ बताया गया है। पर सवाल यह उठता है कि अगर फ़िल्म का नायक रिबेल करता है तो किस के प्रति?
आर्टिकल 15 : समाज के फ़र्क को दिखाती और फ़र्क लाने की उम्मीद जगाती ‘एक ज़रूरी फिल्म’

आर्टिकल 15 : समाज के फ़र्क को दिखाती और फ़र्क लाने की उम्मीद जगाती...

1
आर्टिकल 15 में समाज में बनी जाति की जटिल समस्या को दिखाते हुए ये संदेश देती है कि इन परिस्थितियों को बदलने के लिए अब हमें किसी हीरो का इंतज़ार नहीं करना है|
एक्टिंग छोड़ने के फैसले पर ज़ायरा वसीम की ट्रोलिंग : 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' पर बढ़ते खतरे को दिखाता है

एक्टिंग छोड़ने के फैसले पर ज़ायरा वसीम की ट्रोलिंग : ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ पर...

0
कम उम्र में सुपरहिट फिल्म करने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री ज़ायरा वसीम ने फ़िल्मी दुनिया छोड़ने की बात कही तो उनके इस फ़ैसले पर उन्हें ट्रोल किया जाने लगा|
‘कबीर सिंह' फ़िल्म ही नहीं समाज का आईना भी है

‘कबीर सिंह’ फ़िल्म ही नहीं समाज का आईना भी है

1
‘कबीर सिंह’ को जैसे ही हम फिल्म के संदेश के आधार पर इसकी आलोचना करना शुरू करें तो इसे समाज के लिए बुरी फिल्म के दायरे में रखेंगें|

फॉलो करे

5,052FansLike
950FollowersFollow
368FollowersFollow

ट्रेंडिंग

अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे 'वर्जिनिटी' की बात !

अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे ‘वर्जिनिटी’ की बात !

0
पवित्रता की अग्नि परीक्षा आदिकाल से अब आधुनिक काल तक महिलाएँ देती आ रही हैं। लेकिन परीक्षा के तौर तरीके में अब कई बदलाव हो गया है।
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

2
संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
फैमिली ग्रुप्स के अश्लील व्हाट्सएप्प मेसेज – एक विश्लेषण

फैमिली ग्रुप्स के अश्लील व्हाट्सएप्प मेसेज – एक विश्लेषण

1
आजकल फैमिली ग्रुप में अपने बड़े-बूढ़े और रिश्तेदारों की तरफ से शेयर किये जाने वाले कुछ उन चुनिन्दा भद्दे व्हाट्सएप्प मेसेज के बारे बात करने जा रही हूँ, जो महिलाओं के प्रति व उनसे बनाये जाने वाले रिश्ते के प्रति की अपनी घिनौनी सोच को साझा करते हैं|
पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

5
गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|