हिंदी में होगी अब जेंडर और नारीवाद की बात फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ
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Aashika Shivangi Singh

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मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की स्नातक की छात्रा हूँ। जिस समाज में, ख़ासतौर से छोटे शहरों में आज भी लड़कियों को राजनीति से दूरी रखने की हिदायत दी जाती है वहाँ मैंने ना सिर्फ़ स्नातक में विषय के तौर पर बल्कि रोज़ की बातचीत, घर में डिस्कशन के लिए भी राजनीति का रुख किया। मैं उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर मथुरा में पली बड़ी हूँ। शौक की बात करें तो हिंदी कैलिग्राफी, पेंटिंग, डायरी में क्रिएटिव पोस्टर्स, डिजिटल पोस्टर्स, फ़ोक म्यूज़िक सुनना, कविताएँ लिखना, ब्लॉग लिखना, साहित्य पढ़ना, ये सब मेरे शौकों की फेहरिस्त में शामिल हैं। अब तक के जीवन के संघर्षों को कुछ लाइनों में समेटना मुश्किल होगा इसीलिए सिर्फ़ इतना कह सकती हूँ कि मैं एक एंटी-कास्ट हूँ इसीलिए वैचारिक पंगे और उनसे उपजी लर्निंग-अनलर्निंग, और माइग्रेन सरदर्द मेरे रोज़मर्रा के जीवन में आम बात है।

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पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

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पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं|
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

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मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

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