कोरोना से जूझते देश में 'विशेषाधिकारों' और 'दमन' के बीच दिखता हमारे दोमुँहा समाज का चेहरा!

कोरोना से जूझते देश में ‘विशेषाधिकारों’ और ‘दमन’ के बीच दिखता हमारे दोमुँहा समाज...

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जनता कर्फ़्यू में तालियाँ बजाने के बाद कई डाक्टरों को उनके किराए के घरों से बेघर तक कर दिया गया । ये एक दोमुहे समाज की निशानी नहीं है?

क्या है औरतों पर कोरोना वायरस का असर?

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मुसीबत की इस घड़ी में ज़रूरत है एकजुट होकर हालात सुधारने की क्योंकि लिंग आधारित सामाजिक भेदभाव हमें और अँधेरे की तरफ ही ले जाएगा।
नवरात्र : मूर्ति वाली ‘शक्ति पूजन’ से नहीं बल्कि हर 'नारी’ के सम्मान से भक्ति होगी सार्थक

नवरात्र : मूर्ति वाली ‘शक्ति पूजन’ से नहीं बल्कि हर ‘नारी’ के सम्मान से...

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जिस दिन पंडाल या मंदिर की मूर्ति का नहीं बल्कि दफ़्तर में बैठी और घरों में सांस लेती औरत का सम्मान होगा उस दिन नवरात्र की भक्ति सार्थक होगी।
एक केस में फाँसी देने से नहीं, लड़कों को 'संवेदनशील इंसान' बनाने से आएगा बदलाव !

एक केस में फाँसी देने से नहीं, लड़कों को ‘संवेदनशील इंसान’ बनाने से आएगा...

हमने महिला को उनके अधिकारों के बारे जागरूक किया है। लेकिन उनके अधिकारों का सम्मान कैसे करना है, ये बात अपने बेटों को नहीं बताया।
पितृसत्ता पर लैंगिक समानता का तमाचा जड़ती 'दुआ-ए-रीम' ज़रूर देखनी चाहिए!

पितृसत्ता पर लैंगिक समानता का तमाचा जड़ती ‘दुआ-ए-रीम’ ज़रूर देखनी चाहिए!

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सात मिनट और चंद सेकेंड की इस विडियो को जब हम देखते हैं तो इसकी शुरुआत में हम देश, काल, भाषा और धर्म से परे महिला को ‘एक स्थिति’ में पाते है।

होली के रंग में घुला ‘पितृसत्ता, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता का कुंठित मेल’

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होली के मौसम में महिलाओं की चोली, ब्लाउज़, लहंगे, दुपट्टे, साड़ी के आंचल में पुरुषवादी मानसिकता घुसने को बेचैन होती है, जिसका विरोध बेहद ज़रूरी है।

‘महिला दिवस’ की मुबारकबाद से सिर्फ काम नहीं चलेगा अब…

हम हर साल महिला दिवस मनाते हैं, महिलाओं की तरक्की पर गर्व करते हैं और देश के विकास में योगदान देने के लिए उत्साहित करते हैं, लेकिन किस कीमत पर?

महिला दिवस : एकदिन का ‘क़िस्सा’ नहीं बल्कि हर रोज़ का ‘हिस्सा’ हो

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यूएन की तरफ़ से अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस पर इसबार की थीम में महिलाओं को उनके अधिकार के लिए जागरूक करना और लैंगिक समानता को केंद्र में रखा गया है।

पुरुष के विशेषाधिकार जो उन्हें ‘बलात्कार’ करना सिखाते है

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विशेषाधिकार के चलते पुरुष महिलाओं को मात्र एक भोग की वस्तु समझते है, जिसका उद्देश्य सिर्फ़ पुरुषों की यौनिक इच्छाओं को पूरा करना है। 

‘हिंसक मर्दानगी’ से घुटते समाज को ‘संवेदनशील पुरुषों’ की ज़रूरत है

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मर्द बनाने के चक्कर में समाज पुरुष की संवेदनशीलता को खत्म कर देता है। इसतरह सिर्फ़ ऐसे पुरुष बनते है जिसको हिंसा को हथियार बनाने में ही सन्तुष्टि मिलती है।

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ट्रेंडिंग

अग्नि परीक्षा के बहाने इसके मूल मुद्दे 'वर्जिनिटी' की बात !

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पवित्रता की अग्नि परीक्षा आदिकाल से अब आधुनिक काल तक महिलाएँ देती आ रही हैं। लेकिन परीक्षा के तौर तरीके में अब कई बदलाव हो गया है।
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
फैमिली ग्रुप्स के अश्लील व्हाट्सएप्प मेसेज – एक विश्लेषण

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आजकल फैमिली ग्रुप में अपने बड़े-बूढ़े और रिश्तेदारों की तरफ से शेयर किये जाने वाले कुछ उन चुनिन्दा भद्दे व्हाट्सएप्प मेसेज के बारे बात करने जा रही हूँ, जो महिलाओं के प्रति व उनसे बनाये जाने वाले रिश्ते के प्रति की अपनी घिनौनी सोच को साझा करते हैं|
पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

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मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।