Tuesday, September 17, 2019
“लड़का हुआ या लड़की?” - इंटरसेक्स इंसान की आपबीती

“लड़का हुआ या लड़की?” – इंटरसेक्स इंसान की आपबीती

इंटरसेक्स व्यक्ति में जन्म से ही पुरुष और महिला दोनों के प्रजनन अंग होते हैं। इंटरसेक्स लोगों में भी काफी विभिन्नता पायी जाती है|

ख़बर अच्छी है : LGBTQ+ खिलाड़ियों ने जीता फीफा महिला विश्व कप

फीफा महिला विश्व कप का खिताब जीतने वाली अमेरिका की खिलाड़ी 11 टीम में से इस बार पांच लेस्बियन खिलाड़ी मैदान में थी, जो एक ऐतिहासिक जीत बन गया|
भारतीय मीडिया पर इतनी सिमटी क्यों हैं LGBTQIA+ की खबरें

भारतीय मीडिया पर इतनी सिमटी क्यों हैं LGBTQIA+ की खबरें

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 हटाकर समलैंगिकता को वैधीकरण की सौगात मिली, तब मीडिया ने पहली बार इस पर सही कवरेज की। हालांकि कुछ दिन बाद सब ज्यों का त्यों हो गया।

लैंगिक दायरों से परे होती है प्यार की परिभाषा

हमारे यहाँ तो प्रेम कहानियाँ ही लड़का-लड़की वाली गायी जाती है| पर इसका मतलब ये नहीं कि प्यार का दायरा सिर्फ यहीं तक है, वास्तविकता ये है कि प्यार की कहानी लड़का-लड़की तक सीमित सिर्फ इसलिए है क्योंकि समलैंगिक प्रेम कहानियाँ आज भी अंधेरे बक्से में बंद है|

LGBT की भाषा अगर पल्ले नहीं पड़ती तो आपके लिए है ये वीडियो

आयुषी ने इस वीडियो के ज़रिये बेहद सरल हिंदी भाषा में जेंडर और यौनिकता की परतों को उजागर करते हुए इसपर दर्शकों की समझ बनाने का सार्थक प्रयास किया है|
'गे संबंधों' के साथ-साथ प्रधानमंत्री का भी बना दिया मज़ाक

‘गे संबंधों’ के साथ-साथ प्रधानमंत्री का भी बना दिया मज़ाक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की फोटो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही थी, जिसके कैप्शन में लोग उन्हें ‘गे कपल’ के तौर पर बता रहे थे।
मेरी कहानी - ट्रांसजेंडर होते हुए भी पूरी की पढ़ाई

मेरी कहानी – ट्रांसजेंडर होते हुए भी पूरी की पढ़ाई

हमारे देश में अभी भी जेंडर, सेक्स और सेक्सुअलिटी पर खुलकर बात नहीं होती है| ऐसे में ट्रांसजेंडर लोगों को पढ़ना जरूरी है, क्योंकि यही हमें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का अहम पुल साबित होगा|

‘वो लेस्बियन थी’ इसलिए बीएचयू हास्टल से निकाली गयी

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के महिला महाविद्यालय (एमएमवी) के हास्टल से एक लड़की को यह कहकर निकाल दिया गया कि वो लेस्बियन थी|
सफ़र 'अवध गौरव यात्रा' का: जब मेरी आँखों में सुकून के आंसू थे

सफ़र ‘अवध गौरव यात्रा’ का: जब मेरी आँखों में सुकून के आंसू थे

लोग यह कह रहे थे कि लखनऊ जैसे शहर में ये संभव ही नहीं है, यह कोशिश व्यर्थ जायेगी, लोग हँसेगे तुम सब पर और न जाने कौन-कौन से ताने मारेंगे।
भारत में क्वीयर मुसलमान होना – मेरी कहानी

भारत में क्वीयर मुसलमान होना – मेरी कहानी

क्वीयर होना अपने आप में एक खूबसूरती है, क्योंकि आप समाज में स्थापित सिसजेंडर हैट्रोपैट्रिआरकी को ठेंगा दिखाकर अपने मूल जैविकी व लैंगिकता के साथ जीना शुरू कर देते है।