रमाबाई को भारत में वह पहचान नहीं मिली है जो उनके समकालीन समाजसुधारकों को दी गई पर ये बात कोई नकार नहीं सकता की वह महाराष्ट्र और भारत की सबसे प्रमुख नारीवादी समाज सुधारकों में से एक थी।
अगर पर्व-त्योहार का विचार लोगों को एक-दूसरे से बाँटने या किसी को योग्य-अयोग्य बताने वाला होगा तो ये सीधेतौर पर समाज को हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देते है।
नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।