Tuesday, December 10, 2019
जेएनयू में दमन का क़िस्सा हम सभी का हिस्सा है, जिसपर बोलना-मुँह खोलना हम सभी के लिए ज़रूरी है!

जेएनयू में दमन का क़िस्सा हम सभी का हिस्सा है, जिसपर बोलना-मुँह खोलना हम...

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हाल ही में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में होस्टल फ़ीस बढ़ाए जाने के विरोध में छात्रों के संसद मार्च को पुलिस ने रोक दिया है।

मी लॉर्ड ! अब हम गैरबराबरी के खिलाफ किसका दरवाज़ा खटखटाएं – ‘सबरीमाला स्पेशल’

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सबरीमाला पर एक कड़ा फैसला दे चुका सुप्रीम कोर्ट इस बार यह फैसला नहीं ले पाया कि सबरीमाला मंदिर की प्रथा की नींव पितृसत्ता की बुनियाद पर ही टिकी हुई है।

यौनिकता के पहलुओं को उजागर करती इस्मत की ‘लिहाफ़’

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जिस समय यह कहानी ‘लिहाफ़’ लिखी गयी थी, उस समय एक ही जेंडर के दो लोगों के बीच के सम्बन्धों या समलैंगिकता पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती थी।
योनि के प्रति आपका नज़रिया लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता

योनि के प्रति आपका नज़रिया लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता

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लोक संस्कृति कोई पेंडुलम नहीं है जो तत्समता और तद्भवता के बीच डोलती रहे। यह जनता की संस्कृति है जिसकी अपनी परिभाषायें हैं और अपने शब्द और सुर भी।

काश ! समाज में ‘जेंडर संवेदना’ उतनी हो कि स्त्री विमर्श का विषय न...

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लैंगिक विभेद की सख्त चट्टानों, मोटे-मोटे ढेलों से टकराने के बारम्बार के अनुभवों के कारण समानता की छद्म चेतना को बनाए रखना असम्भव हो गया।

मिनीमाता : छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद

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सन् 1913 में जन्मी मिनीमाता इसी तरह की ख़ास शख्सियत थीं। उनका असली नाम मीनाक्षी देवी था। उनकी कर्म-भूमि छत्तीसगढ़ प्रदेश रहा।
पुरुषत्व के सामाजिक दायरों की परतें खोलती किताब 'मोहनस्वामी'

पुरुषत्व के सामाजिक दायरों की परतें खोलती किताब ‘मोहनस्वामी’

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यह किताब अँग्रेजी और कन्नड साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अनूठी है क्योंकि इसमें कस्बों और गावों में यौनिक अल्पसंख्यकों की आवाज़ को उठाया गया है।
राजनीति को बदलने वाली महिलाओं को वोट देने से क्यों कतराते है हम?

राजनीति को बदलने वाली महिलाओं को वोट देने से क्यों कतराते है हम?

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राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना उन्हें न सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत करेगा बल्कि देश में सामाजिक संतुलन व शांति की संभावना भी बढ़ जाएगी।

गांधी के बहाने सच के प्रयोगों की बात

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गेराल्डाइन फोर्ब्स लिखती हैं कि यूरोप की नज़र में भारत एक अत्यंत पिछ्ड़ा हुआ देश था क्योंकि यहाँ की स्त्रियों की दुर्दशा जैसी दुनिया में कहीं नहीं थी।

जेसिका कॉक्स: बिना हाथों वाली दुनिया की पहली पायलट

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‘जेसिका कॉक्स’ दुनिया की ऐसी पहली महिला पायलट हैं जो पैरों से एरोप्लेन उड़ाती हैं और इतना ही नहीं वे विश्व की पहली लायसेंसधारी आर्मलेस पायलट हैं।

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ट्रेंडिंग

मैं एक महिला हूं और मुझे एनकाउंटर न्याय नहीं लगता

मैं एक महिला हूं और मुझे एनकाउंटर न्याय नहीं लगता

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महिलाओं के लिए यह विशेष तौर पर सचेत होने का वक्त है। सरकारें अपनी ओर से फास्ट ट्रैक कोर्ट, पुलिस रिफोर्म, प्रशासनिक कार्रवाई आदि पर जोर नहीं दे रही।
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

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भारत में स्त्री संघर्ष और स्त्री अधिकार के आन्दोलन को इसी रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है|
उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।