भारत में जाति केवल पहचान नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक ढांचा है जो लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और उनकी आवाज़ की अहमियत तय करता है। दलित समुदाय को लंबे समय तक मुख्यधारा से बाहर रखा गया है और अक्सर उनकी पहचान को सीमित कर दिया गया है। ऐसे में यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उन्हें अपनी बात रखने और मुख्यधारा में आने का मौका दे रहे हैं। अब वे सिर्फ़ मुद्दा नहीं, बल्कि अपनी कहानियों के लेखक हैं और अपनी आवाज़ में उस व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं, जिसने उन्हें लंबे समय तक दबाकर रखा।
डिजिटल स्पेस में हैशटैग सिर्फ ट्रेंड नहीं, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप का जरिया भी है। #दलित लाइव्स मैटर और #स्मैश ब्राह्मनिकल पैट्रियार्की जैसे अभियान दिखाते हैं कि सोशल मीडिया ज़मीनी असर डाल सकता है। एक्स (ट्विटर) पर ट्रेंड करता हैशटैग पॉलिटिकल स्टेटमेंट बन जाता है, वहीं इंस्टाग्राम रील्स के जरिए युवा वर्ग से जुड़ाव बनाता है। दूसरी ओर, यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स लंबे और विस्तृत कंटेंट के जरिए मुद्दों को गहराई से सामने लाते हैं। रोहित वेमुला केस, ऊना फ्लॉगिंग और हाथरस कांड जैसे मामलों को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में सोशल मीडिया की अहम भूमिका रही है।
द प्रिंट में प्रकाशित ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय मीडिया संस्थानों में 88 फीसद नेतृत्व पद कथित ‘उच्च’ जाति के व्यक्तियों के पास थे, जबकि 2023 तक एक भी दलित व्यक्ति को ऐसा पद नहीं मिला था।
#जस्टिस फॉर रोहित और #दलित लाइव्स मैटर जैसे हैशटैग्स ने न सिर्फ मुद्दों को उठाया, बल्कि ज़मीनी आंदोलनों को भी मजबूत किया। #ऊना फ्लॉगिंग का वायरल वीडियो और #हाथरस केस ने इन घटनाओं को देशभर में चर्चा का विषय बना दिया। डिजिटल स्पेस में कोई भी मुद्दा तेजी से बड़े स्तर तक पहुंच सकता है। जब मुख्यधारा मीडिया चुप रहता है, तब सोशल मीडिया इन मुद्दों के लिए ऑक्सीजन का काम करता है।
इस बारे में बातचीत के दौरान उत्तर प्रदेश के 36 वर्षीय स्कूल टीचर दीपक कुमार कहते हैं, “डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स खास तौर पर सोशल मीडिया हाशिये के समुदायों के लिए क्रांतिकारी साबित हो रहे हैं। दलित समुदाय के जिन मुद्दों पर मेनस्ट्रीम मीडिया चुप्पी साध लेता है, उनके लिए डिजिटल मीडिया सच्चाई को सामने लाने का ज़रिया बन रहा है। न्याय मिले या न मिले लेकिन इससे कम से कम लोगों को अन्याय का पता तो चलता है। इसके साथ ही यह हमें एकजुट करने का काम करता है, जिससे विषम परिस्थितियों में हम अकेले न पड़ जाएं। इससे हौंसला बढ़ता है और लड़ने की हिम्मत भी मिलती है।”
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स खास तौर पर सोशल मीडिया हाशिये के समुदायों के लिए क्रांतिकारी साबित हो रहे हैं। दलित समुदाय के जिन मुद्दों पर मेनस्ट्रीम मीडिया चुप्पी साध लेता है, उनके लिए डिजिटल मीडिया सच्चाई को सामने लाने का ज़रिया बन रहा है।
‘किरदार’ से ‘कहानीकार’ तक बदलती एजेंसी
मेनस्ट्रीम मीडिया में गेटकीपिंग हमेशा से एक समस्या के तौर पर मौजूद रहा है। यानी सत्ता के केंद्र में मौजूद कथित ऊंची जातियों का वर्चस्व यह तय करता आ रहा है कि किसको कितनी विजिबिलिटी मिलेगी। कौन सी आवाज़ सुनी जाएगी और किसे गायब कर दिया जाएगा इसका फ़ैसला जब कुछ चुनिंदा प्रिविलेज्ड लोग तय करेंगे। इसलिए अमूमन हाशिये के समुदायों के रोजमर्रा के मुद्दे गायब हो जाते हैं। हालांकि प्रगतिशीलता दिखाने के लिए या फिर ‘बैलेंस’ बनाने के लिए कई बार अगर इन्हें शामिल भी किया जाता है। लेकिन, एक किरदार के तौर पर ही जो कहानी का विषय तो हो सकता है लेकिन कहानीकार नहीं। साहित्य हो या सिनेमा या फिर मेनस्ट्रीम मीडिया, लंबे समय तक दलितों की भूमिका कहानी के किरदार के तौर पर सीमित रही। द प्रिंट में प्रकाशित ऑक्सफैम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय मीडिया संस्थानों में 88 फीसद नेतृत्व पद कथित ‘उच्च’ जाति के व्यक्तियों के पास थे, जबकि 2023 तक एक भी दलित व्यक्ति को ऐसा पद नहीं मिला था।
आज सोशल मीडिया समेत तमाम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स मेनस्ट्रीम मीडिया में मौजूद गेटकीपिंग को तोड़ने का काम कर रहे हैं। मूकनायक, दलित दस्तक, दलित कैमरा, राउंड टेबल इंडिया और बहुजन लाइव्स मैटर जैसे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के ज़रिए दलित समुदाय का एक तबका इस व्यवस्था को चुनौती देने का काम कर रहा है। ये न केवल जातिगत हिंसा और भेदभाव को दर्ज़ कर रहे हैं, बल्कि अंबेडकरवादी विचारधारा को टेक्स्ट, ऑडियो-वीडियो माध्यम से डिजिटल फॉर्मेट में सामने ला रहे हैं। दलित डेस्क की संपादक और को-फाउंडर बबीता गौतम ने द प्रिंट में प्रकाशित अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि सोशल मीडिया ने कहानी कहने का लोकतंत्रीकरण किया है। इसने दलितों और आदिवासियों को अपनी बात रखने, अपनी हक़ीक़त को बयान करने, मौजूद धारणाओं को चुनौती देने और उन मुद्दों को उजागर करने का अधिकार दिया है जिन्हें पहले मेनस्ट्रीम मीडिया अनदेखा या नजरअंदाज करता था।
आज सोशल मीडिया समेत तमाम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स मेनस्ट्रीम मीडिया में मौजूद गेटकीपिंग को तोड़ने का काम कर रहे हैं। मूकनायक, दलित दस्तक, दलित कैमरा, राउंड टेबल इंडिया और बहुजन लाइव्स मैटर जैसे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के ज़रिए दलित समुदाय का एक तबका इस व्यवस्था को चुनौती देने का काम कर रहा है।
सोशल मीडिया पर दलित महिलाओं की मौजूदगी
सोशल मीडिया ने दलित महिलाओं को अपनी बात रखने का एक अहम मंच दिया है। जाति और जेंडर की दोहरी मार का सामना करने वाली ये महिलाएं पहले सबसे ज्यादा हाशिये पर थीं, लेकिन अब यहां एकजुट होकर अपने अनुभव साझा कर रही हैं और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर दलित वीमेन फाइट और दलित फेमिनिस्ट जैसे मंच जाति और जेंडर दोनों पर बात कर रहे हैं। हालांकि, सुरक्षा के कारण कई महिलाओं को अब भी अपनी पहचान छुपानी पड़ती है।
सोशल मीडिया पर सक्रिय दलित कार्यकर्ता यामिनी (बदला हुआ नाम) अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं, “मैंने जब फेसबुक पर लिखना शुरू किया था तो अपने असली नाम से प्रोफाइल बनाया था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता मुझे महसूस हुआ कि अगर सेफ रहना है तो मुझे अपनी पहचान छुपानी पड़ेगी। जब मैं जातिवाद के ख़िलाफ़ लिखती तो कम से कम अपनी जाति के पुरुषों का सपोर्ट मिलता। लेकिन जैसे ही मैंने जेंडर पर बात की, ये लोग भी मुझे ट्रोल करने लगे। इसके बावजूद मैंने फेक आईडी बनाकर अपनी पहचान छुपा कर लिखना जारी रखा, क्योंकि मैं लिखना बंद नहीं कर सकती थी। इस समाज में दलित होना कठिन है और दलित स्त्री होना उससे भी ज़्यादा कठिन है।”
जब मैं जातिवाद के ख़िलाफ़ लिखती तो कम से कम अपनी जाति के पुरुषों का सपोर्ट मिलता। लेकिन जैसे ही मैंने जेंडर पर बात की, ये लोग भी मुझे ट्रोल करने लगे। इसके बावजूद मैंने फेक आईडी बनाकर अपनी पहचान छुपा कर लिखना जारी रखा, क्योंकि मैं लिखना बंद नहीं कर सकती थी। इस समाज में दलित होना कठिन है और दलित स्त्री होना उससे भी ज़्यादा कठिन है।
एल्गोरिदम में मौजूद पूर्वाग्रह और डिजिटल डिवाइड
यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ की एक रिसर्च बताती है कि सोशल मीडिया जहां दलित और वंचित समुदायों के लिए नए मौके खोलता है, वहीं एक नए तरह के भेदभाव को भी बढ़ावा देता है। एआई एल्गोरिदम अक्सर वही कंटेंट आगे बढ़ाते हैं जो पहले से मेनस्ट्रीम में होता है, जिससे दलित कंटेंट की पहुंच सीमित रह जाती है। यू बिलॉन्ग टू गटर नॉट फेसबुक ऑर ट्विटर: रिकवरिंग दलित हिस्ट्री फ्रॉम द शैडो ऑफ़ सोशल मीडिया नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर दलित समुदाय को तीन तरह के बायस का सामना करना पड़ता है—अनदेखा, अनसुना और अनकहा। यानी उनकी मौजूदगी और आवाज़ को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
इसके अलावा जब दलित समुदाय के व्यक्ति के साथ ऑनलाइन ट्रोलिंग या एब्यूज होता है और इस तरह के जातिवादी कंटेंट को रिपोर्ट किया जाता है तो अक्सर उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। इक्विटी लैब्स की 2019 की रिपोर्ट दिखाती है कि फेसबुक पर मौजूद 93 फीसद जातिवादी कंटेंट रिपोर्ट करने के बावजूद प्लेटफ़ॉर्म पर बने रहते हैं। लगातार ट्रोलिंग, एब्यूज और हैरसमेंट की वजह से बहुत सारे दलित एक्टिविस्ट अलग-थलग पड़ जाते हैं या फिर बोलना-लिखना बंद कर देते हैं। डिजिटल पब्लिक स्फेयर में ख़ास तौर पर दलित महिलाओं को डॉक्सिंग, बुलीइंग और ऑनलाइन हैरसमेंट का सामना करना पड़ता है। कई बार अपनी सुरक्षा के लिए इन्हें अपनी पहचान तक छुपानी पड़ती है जिससे विजिबिलिटी कम होती है। अब क्योंकि सोशल मीडिया भी हमारे समाज का ही हिस्सा है इसलिए यहां मौजूद पूर्वाग्रह समाज का ही आईना हैं, जहां एल्गोरिदमिक बायस और काउंटर-नैरेटिव की लड़ाई जारी रहती है।
एआई एल्गोरिदम उन्हीं कंटेंट को बढ़ावा देते हैं जो पहले से ही मेनस्ट्रीम में मौजूद है इससे दलित कंटेंट की पहुंच सीमित हो जाती है। सोशल मीडिया या दूसरे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के एल्गोरिदम अक्सर दलितों के इतिहास और मौजूद कंटेंट की रीच को कम कर देते हैं।
सोशल मीडिया ने दलित समुदाय के लोगों को अपनी बात रखने का मौका तो दिया है लेकिन यहां सवाल यह भी है कि क्या सभी इस सुविधा का समान रूप से इस्तेमाल कर पा रहे हैं? स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल लिटरेसी सभी के पास नहीं है। ख़ासकर गरीब तबकों और पिछड़े गांवों में आज भी इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच सीमित है। उसमें भी दलित समुदाय की महिलाओं का नंबर सबसे आख़िर में आता है। कहने के लिए तो डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर सभी को बराबर मौका मिल रहा है लेकिन डिजिटल डिवाइस अब भी एक बड़ी समस्या है।
क्या हो सकता है आगे का रास्ता
सोशल मीडिया ने दलित समुदाय के लिए अपनी कहानी, संघर्ष, अनुभव और विचार साझा करने के लिए रास्ता खोला है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की गेटकीपिंग को चुनौती देता है। यह दलित समुदाय की एजेंसी को बढ़ाता है लेकिन अभी भी डिजिटल डिवाइड, एल्गोरिदम में मौजूद पूर्वाग्रह, तकनीकी ग़ैर बराबरी और सेफ स्पेस की कमी इसके रास्ते में बड़ी चुनौतियां हैं। इसके अलावा समाज में मौजूद जातिगत भेदभाव और जेंडर डिस्क्रिमिनेशन का असर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर भी दिखता है। सोशल मीडिया तक समान पहुंच और अवसर केवल तकनीकी मामला नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और बराबरी का सवाल भी है। जब तक यह भेदभाव दूर नहीं होगा, तब तक दलित समुदाय की आवाज़ समाज तक नहीं पहुंच पाएगी। सोशल मीडिया कोई जादू का समाधान नहीं है, बल्कि संघर्ष का एक मंच है। इसलिए जब तक डिजिटल और ज़मीनी संघर्ष साथ-साथ नहीं चलते, तब तक सामाजिक बदलाव अधूरा ही रहेगा।

