इंटरसेक्शनल बहुप्रेम क्या है और क्यों जरूरी है इसे समझना: रिश्तों की नई सोच पर एक नज़र

बहुप्रेम क्या है और क्यों जरूरी है इसे समझना: रिश्तों की नई सोच पर एक नज़र

विवाद इस बात पर नहीं है कि आप किससे प्रेम कर सकते हैं, बल्कि इस बात पर है कि आप एक ही समय में कितने लोगों से प्रेम कर सकते हैं। हमारा समाज आज भी ऐसा है, जहां तलाक को लेकर पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है और एक से अधिक व्यक्तियों के साथ प्रेम संबंध रखने वाले लोगों को घृणा या शर्म की दृष्टि से देखा जाता है।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में बचपन से ही हम अक्सर अपने परिवार और दोस्तों के दिखाए गए दृश्यों, किताबों में पढ़ी गई बातों और टीवी पर दिखाई जाने वाली जीवनशैली के आधार पर अपने जीवन की कल्पना करते आए हैं। हालांकि हम इस विचार के आदी हो गए हैं कि हम एक साथ कई दोस्तों, परिवार के सदस्यों और बच्चों को प्यार और सम्मान दे सकते हैं। फिर भी, इसके विपरीत, हमने यह धारणा भी बना ली कि रोमांटिक प्रेम केवल उस ‘एक खास व्यक्ति’ के लिए ही होता है। जबकि यह ठीक भी है अगर यह सफल हो तो। लेकिन क्या होगा अगर एक ही जीवनसाथी या रोमांटिक पार्टनर होने की अवधारणा हर किसी के लिए काम न करे? बदलते समय के साथ – साथ व्यक्तिगत आज़ादी और पहचान के बीच अब लोग रिश्तों को अलग नज़रिए से देखने लगे हैं। इसी बदलती सोच के केंद्र में बहु प्रेम (पॉलीमोरी) का एक अलग कांसेप्ट उभरकर सामने आया है। 

पॉलीमोरी का शाब्दिक अर्थ वही है, जो इसके नाम से स्पष्ट होता है ‘पॉली’ ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘कई’ और ‘अमोर’ लैटिन शब्द है जिसका अर्थ ‘प्यार’ होता है यानी ‘कई प्यार’। इस प्रकार, जब इसे रिश्तों पर लागू किया जाता है, तो इसका मूल रूप से अर्थ है कि हम एक ही समय में कई लोगों से प्यार कर सकते हैं। लेकिन यह सब सभी पार्टनर्स की पूर्ण सहमति, के साथ होता है। हालांकि एक्सपैंसिव थेरेपी में छपे लेख के मुताबिक, मनोवैज्ञानिक इसे नैतिक रूप से अपनाए जाने पर एक वैध और संभावित रूप से संतुष्टिदायक संबंध संरचना मानते हैं। वे एकाधिक संबंधों को प्रबंधित करने में संचार, सहमति और सीमा निर्धारण के महत्व पर जोर देते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि कई प्रेम संबंधों में रहने वाले व्यक्ति एक व्यक्ति के साथ संबंधों में रहने वालों के समान ही संबंध संतुष्टि का अनुभव कर सकते हैं। हालांकि,इससे से जुड़े कलंक और मिथक कई प्रेम संबंध रखने वाले व्यक्तियों के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।

पॉलीमोरी का शाब्दिक अर्थ वही है, जो इसके नाम से स्पष्ट होता है ‘पॉली’ ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘कई’ और ‘अमोर’ लैटिन शब्द है जिसका अर्थ ‘प्यार’ होता है यानी ‘कई प्यार’। इस प्रकार, जब इसे रिश्तों पर लागू किया जाता है, तो इसका मूल रूप से अर्थ है कि हम एक ही समय में कई लोगों से प्यार कर सकते हैं। लेकिन यह सब सभी पार्टनर्स की पूर्ण सहमति के साथ होता है।

इतिहास और पृष्ठभूमि

बहुप्रेम (पॉलीमोरी) शब्द साल 1990 में प्रचलित हुआ और साल 1999 तक इसे आधिकारिक रूप से परिभाषित किया गया था। द इंडियन एक्सप्रेस मुताबिक, बहुविवाही संबंधों का इतिहास प्राचीन काल से चला आ रहा है, जिसका प्रमाण इतिहास और पुराण जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है, जो प्राचीन संस्कृतियों में लंबे समय से बहुपति और बहुपत्नी प्रथा रही है। हालांकि यह उससे अलग है, क्योंकि यह शादी पर आधारित नहीं, बल्कि सहमति और समानता पर आधारित है। पश्चिम में साल 1960-70 के दशक के ‘फ्री लव’ आंदोलन और कम्यूनों में इसका प्रभाव दिखा।

 फैंडम में छपे एक लेख के मुताबिक, इसे एक ‘क्वीयर पहचान’ के साथ जोड़ना थोड़ा विवादित है, क्योंकि यह सिर्फ रिश्तों के तरीके से जुड़ा है, न कि किसी व्यक्ति की पहचान और उसकी यौनिकता से। इसलिए यह केवल एलजीबीटीक्यूआईए+ लोगों तक सीमित नहीं है, जो लोग सिसजेंडर और हेटेरोसेक्सुअल हैं। वे भी पॉलीमोरस हो सकते हैं। हालांकि यह अभी भी आम नहीं है। लेकिन लगभग 4 फीसदी लोग इसे अपनाते हैं और करीब 17 फीसदी लोग इसके लिए खुले हैं।धर्म की बात करें तो, ज़्यादातर मुख्यधारा के ईसाई और यहूदी धर्म इसे स्वीकार नहीं करते। लेकिन कुछ धार्मिक समूह और समुदाय ऐसे भी हैं, जो पॉलीमोरी को समझते या समर्थन करते हैं। 

इसे ‘क्वीयर पहचान’ के साथ जोड़ना थोड़ा विवादित है, क्योंकि यह सिर्फ रिश्तों के तरीके से जुड़ा है, न कि किसी व्यक्ति की पहचान और उसकी यौनिकता से। इसलिए यह केवल एलजीबीटीक्यूआईए+ लोगों तक सीमित नहीं है, जो लोग सिसजेंडर और हेटेरोसेक्सुअल हैं। वे भी पॉलीमोरस हो सकते हैं।

भारत में बहुप्रेम की अवधारणा

भारत में पॉलीमोरी अभी भी काफी टैबू का विषय है। पारंपरिक समाज, परिवार और संस्कृति मोनोगैमी (एकल प्रेम) को ही आदर्श मानती है। यहां बहुविवाह कानूनी रूप से ज्यादातर समुदायों में प्रतिबंधित है (मुस्लिम पुरुषों को छोड़कर), लेकिन पॉलीमोरी कानूनी रूप से शादी नहीं होती, इसलिए यह अलग मुद्दा है। टेलीग्राफ इंडिया में छपे एक लेख के मुताबिक, अरुंधति घोष की प्रभावशाली पुस्तक, ‘ऑल अवर लव्स: जर्नीज़ विद पॉलीमोरी इन इंडिया’, हमें याद दिलाती है कि भले ही इस देश में क्वीयर और जेंडर-फ्लूइड लोगों का संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। लेकिन एक और समूह है, जो नैतिक रूप से हाशिए पर और भी दूर है, जो लोग चाहे वे स्ट्रेट हों या क्वीयर एक समय में एक से ज्यादा रिश्तों में होते हैं।वे समाज की पारंपरिक सोच को ज्यादा चुनौती देते हैं। विवाद इस बात पर नहीं है कि आप किससे प्रेम कर सकते हैं, बल्कि इस बात पर है कि आप एक ही समय में कितने लोगों से प्रेम कर सकते हैं। हमारा समाज आज भी ऐसा है, जहां तलाक को लेकर पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है और एक से अधिक व्यक्तियों के साथ प्रेम संबंध रखने वाले लोगों को घृणा या शर्म की दृष्टि से देखा जाता है। 

इसके साथ ही भारत में बहु प्रेमी जोड़ों के सामने सबसे बड़ी बाधा यह धारणा है कि यह केवल यौन संबंधों से जुड़ा हुआ है। भारत में यौन संबंध एक ऐसा विषय है, जिस पर चर्चा लंबे समय तक वर्जित रही है। अगर इसमें होमोसेक्सुअल पहचान और महिला सशक्तिकरण को भी जोड़ दिया जाए, तो यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है। हालांकि कई लोगों से प्यार करना और उन सभी की परवाह करना संभव है। ऐसे रिश्तों में रहने वाले लोगों में कोई बुराई नहीं है, और अब समय आ गया है कि हम उन्हें इस नजरिए से देखना बंद करें।निश्चित रूप से, सकारात्मक मीडिया मददगार साबित हो सकती है। इस विषय पर बनी साल 2012 की एक फिल्म 3 ऑन अ बेड में भारत के सेंसर बोर्ड की समस्याओं का जिक्र किया गया था। हालांकि बहुप्रेम को सकारात्मक रूप से सार्वजनिक मंच पर लाने के प्रयास किए जाने के बावजूद, ऐसी परिस्थितियों में सफलता नहीं मिल सकती। व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से प्रेरित सेंसर नीतियां लाभ से अधिक हानि पहुंचा सकती हैं और उन विचारों को मिटा सकती हैं जो भारतीय जनता के लिए सवाल पैदा करने वाला साबित हो सकता है।

विवाद इस बात पर नहीं है कि आप किससे प्रेम कर सकते हैं, बल्कि इस बात पर है कि आप एक ही समय में कितने लोगों से प्रेम कर सकते हैं। हमारा समाज आज भी ऐसा है, जहां तलाक को लेकर पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है और एक से अधिक व्यक्तियों के साथ प्रेम संबंध रखने वाले लोगों को घृणा या शर्म की दृष्टि से देखा जाता है।

इसके फायदे, चुनौतियां और विवाद 

 एक्सपैंसिव थेरेपी में छपे लेख के मुताबिक,अधिक भावनात्मक समर्थन यानी कई पार्टनर्स से अलग-अलग तरह का प्यार, सपोर्ट और सलाह मिल सकती है।अकेलापन कम होता है, व्यक्तिगत विकास यानी एक से अधिक रिश्तों को संभालने से संचार कौशल और भावनात्मक बुद्धिमत्ता में सुधार हो सकता है।अलग-अलग साथी विभिन्न भावनात्मक और बौद्धिक ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं। हालांकि बहु प्रेम का मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव हो सकते हैं, जो व्यक्तिगत परिस्थितियों और रिश्तों को निभाने के तरीके पर निर्भर करता है। संभावित लाभों में भावनात्मक समर्थन में बढौतरी और व्यक्तिगत विकास शामिल हैं। हालांकि, ईर्ष्या, समय की कमी और समाज के ताने जैसे कारण मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि लोग अपनी ज़रूरतों और सीमाओं को समझें और अपने साथी से खुलकर बात करें, ताकि उनका रिश्ता उनके लिए अच्छा और संतुलित बना रहे।

बहुप्रेम एक पहचान का शब्द है, लेकिन क्या बहुप्रेम एक यौन अभिविन्यास है या नहीं , इस पर बहस होती रही है। कुछ बहुप्रेमी लोग इसे एक विकल्प या जीवनशैली मानते हैं जिसका वे जीवन भर पालन नहीं करते। अन्य लोग बहुप्रेम को एक सहज इच्छा मानते हैं जिसका उन्होंने जीवन भर अनुभव किया है और जिसे वे बदल नहीं सकते, जो अपने यौन अभिविन्यास को बहुप्रेम के रूप में पहचानते हैं। भारतीय समाज में जहां अब भी पितृसत्ता और एकल संबंध (मोनोगैमी) को ही आदर्श माना जाता है, वहां बहुप्रेम (पॉलीमोरी) जैसी अवधारणाएं स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती हैं। यह केवल रिश्तों का एक अलग तरीका नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आज़ादी, सहमति और ईमानदार संवाद पर आधारित एक दृष्टिकोण है। हालांकि इसके साथ सामाजिक कलंक, गलतफहमियां और कानूनी अस्पष्टताएं जुड़ी हुई हैं, फिर भी बदलते समय के साथ लोग अपने रिश्तों को नए नजरिए से समझने और जीने की कोशिश कर रहे हैं।जरूरी यह नहीं कि कौन-सा रिश्ता सही है, बल्कि यह कि वह सभी शामिल लोगों के लिए सम्मानजनक, सुरक्षित और संतुलित हो। इसलिए, बहुप्रेम को लेकर पूर्वाग्रहों के बजाय संवेदनशीलता, समझ और खुले संवाद की ज़रूरत है, ताकि हर व्यक्ति अपने तरीके से प्यार और रिश्तों को जीने की आज़ादी महसूस कर सके।

About the author(s)

मेरा नाम सविता है और मैं हिमाचल प्रदेश से हूँ । मैंने एक साल का जेंडर फेलोशिप प्रोग्राम हिमाचल क्वीयर फाउंडेशन के साथ पूरा किया है। इसके अलावा, मुझे 'बोबो दियां गल्लां' ग्रामीण पत्रकारिता में एक साल का अनुभव है। मुझे  कहानियाँ और कविताएँ लिखना बहुत अच्छा लगता है और साथ ही तस्वीरें लेने का भी बहुत शौक है।

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