ख़ास बात : दिल्ली में रहने वाली यूपी की ‘एक लड़की’ जो नागरिकता संशोधन...

1
सीएए के विरोध की मुख्य वजह ये है कि भारत में नागरिकता का आधार धर्म नहीं हो सकता। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और यह हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
शहर में औरत होना : क्योंकि कोई शहर एक औरत को संविधान वाली आज़ादी नहीं देता

शहर में औरत होना : क्योंकि कोई शहर एक औरत को संविधान वाली आज़ादी...

1
ऐसा भी नहीं है कि ये दूसरे शहर मुझे संविधान वाली आज़ादी देते हैं। यहाँ तो ख़ुद को अपने सामान की तरह सँभालकर चलना पड़ता है।
नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग की औरतों का सत्याग्रह

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग की औरतों का सत्याग्रह

3
संविधान बचाने की इस लड़ाई में शाहीन बाग की औरतें एक मिसाल कायम कर चुकी हैं, उनका आंदोलन अब सत्याग्रह में बदल चुका है- संविधान को बचाने का सत्याग्रह।
नागरिकता संशोधन क़ानून का 'इस्लामोफ़ोबिक' हिस्सा : माने धर्म की आड़ में, देश के बुनयादी मुद्दे से भटकाने का सरकारी पैतरा

नागरिकता संशोधन क़ानून का ‘इस्लामोफ़ोबिक’ हिस्सा : माने धर्म की आड़ में, देश के...

4
सरकार ने सीएए और एनआरसी को समझने की उधेड़-बुन ने देशभर को इस तरह उलझा दिया है कि देश की बुनियादी समस्याओं पर चर्चा करना तो क्या हमने विचार करना भी छोड़ दिया।

नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ विदेशों में भी विरोध

2
राष्ट्र में हर तरफ सीएए व एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन चल रहे हैं। प्रदर्शनों की यही लहर भारत की सीमा के पार अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी देखने को मिल रही है।
नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में लखनऊ से गिरफ़्तार सदफ़ ज़फ़र और हिंसा का रूप दिखाती 'डरी हुई सत्ता'

नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में लखनऊ से गिरफ़्तार सदफ़ ज़फ़र और हिंसा का...

0
सामाजिक मुद्दों और जनसरोकारों में सक्रिय दो बच्चों की सिंगल मदर सदफ़ ज़फ़र, एक सशक्त महिला भी है, जो अपने विरोध को बुलंद स्वरों में दर्ज करना जानती है।
नागरिकता संशोधन कानून : हिंसा और दमन का ये दौर लोकतंत्र का संक्रमणकाल है

नागरिकता संशोधन कानून : हिंसा और दमन का ये दौर लोकतंत्र का संक्रमणकाल है

6
हिंसा चाहे किसी भी ओर से बुरी है, लेकिन इसके नामपर लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को दबाना सीधेतौर पर लोकतंत्र की आत्मा को मारना जैसा है।
औरत के खाँचे की नहीं ‘इंसान’ बनने की बात है बस!

औरत के खाँचे की नहीं ‘इंसान’ बनने की बात है बस!

0
एक औरत को सिर्फ अच्छी या बुरी बना देना उसके इंसान होने की पहचान पर हावी कर दी जाती है, उसकी ख्वाहिशे हों तो व बुरी, न हों, तो अच्छी।
नागरिकता संशोधन क़ानून : विरोधों के इन स्वरों ने लोकतंत्र में नयी जान फूंक दी है...

नागरिकता संशोधन क़ानून : विरोधों के इन स्वरों ने लोकतंत्र में नयी जान फूंक...

1
इस एक क़ानून ने भारतीय संविधान की आत्मा कहे जाने वाले मौलिक अधिकारों को ताक़ पर रखकर देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब में फ़ांक डालने की पहल की है।
ब्राह्मणवाद

भारत में उभरती रेप संस्कृति के लिए ब्राह्मणवादी मानसिकता है जिम्मेदार

0
स्त्री विरोधी संस्कृति को सामान्यतः पितृसत्तात्मक विचारधारा से जोड़ कर देखा जाता है लेकिन पितृसत्ता की जड़ें ब्राह्मणवाद के भूमि पर हीं जन्म लेती है।

फॉलो करे

4,907FansLike
862FollowersFollow
290FollowersFollow

ट्रेंडिंग

सपना राठी का वीडियो वायरल करना समाज की पितृसत्तात्मक घटिया मानसिकता है

सपना राठी का वीडियो वायरल करना समाज की पितृसत्तात्मक घटिया मानसिकता है

0
सपना राठी का विरोध उनके विचारों के आधार पर किया जाना चाहिए। न की उनके शरीर और शारीरिक संबंधों के आधार पर चारित्रिक टिप्पणी करके।
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

2
संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

4
गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
थप्पड़

‘थप्पड़’ – क्यों मारा, नहीं मार सकता।’- वक्त की माँग है ये ज़रूरी सवाल

0
मर्दों को पीटने का हक किसने दिया, वे अपने जीवनसाथी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं। यही सवाल पूछती नज़र आती है तापसी पन्नू और अनुभव सिन्हा की नई फिल्म- थप्पड़।
पीरियड

हमारे समाज में पीरियड का क़िस्सा : भुज में ‘पीरियड’ के दौरान भेदभाव और...

0
स्वामी कृष्णस्वरुप की इन बातों से साफ़ है कि किस तरह धर्म की हवा शिक्षा पर न केवल हावी होती है, बल्कि उसकी जड़ों को भी दीमक की तरह खोखली करने लगती है।