हिंदी में होगी अब जेंडर और नारीवाद की बात फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ
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This post was originally published in In Plainspeak, TARSHI's online magazine on sexuality in the Global South. TARSHI supports and enables people's control and agency over their sexual and reproductive health and well-being through information dissemination, knowledge and perspective building within a human rights framework.

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पर्दे पर दिखनेवाली आदर्श औरत के खांचे को तोड़ना ज़रूरी है

पर्दे पर दिखनेवाली ‘आदर्श’ औरत के खांचे को तोड़ना ज़रूरी है

भारतीय सिनेमा महिलाओं की स्थिति को एक हद तक समझता तो है और उनपर काम करने की सोचता भी है लेकिन उन्हें आदर्श दिखाने की होड़ में जो अहम् मुद्दे है उनसे भटक हो जाता है और इसी वजह से फिल्म का उद्देश्य कारगर साबित नहीं होता है।
नारीवादी डॉ भीमराव अम्बेडकर : महिला अधिकारों के लिए मील का पत्थर साबित हुए प्रयास

नारीवादी डॉ भीमराव अंबेडकर : महिला अधिकारों के लिए मील का पत्थर साबित हुए...

महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई डॉ. भीमराव अंबेडकर ने वर्षो पहले ही शुरू कर दी थी| उन्होंने साल 1942 से महिला अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की|
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

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