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स्मिता वन्नियर

मैं एक नॉन-बाइनरी व्यक्ति (जो जेंडर को महिला-पुरुष युग्मक तक सीमित नहीं मानते) हूँ, जिसका जन्म के समय जेंडर निर्धारण लड़की के रूप में हुआ। इस समय मेरी रिहाइश मुंबई में है। मेरी वेशभूषा और पहनावा ऐसा जिसे आप पुरुषों का पहनावा कह सकते हैं। आप मुझे कमीज़, टी-शर्ट, पैंट, निक्कर या शॉर्ट्स और ‘आदमियों’ वाले जूते पहने हुए पाएँगे। मेरे बाल छोटे कटे हुए हैं, मेरी त्वचा गहरे रंग की है, मेरे स्तन, आमतौर पर दिखाई नहीं देते और मुझे ये ऐसे ही पसंद है। मुझे लगता है कि मेरी शारीरिक वेशभूषा उभयलिंगी है, लेकिन अधिकांश लोग मुझे पुरुष ही समझ लेते हैं। आगे चलकर आप जैसे-जैसे इस लेख को पढ़ेंगे तो आप समझ जाएँगे कि अपने बारे में यह सब विवरण विस्तार से बताने के पीछे मेरा कारण क्या है। 

इससे पहले कि हम सार्वजनिक स्थानों और यौनिकता के बारे में आगे बात करें, आइए पहले एक कदम पीछे हटकर सार्वजनिक स्थानों और जेंडर के बारे में कुछ विचार करें। सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की क्या स्थिति है, यह तो हम सभी भली-भांति जानते ही है। हमें पता है कि रास्ते पर चलते हुए, बसों में, टैक्सी या ऑटो में, शॉपिंग माल, दुकानों, रेस्तरां आदि में महिलाओं को किस तरह की परेशानी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। हमें उन सार्वजनिक स्थानों की भी जानकारी है जिन्हें आमतौर पर महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान समझा जाता है, जैसे कि – मेट्रो और ट्रेन में महिलाओं के लिए आरक्षित महिला कोच, महिला शौचालय, महिला प्रतीक्षालय, नारीवादी सम्मेललन और गोष्ठियाँ और यहाँ तक कि दिन के समय में आवाजाही के सामान्य मार्ग। हो सकता है कि ये स्थान हर समय महिलाओं के लिए सुरक्षित न हों, लेकिन आमतौर पर ऐसा ही माना जाता है कि ये स्थान दूसरे स्थानों के मुक़ाबले महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित होते हैं, खासतौर पर सूर्यास्त से पहले। लेकिन जैसा कि मेट्रो स्टेशनों को देखकर लगता है कि महिलाओं के लिए सुरक्षित समझे जाने वाले किसी भी स्थान को वास्तव में सुरक्षित करने का एकमात्र हल यह है कि उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में गुलाबी रंग से ‘केवल महिलाएँ’ लिख दिया जाए। या फिर जैसे कि मुंबई की लोकल ट्रेन में दिखता है, एक गोरी त्वचा वाली महिला का चिर-परिचित चित्र चिपका दिया जाए, जिनकी साड़ी का पल्लू कस कर उनके सर पर लिपटा हुए होता है। 

जेंडर के आधार पर जगहों को बाँटकर उन्हें पुरुषों या महिलाओं के लिए सुरक्षित कर देना केवल उन्हीं लोगों के लिए कारगर हो सकता है जो पुरुष या महिला की इस बाइनरी या द्विगुण वाली परिभाषा में आते हैं। तो ऐसे में, सार्वजनिक स्थानों पर उन सभी लोगों का क्या होगा जो महिला या पुरुष की इस दो श्रेणी की बाइनरी के बीच कहीं है या इसके परे हैं?

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अभी केवल दो वर्ष पहले तक, मेरे लंबे बाल थे। साफ़ है, कि यह मेरे लिए एक महिला के रूप में पहचाने जाने के लिए काफ़ी था। जब से मैंने खुद को सक्रिय रूप से एक नॉन–बाइनरी व्यक्ति के रूप में देखना शुरू किया और मेरी वेशभूषा और पहनावा भी नॉन–बाइनरी दिखने लगा, तब से इन सार्वजनिक स्थानों के साथ मेरे सम्बन्धों में बहुत अधिक परिवर्तन आया है, यहाँ तक कि, महिलाओं के लिए खासतौर पर आरक्षित स्थानों पर भी, जिन्हें महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान समझा जाता है। पिछले दो वर्षों में, मुझे कई बार पुरुषों के शौचालय में, या एयरपोर्ट, शॉपिंग मॉल अथवा सिनेमा घर में पुरुषों की सुरक्षा जाँच की लाइन में जाने के लिए कहा गया है या फिर अनेक बार पुरुषों के लिए बने कपड़े बदलने के कमरे में भेजा गया है।

आम तौर पर मुझे मिलने वाले इन निर्देशों को अनसुना कर देना या फिर अगर ज़रूरत पड़े तो बताने वाले व्यक्ति को वास्तविकता बताना और महिलाओं की कतार की ओर चले जाना (क्योंकि मैं और कहाँ जाऊं?) बेहतर लगता है। पिछले वर्ष दिल्ली एयरपोर्ट पर सुरक्षा जाँच के लिए महिलाओं की लाइन में खड़े होने पर वहाँ तैनात महिला सुरक्षाकर्मी ने मुझे कहा कि यह लाइन महिलाओं के लिए है। मैंने उनसे कहा कि हाँ, मुझे मालूम है और मैं भी महिला हूँ,  जाँच के छोटे से कैबिन की ओर बढ़ते हुए मैंने कहा। इस पर सुरक्षाकर्मी ने फिर पूछा, “क्या आप पक्का औरत हो?”, जैसे कि दोबारा पूछने से मेरा जवाब बादल जाएगा। ऐसा कहकर उन्होंने मेरे बदन पर मेटल डिटेक्टर घुमाना शुरू किया और मेरे वक्ष पर थोड़ा ज़ोर से दबाते हुए इस डिटेक्टर को फिराने लगीं। मुझे पहले तो बहुत बुरा लगा और फिर मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उनके सूपर्वाइज़र से बात करने और उनकी शिकायत करने का फ़ैसला किया। अगर एक पुरुष सुरक्षाकर्मी मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकता, तो किसी महिला सुरक्षाकर्मी के लिए भी इस तरह का व्यवहार करना कहाँ तक ठीक है। जैसा कि मुझे पहले ही उम्मीद थी, मेरे शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।    

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मुझे सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल करने में भी काफी घबराहट होती है, खासकर तब जब इनके बाहर शौचालय अटनडैन्ट खड़े रहते हैं। पिछले ढाई महीनों में, मेरे साथ सात बार ऐसा हो चुका है जब महिला शौचालय के बाहर खड़ी महिला अटेनडैन्ट ने जबर्दस्ती मेरे सीने पर हाथ रखकर मुझे बाहर धकेलने की कोशिश की है। ऐसा वहाँ खड़ी अटेनडैन्ट और शौचालय का प्रयोग करने के लिए खड़ी, दूसरी महिलाओं, दोनों द्वारा किया जा चुका है। दो सप्ताह पहले, बैंक में एक महिला ने मुझे बाज़ू से पकड़ा, मुझे घसीटती हुई बाहर ले आई और मुझसे मेरा पहचान पत्र दिखाने की मांग की। वह महिला भी मेरी ही तरह बैंक में आई बैंक की कोई ग्राहक थी। अब तो स्थिति ऐसी हो चुकी है कि कहीं बाहर जाते समय मैंने पानी पीना बंद कर दिया है ताकि बाहर जाकर मुझे शौचालय का इस्तेमाल न करना पड़े।     

सुरक्षा के नामपर हमने सार्वजनिक स्थानों को जेंडर के आधार पर इस तरह बाँट दिया कि यही सुरक्षित स्थान अब लोगों के एक पूरे समूह के लिए असुरक्षित बन गए हैं।

मैं भाग्यशाली हूँ कि मेरा काम एक ऐसे नारीवादी गैर-सरकारी संगठन के साथ है जहाँ क्विअर लोगों के साथ सहयोग किया जाता है, यहाँ मेरे सभी सहकर्मी साथी मेरे प्रति सहायक रवैया रखते हैं। लेकिन अपने काम के सिलसिले में मुझे कई जगह बाहर जाना होता है और वे सभी जगहें मुझे अपने लिए सुरक्षित नहीं लगतीं। नारीवादी सम्मेलनों में आमतौर पर दूसरी महिलाओं और कभी-कभी दूसरे क्विअर या ट्रांस लोग भी मुझे मेरे जेंडर को लेकर भ्रम में पड़ जाते हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से इस बात को लेकर कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि मुझे यह परवाह नहीं है कि दूसरे लोग मुझे किस निगाह से देखते हैं और इसीलिए मुझे इससे कोई तकलीफ़ भी नहीं होती। (लेकिन ज़रूरी नहीं है कि मेरी तरह दूसरे सभी लोग भी इस स्थिति में सहज महसूस करें क्योंकि बहुत से क्विअर और ट्रांस लोग खुद को उसी पहचान में संबोधित किया जाना पसंद करते हैं जो वे खुद को समझते हैं)। बहुत बार मैंने यह महसूस किया है कि दूसरे लोग मुझसे यह जानना चाहते हैं कि वे मुझे किस तरह से संबोधित करें ताकि वे कहीं गलत न हों। कई कार्यशालाओं में जहाँ हम समन्वय के काम करते थे, वहाँ बहुत से लोगों को दुविधा थी और वे मेरे सीने की ओर देखते हुए यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि मुझे किस वर्ग में रखा जाए। मुझे तब बिलकुल कुछ समझ नहीं आता कि मैं क्या करूँ जब वे स्थान जिन्हें महिलाओं और क्विअर लोगों के लिए सुरक्षित समझा जाता है, वे भी उनके लिए सुरक्षित नहीं प्रतीत होते। मुझे यह तो समझ में आता है कि बहुत बार जब कोई महिला या पुरुष मुझे पूछते है कि मैं एक महिला हूँ अथवा पुरुष, तो ज़ाहिर है कि वे ऐसा अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछ रहे होते हैं क्योंकि शायद इससे पहले वे मेरे जैसे दिखने वाले किसी व्यक्ति से न मिले हों। यहाँ तक तो ठीक है और मुझे उनके इन प्रश्नों के जवाब देने में सहज लगता है। लेकिन मेरे मन में बार-बार यही सवाल उठता रहता है कि लोगों के इस तरह के व्यवहार में मैं, सही और गलत में अंतर कैसे करूँ। 

पिछले साल जुलाई में, रात के समय घर जाने के लिए ऑटो लेते समय मुझ पर हमला हो गया। मैंने चूंकि ऑटो एक एप के माध्यम से बुक किया था, इसलिए मैंने उस ड्राईवर के खिलाफ़ शिकायत दर्ज की। जब इस कंपनी ने शिकायत की छानबीन की, तो उन्होंने आपस में इस बात की भी चर्चा की कि क्या वाकई मैं एक महिला हूँ या नहीं। उन्होंने ऐसा ऑनलाइन मेरी कुछ तस्वीरें देखने के बाद किया, मानो एक पुरुष पर हमला हो जाना तो कोई असाधारण बात नहीं है। अब ऐसी परिस्थिति में जेंडर की, कहीं भी कोई भूमिका है क्या?

सुरक्षा के नामपर हमने सार्वजनिक स्थानों को जेंडर के आधार पर इस तरह बाँट दिया कि यही सुरक्षित स्थान अब लोगों के एक पूरे समूह के लिए असुरक्षित बन गए हैं और यह समूह उन लोगों का है जो समाज में केवल ‘पुरुष’ या ‘महिला’ के रूप में नहीं पहचाने जाते बल्कि उन्हें समाज में ‘अलग तरह का’ समझा और माना जाता है। मुझे इस वास्तविकता का भी पता है कि एक मेट्रो शहर में रहने और अँग्रेजी बोल पाने के कारण मुझे कुछ विशेषाधिकार मिले हैं, लेकिन अंत में सच्चाई यही है कि जब कोई मुझे धमकाने या मेरे साथ धक्का-मुक्की केवल इसलिए करने लगता है कि मैंने शौचालय का प्रयोग करने की कोशिश की थी, तब उस स्थिति में, मेरे ये विशेषाधिकार धरे के धरे रह जाते हैं।  

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और अगर आप जेंडर के साथ-साथ यौनिकता को भी जोड़ दें तो स्थिति और भी पेचीदा हो जाती है। एक बार मैं और मेरी एक मित्र राजस्थान गए थे और हम दोनों ही ‘गलती से महिलाएँ‘ अपनी पूरी शान-ओ-शौकत में घूम रहे थे। घूमते हुए मेरी मित्र ने मुझसे कहा, ‘मुझे लगता था कि लोग मुझे ही घूरते हैं। लेकिन अब जब कि हम दोनों साथ हैं, तब ज़्यादा लोग हमें घूर रहे हैं’। और जब भी हम बाहर कहीं निकलते, लोगों का हमें इस तरह घूरना मानो एक नियम सा ही बन गया था, फिर वह चाहे मुंबई हो या दिल्ली, शॉपिंग मॉल हो, ग्रोसरी स्टोर हो, एयरपोर्ट हो, ऑटो में हो, मेट्रो में हो, स्थानीय सिनेमा घर हो या फिर चाहे सार्वजनिक शौचालय ही क्यों न हो। मेरे लिए स्थिति तब आसान होती है जब हम दोनों साथ होते हैं, या दोस्तों अथवा दूसरे क्विअर लोगों के बीच होते हैं, लेकिन कुल मिलकर यह बहुत सरल नहीं होता। 

जैसा कि प्रसिद्ध क्विअर विद्वानी जूडिथ बटलर (Judith Butler) ने कहा है, “वे लोग जो अभी भी संभावनाओं के दायरे में आने की कोशिश में हैं, उनके लिए ऐसा करना एक ज़रूरत ही है”। वाकई, ऐसा करना ज़रूरी है, लेकिन यह कहना आसान है, कर पाना कहीं मुश्किल। जब कोई व्यक्ति शांति से अपना जीवन जीना चाहते हैं लेकिन रह-रहकर, दिन-प्रतिदिन हर जगह, अगर उन्हें अपने जीवन की उसी कड़वी सच्चाई का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़े, तब ऐसे में महसूस होता है कि दूसरों से अलग होना और स्वीकृत सामाजिक मान्यताओं से हटकर जीना कितना ज़रूरी होता है, न केवल खुद के लिए बल्कि उन सभी दूसरे लोगों के लिए भी जो इसी तरह से जीना पसंद करते हैं। इस तरह के विचार से हिम्मत और शक्ति पैदा होती है। जैसा की मेरी मित्र, जिन का ज़िक्र मैंने ऊपर किया है, ने हमें दिल्ली की मेट्रो में एक सुरक्षाकर्मी द्वारा पुरुषों की लाइन में लगने के लिए कहने पर कहा – हम जैसे बहुत मिलने वाले हैं, सीख लो।  


यह लेख इससे पहले तारशी में प्रकाशित किया जा चुका है, जिसे स्मिता वन्नियर ने लिखा है और हिंदी अनुवाद सोमेन्द्र कुमार ने किया है।

तस्वीर साभार : hrw

This post was originally published in In Plainspeak, TARSHI's online magazine on sexuality in the Global South. TARSHI supports and enables people's control and agency over their sexual and reproductive health and well-being through information dissemination, knowledge and perspective building within a human rights framework.

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