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दुनिया की कुल आबादी का 17.5 फ़ीसद हिस्सा भारत में बसता है और इसमें से आधी संख्या महिलाओं की है। नहीं, एक छोटा संशोधन, लिंग अनुपात में असमानता के चलते महिलाओं की संख्या आधे से कम ही है। दुनिया में, लोगों को एक दूसरे से जोड़ने के अनेकों कारक हैं,  लेकिन शर्म की बात यह है कि भारत में अनेक दुसरे कारकों की बजाय दोहरे मानदंड और व्यापक स्त्री-द्वेष ही लोगों को एक दूसरे से जोड़ता  है अर्थात पूरे भारत में यह कुरीतियाँ समान रूप से पायी जाती हैं। पहली नज़र में देखने पर लगता है कि ये एक वर्गीकृत दावा है और शायद बढ़ा चढ़ाकर भी कहा जा रहा है, लेकिन नहीं, इस बात को सिद्ध करने के लिए अचूक आंकड़े मौजूद हैं। हालांकि, यहाँ मेरा इरादा भारत में महिलाओं की सामान्यत: खराब स्थिति पर चर्चा करना नहीं है। यहाँ चर्चा का केंद्र महिलाओं का ही एक बहुत छोटा समूह है – यह समूह भारत में, ख़ास तौर पर शहरी इलाकों में रहने वाली अविवाहित युवा महिलाओं का समूह है।

हो सकता है ऐसा लगे कि मैं अपने ही देश को लेकर कुछ ज़्यादा ही आलोचनात्मक हो रही हूँ, लेकिन मेरे ख्याल से इस तरह की आलोचना भी बहुत ज़रूरी है। कभी कभी हम खुद अपनी नज़रों में और दूसरों की नज़रों में सही दिखने को इतना अधिक महत्व देने लगते हैं कि हम उन बातों की ओर ध्यान खींचना ही भूल जाते हैं जो विचित्र हो सकती हैं और शायद निंदनीय भी।

शहरों में महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाओं की संख्या के बारे में बहस भले ही हो सकती है लेकिन यह तो निश्चित है कि इस सूची में ये शहर भी शामिल हो गए हैं। यहाँ बार-बार महिलाओं के उत्पीड़न या रेप की खबरें सुनने को मिलती हैं और इसका कारण यही दिखाया जाता है कि वे या तो वे ‘देर रात’ तक घर से बाहर होती हैं या फिर शहर के किसी ख़ास इलाके में चले जाने की गलती कर लेती हैं। तो यह कहा जा सकता है कि तेज़ी से आर्थिक तरक्की करने के बावजूद देश तरक्की नहीं कर रहा है। जिस दोहरे मानदंड की मैंने बात कही है, वे यहाँ अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है और यह इस देश में सहज और अनकही स्त्री-द्वेष की भावना पर पलने बढ़ने वाले परजीवी की तरह बन गया है। किसी पीड़ित व्यक्ति को ही उसकी तकलीफों के लिए दोषी मानना इस एक अच्छा उदाहरण है।

हमारे रोज़मर्रा के जीवन में भी आडम्बर और दोहरे मापदंड आसानी से दिखाई पड़ते हैं। आज की युवा और अविवाहित महिला के पास शिक्षा पाने के अधिक साधन हैं और साथ ही अक्सर उनके पास खर्च करने लायक पर्याप्त धन भी होता है। अब उन्हें ज़रुरत नहीं है कि वह शादी करने में जल्दबाज़ी करें और किसी पुरुष पर आश्रित बन जाएँ। लेकिन आज भी उन्हें अपनी यौन इच्छाओं को दबाकर ही रखना होगा। अगर आप 20 से 30 साल की उम्र के किसी युवक से पूछे कि क्या उन्होंने कभी सेक्स किया है तो निश्चय ही (हो सकता है इसमें हमेशा गर्व ना भी हो) इसका उत्तर हाँ में ही होगा। लेकिन यही सवाल अगर आप किसी महिला से पूछें तो इसका जवाब अक्सर ‘न’ ही होता है। तो अगर देखा जाए तो हमारे यहाँ के युवक सेक्स करते किसके साथ हैं?

भारत के किसी भी शहर में किसी युवा और अविवाहित महिला के लिए सेक्स कर पाना बिलकुल किसी चीज़ की स्मगलिंग करने जैसा ही होता है।

लड़कियों के इस संभावित ना के पीछे कई कारण होते हैं। सबसे पहला कारण तो सेक्स के साथ जुड़ा कलंक और शर्म है। शादी के लिए सबसे अच्छी और आदर्श महिला बेबीडॉल गाने पर थिरकने वाली सनी लियॉन न होकर कॉकटेल फिल्म की डायना पेंटी जैसी होनी चाहिए। कुछ भारतीय पुरुषों से बातचीत के दौरान एक विडियो बनाया गया था जिसमें उनसे पुछा गया कि क्या वे सनी लियॉन से शादी करना चाहेंगे। उन पुरुषों के उत्तर उन्हीं बातों को साबित करते हैं जो मैंने ऊपर लिखी है। इन पुरुषों ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि उन्हें सनी के साथ सेक्स करने में कोई परहेज़ नहीं होगा लेकिन जहाँ तक शादी करने का सवाल है, तो वे इसके लिए एक अधिक ‘घरेलू’ महिला पसंद करेंगे। उनके इस उत्तर का किसी महिला की व्यक्तित्व से कोई सम्बन्ध नहीं था बल्कि उनके इन जवाबों से समाज में व्याप्त धारणाओं का पता चलता है।

तो इसका अर्थ तो यह निकलता है कि जो महिला सेक्स करने की बात स्वीकार करती है, वह शायद चरित्रहीन हैं और आप ऐसी किसी चरित्रहीन महिला से तो शादी नहीं कर सकते। यहाँ मैं यह भी कहना चाहती हूँ कि यहाँ इस सन्दर्भ में चरित्रहीन या  ‘स्लट’ का अर्थ पश्चिमी सभ्यता में इस शब्द के अर्थ से बहुत अलग है। यहाँ भारत में तो शादी से पहले किसी एक के साथ सेक्स करने की बात स्वीकार करने पर महिला को ‘स्लट’ की उपाधि मिल जाती है। इसके लिए उनके एक से अधिक प्रेमी होना बिलकुल ज़रूरी नहीं होता।

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अब मुझे लगता कि मुझे ‘सभी आदमी ऐसे नहीं होते’ वाले वक्तव्य को भी स्पष्ट कर देना चाहिए। हाँ, निश्चय ही, यह कहना कि ‘सभी भारतीय पुरुष ऐसे ही होते हैं’ शायद सही नहीं होगा। कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं जो इस तरह से नहीं सोचते और इतनी हिम्मत रखते हैं कि वे उन्हें चुने जिनको वे सही समझते हों भले ही उनका अतीत कैसा भी रहा हो।

ज़्यादातर पुरुष बाहर से तो उदारवादी लगते हैं जो दुनिया के हर विषय पर चर्चा करते हैं लेकिन पास से देखने पर पता चलता हैं कि उनके विचार, उनकी ‘मान्यताएँ’ भी रुढ़िवादी लोगों के तरह ही होती हैं। हाँ ये सही है कि मेरे अधिकाँश दोस्त एक ऐसी महिला को चाहेंगे जिन्हें पहले से थोड़ा-बहुत अनुभव हो लेकिन वर्षों तक उनके साथ समय बिताने के बाद जब बात विवाह करने की बात आएगी तो शायद ही कोई इक्का-दुक्का इस रिश्ते के लिए तैयार हों।

जो महिला सेक्स करने की बात स्वीकार करती है, वह शायद चरित्रहीन हैं और आप ऐसी किसी चरित्रहीन महिला से तो शादी नहीं कर सकते।

शादी के समय उनमें से ज़्यादातर पुरुष घरवालों की पसंद की महिला से शादी करना चाहेंगे क्योंकि ऐसा करने से कुंवारी महिला मिलना सुनिश्चित हो पाता है या फिर ऐसी महिला से शादी होती है जो घर वालों की पसंद है। कोई महिला कितनी काबिल हैं या उन्होंने जीवन में कितना कुछ हासिल किया है, उन पर 25 वर्ष की उम्र आते-आते विवाह कर लेने का दबाव बढ़ने ही लगता है। परिवार के पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी उन्हें यह समझाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं कि घर बसाना और एक परिवार का होना, किसी अच्छी नौकरी पाने से भी बढ़कर ज़रूरी होता है। और अक्सर ऐसा होता है कि अच्छी नौकरी या शादी कर घर बसाना, इनमें से एक ही काम संभव हो पाता है।

बहुत सी महिलाओं को, जो परिवार की इच्छा के खिलाफ़ जाकर अपने मन से कुछ करना चाहती हैं, परिवार की इज्ज़त के नाम पर जान से मार दिया जाता है। शादी से पहले सेक्स करना या किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम करना, जिसे परिवार के लोग पसंद न करते हों, कई लड़कियों के जान से हाथ धो बैठने का कारण बन जाता है। अनेक लड़कियों और महिलाओं की हत्या कर, उनकी मौत को झूठमूठ दुर्घटना’ या ‘आत्म-हत्या’ करार दिया जाता है। इसलिए कई बार सेक्स करने या प्रेम करने के बारे में पता लग जाना लड़कियों के लिए जान जोखिम में डालने वाला डर बन जाता है। ऐसा समझा जाता है कि शहरों में इस तरह की वारदातें या घटनाएं नहीं होतीं लेकिन ऐसा नहीं है। शहरों में इस तरह की घटनाएं होती तो हैं लेकिन उनका पता नहीं चलता। कभी-कभी महिला को जान से तो नहीं मारते पर परिवार के अपने ही लोग महिला पर हमला कर उनको शारीरिक चोट पहुंचाते हैं। और इतना सब कुछ उस बात के लिए जिसे किसी भी सभ्य और उदार समाज में साधारण या आम घटना समझा जायेगा।

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अधिकतर भारतीय लोगों के सोचने के तरीके को निर्धारित करने में आज भी बॉलीवुड की बहुत बड़ी भूमिका है। 90 के दशक में ऐसी अनेक फिल्में बनी जिनमें पारिवारिक मूल्यों और प्रथाओं के महत्व पर ज़ोर दिया गया था। नयी शताब्दी के बाद से फिल्मों में बड़ा बदलाव आया और लिव-इन सम्बन्ध जैसे विषय दिखाए जाने लगे। लेकिन 90 के दशक की यह धारणाएँ, टेलीविज़न धारावाहिक और विज्ञापन के ज़रिए अभी भी लोगों के मन में घर किए हुए हैं। एक फिल्म, जिसने शायद सभी पीढ़ियों पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था, वह थी दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे या डी.डी.एल.जे। इस फिल्म में शाहरुख़ खान ने उस नौजवान की भूमिका अदा की थी जो लगातार काजोल से फ़्लर्ट करते हैं और उन्हें रिझाने की कोशिश करते हैं, कभी-कभी तो काजोल की इच्छा के विपरीत भी।

आज के दिन इस व्यवहार को हम शोषण या उत्पीड़न कहते हैं। बॉलीवुड के हिसाब से यह एक क्लासिक रोमांस फिल्म थी। लेकिन इस फिल्म के परिणाम क्या हुआ? पीढ़ी दर पीढ़ी युवा लड़कों के मन में यह बात घर करती गयी कि उत्पीड़न एक सही व्यवहार है। ऑस्ट्रेलिया में एक वकील ने अपने भारतीय मुवक्किल के लिए केस लड़ा जिसमें उनके मुवक्किल पर एक महिला का पीछा करने का आरोप था। वकील ने अपनी दलील में बॉलीवुड की अनेक फिल्मों का हवाला देते हुए कहा था कि उनके मुवक्किल को लगता था कि महिला का पीछा करना कोई गलत बात नहीं होती!

भारत के किसी भी शहर में किसी युवा और अविवाहित महिला के लिए सेक्स कर पाना बिलकुल किसी चीज़ की स्मगलिंग करने जैसा ही होता है। यहाँ लड़कियों के लिए सेक्स करना सामजिक रूप से बहिष्कृत हो जाने जैसा अनैतिक काम है या कहिये कि यह गैर-कानूनी ही है, हालांकि कानूनन इसे गैर-कानूनी घोषित नहीं किया गया है। आप भले ही इसका मज़ा लें, लेकिन आप कभी भी यह स्वीकार न करें कि आपने सेक्स किया है। और अगर आप ऐसा करने की गलती कर देती हैं तो लोग आपके और आपके प्रियजनों के नाम पर कीचड उछालना शुरू कर देंगे क्योंकि आप समाज की नैतिकता से विपरीत दिशा में जाने का काम कर रही समझी जायेंगी।

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यह लेख अमुक लेखिका ने लिखा है, जिसे सोमेंद्र में अनुवादित किया है और इस लेख को इससे पहले तारशी में प्रकाशित किया जा चुका है।

तस्वीर साभार : flickr

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