Tuesday, December 10, 2019

यौनिकता के पहलुओं को उजागर करती इस्मत की ‘लिहाफ़’

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जिस समय यह कहानी ‘लिहाफ़’ लिखी गयी थी, उस समय एक ही जेंडर के दो लोगों के बीच के सम्बन्धों या समलैंगिकता पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती थी।
पुरुषत्व के सामाजिक दायरों की परतें खोलती किताब 'मोहनस्वामी'

पुरुषत्व के सामाजिक दायरों की परतें खोलती किताब ‘मोहनस्वामी’

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यह किताब अँग्रेजी और कन्नड साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अनूठी है क्योंकि इसमें कस्बों और गावों में यौनिक अल्पसंख्यकों की आवाज़ को उठाया गया है।
छात्र कार्यकर्ता और युवा लेखिका गुरमेहर कौर की ये किताब ज़रूर पढ़ें

छात्र कार्यकर्ता और युवा लेखिका गुरमेहर कौर की ये किताब ज़रूर पढ़ें

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गुरमेहर कौर की नई किताब में कौर ने उन युवा लीडर की ज़िन्दगी और उनके राजनैतिक सफर को गहराई से जाना है, जो अपनी आवाज़ उठाने की क्षमता से काफी विवादों में घिरे रहते हैं।
नो नेशन फॉर वुमन

नो नेशन फॉर वुमन : बलात्कार के नासूरों को खोलती एक ‘ज़रूरी किताब’

प्रियंका दुबे की किताब नो नेशन फॉर वुमन के हर चैप्टर में अलग-अलग बलात्कार, ट्रैफिकिंग और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की रिपोर्ट दर्ज है।
भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ

भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ : किस्सा वही, कहानी नई

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इस साल की शुरुआत में लेखिका अनु सिंह चौधरी की तीसरी किताब और पहला उपन्यास 'भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ' पाठकों के सामने आया।
हम सभी को नारीवादी क्यों होना चाहिए? - जानने के लिए पढ़िए ये किताब

हम सभी को नारीवादी क्यों होना चाहिए? – जानने के लिए पढ़िए ये किताब

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'व्ही शुड ऑल बी फेमिनिस्ट्स' में अदीची के जीवन से जुड़े कुछ ऐसे किस्से हैं, जिन्हें उन्होंने नाइजीरिया में अनुभव किया है।
9 नारीवादी लेखिकाओं के लेखन से समझें नारीवाद

9 नारीवादी लेखिकाओं के लेखन से समझें नारीवाद

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इन नारीवादी लेखिकाओं ने अपने लेखन के माध्यम से अपने-अपने देशकाल को ध्यान में रखकर नारीवाद की एक वृहत परिभाषा को गढ़ा, जो हमें नारीवाद को समझने में बेहद मददगार साबित होती है|
पितृसत्ता को चुनौती देतीं 5 समकालीन हिंदी लेखिकाएं

पितृसत्ता को चुनौती देतीं 5 समकालीन हिंदी लेखिकाएं

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हिंदी की इन पांच समकालीन लेखिकाओं ने लेखन की अलग - अलग विधाओं ( यात्रा वृतांत, नोट्स, कहानी, कविता, व्यंग्य, लघुकथा, आदि ) के ज़रिए पितृसत्ता के ढांचे को लगातार चोट पहुंचाई है|
उपन्यास 'ब्लासफेमी' - दर्द का असली चिट्ठा

उपन्यास ‘ब्लासफेमी’ – दर्द का असली चिट्ठा

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'ब्लासफेमी' पाकिस्तान की स्त्रीवादी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता तहमीना दुर्रानी ने इस उपन्यास को लिखा है। उनकी माने तो यह उपन्यास सच्ची घटना से प्रेरित है।
गुनहगार इशरत आफरीं की नारीवादी चेतना

गुनहगार इशरत आफरीं की नारीवादी चेतना

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इशरत आफ़रीं साहिबा की कलम पूरे उपमहाद्वीप की औरतों के लिए मशाल से कम नहीं है| उनकी शायरी का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से नारीवादी है|

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ट्रेंडिंग

मैं एक महिला हूं और मुझे एनकाउंटर न्याय नहीं लगता

मैं एक महिला हूं और मुझे एनकाउंटर न्याय नहीं लगता

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महिलाओं के लिए यह विशेष तौर पर सचेत होने का वक्त है। सरकारें अपनी ओर से फास्ट ट्रैक कोर्ट, पुलिस रिफोर्म, प्रशासनिक कार्रवाई आदि पर जोर नहीं दे रही।
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

भारत में स्त्री विमर्श और स्त्री संघर्ष: इतिहास के झरोखे से

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भारत में स्त्री संघर्ष और स्त्री अधिकार के आन्दोलन को इसी रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है|
उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।