इतिहास राष्ट्रवाद और मानवाधिकार के संघर्ष में धुंधला पड़ा थांगजम मनोरमा का इंसाफ

राष्ट्रवाद और मानवाधिकार के संघर्ष में धुंधला पड़ा थांगजम मनोरमा का इंसाफ

राष्ट्रीय सुरक्षा अगर किसी के जीवन और आत्मसम्मान के अधिकार पर खतरा हो तो यहाँ मानवाधिकार सर्वोपरि है और सुरक्षा का क़ानून विचारणीय।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के बावजूद राष्ट्रवाद और मानवाधिकार के बीच जंग में हर वक़्त राष्ट्रवाद को ही तरजीह देता रहा है, यही कारण है कि AFSPA और UAPA जैसे कानून हमेशा ही मानवाधिकार पर हावी रहे है और इसी बोझ के कारण मानवाधिकार समूह हर समय किसी न किसी विवाद से घिरे ही रहते हैं। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण साल 2004 की उस घटना को लिया जा सकता है जिसकी गंभीरता का स्तर इतना ऊपर उठ चुका था कि समाज की सुशील, संस्कारी महिलाओं को नग्न अवस्था में आकर बलात्कार और निर्मम हत्या के मामले में इंसाफ की गुहार लगानी पड़ी। हर सिक्के के दो पहलू होते है इसी तरह इस घटना के बाद भी दो कहानियां सामने अाई, पहली राष्ट्रवाद से प्रेरित कहानी और दूसरी मानवाधिकार से जुड़ी कहानी। 

थांगजम मनोरमा केस से जुड़ी दो कहानियां

मानवाधिकार दृष्टिकोण के हिसाब से यह बलात्कार और निर्मम हत्या का मामला है, महिला से शोषण का मामला है, आत्मसम्मान- प्रतिष्ठा पर प्रहार का मामला है क्योंकि असम राइफल्स के जवानों ने अफस्पा कानून की असीमित शक्तियों को नज़र में रखते हुए ही इस कुकर्म को अंजाम दिया। 

10 जुलाई 2004 की वो काली रात जिसकी थांगजम मनोरमा ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी, उस समय उत्तर पूर्व के मणिपुर राज्य में अशांति का माहौल देखते हुए अफस्पा लागू था। मणिपुर के बैमन कैंपू मयई क्षेत्र में असम राइफल्स के जवान घेराबंदी में जुटे थे। पूरे इलाके में अगर किसी की मौजूदगी थी तो केवल जवानों की, बाकी सब अपने घरों में डर से बंद थे। बैमन कैंपू मयई क्षेत्र में चेकपोस्ट बनाया गया और यह जानकारी पक्की की गई कि थांगजम मनोरमा अपने घर पर हैं या नहीं। इसके बाद असम राइफल्स के कुछ जवान सिविल ड्रेस में मनोरमा के घर में दाखिल हुए और जोर जबरदस्ती से उसे धकेलते हुए घर से बाहर ले गए.. शक के आधार पर बार बार मनोरमा से केवल यही सवाल पूछा जा रहा था कि ‘ हथियार कहां है?’ मनोरमा के परिवार वालों को बस इस बात की जानकारी दी गई कि उसे आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण हिरासत में ले लिया गया है साथ ही घरवालों से एक कागज़ पर हस्ताक्षर कराते हुए घर से सोने के ज़ेवर भी ले गए। वह कागज़ जवानों के लिए इस बात का सबूत था कि मनोरमा के घरवालों के साथ किसी तरह की कोई बदसलूकी नहीं की गई है। इस पूरी घटना के बाद मनोरमा तो कभी नहीं लौटी, लौटी तो जननांगों पर ज़ख्मों से भरी हुई एक लाश जो सिर्फ इंसाफ की गुहार लगा रही थी। उसके जननांगों और पैरों के पास 16 गोलियां दागी गई जो बर्बरता का पुख्ता सबूत था। 

राष्ट्रीय सुरक्षा अगर किसी के जीवन और आत्मसम्मान के अधिकार पर खतरा हो तो यहाँ मानवाधिकार सर्वोपरि है और सुरक्षा का क़ानून विचारणीय।

राष्ट्रवाद से प्रेरित कहानी से जुड़े पहलुओं पर गौर करें तो जवानों के मुताबिक मनोरमा साल 1995 से पीपल लिबरेशन आर्मी जैसे आतंकी संगठन से संपर्क में थी और उसे कई IED जैसे विस्फोटक बमों की जानकारी थी जिसके कारण असम राइफल्स द्वारा 10 जुलाई 2004 की रात चेकपोस्ट बनाकर उसे पकड़ने के लिए एक ऑपरेशन को चालू किया गया और उसे हिरासत में लिया गया जिसमें दो घंटे की पूछताछ के बाद जब उसे नज़दीक के थाने ले जाया जा रहा था उस वक़्त मनोरमा ने भागने की कोशिश की और इसी बीच उसके न रुकने पर मजबूरन पैरों को निशाना बनाकर गोलियां दागनी पड़ी। 

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थांगजम मनोरमा जैसी कितनी ही महिलाएं इस तरह के शोषण की हर रोज़ शिकार हो रही है, इतिहास गवाह है जब भी राष्ट्र पर कोई बड़ा संकट आया है महिलाएं दोहरे शोषण की शिकार हुई फिर चाहे उन उदाहरणों में विभाजन के समय की दर्दनाक स्मृतियां शामिल की जाएं या फिर युद्ध के समय की…. वो महिलाएं ही है जो हर वक़्त हाशिए पर धकेल दी जाती है। 

अफस्पा कानून और उत्तर पूर्व क्षेत्र

सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून यानी (AFSPA)  को भारतीय संसद द्वारा 11 सितंबर 1958 को पारित किया गया, इस कानून के पारित करने का महत्वपूर्ण उद्देश्य पूर्वोत्तर राज्य में फ़ैल रही उन हिंसक आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाना था जिसके कारण वहां अशांति का माहौल पैदा हो रहा था जब 1989 के वर्षों में जम्मू – कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने लगा तो 1990 में वहां भी इसे लागू कर दिया गया। 

इसी कानून की छत्रछाया में शांति बहाल करने के प्रयास किए जाते रहे हैं पर अफस्पा जैसे कानून असीमित शक्तियों और मनमानी के चलते विवादों में घिरे रहे। स्थानीय लोगों द्वारा सेना की मनमर्जी की कई शिकायते सामने आती रहीं लेकिन राष्ट्रवादी भावना की प्रबलता से प्रेरित लोग मानवाधिकार को झुठलाते है जिसे परिणामस्वरूप वहां के लोग हिंसा का पथ मजबूरन चुनने को राज़ी हो जाते है। 

हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है लेकिन इसके लिए स्थानीय लोगों के सहयोग की आवश्यकता है क्योंकि ये वही लोग है जो सुरक्षा के लिए अपने अधिकारों का बलिदान देंगे पर यह राष्ट्रीय सुरक्षा अगर किसी के जीवन और आत्मसम्मान के अधिकार पर खतरा हो तो यहां मानवाधिकार सर्वोपरि है। इसलिए जरूरी है अफस्पा जैसे कानूनों पर केंद्र का थोड़ा शिकंजा हो जिससे सेना में भी अधिकारों के हनन के मामले में खौफ रहे। 

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तस्वीर साभार : oddnaari

About the author(s)

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

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