भारत का श्रम इतिहास केवल आर्थिक गतिविधियों का इतिहास नहीं है, बल्कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के प्रति असमानता, शोषण, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और संघर्ष की कहानी भी है। औपनिवेशिक दौर में भारतीय मजदूरों की स्थिति बहुत दयनीय थी, उनके काम के घंटे बहुत ज़्यादा थे ।लेकिन इसके बावजूद उन्हें कम वेतन दिया जाता था। कार्यस्थलों में किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी। मजदूरों को इंसान नहीं केवल उत्पादन का साधन समझा जाता था। ऐसे में डॉ. भीमराव अंबेडकर का योगदान बहुत महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी सिद्ध होता है। उन्होंने श्रम को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का आधार माना। उनका मानना था कि असल में प्रगति तभी संभव है, जब असमानता के आर्थिक और सामाजिक दोनों आयामों को एक साथ देखा जाए।
उन्होंने श्रम कल्याण में मौजूद गंभीर खामियों को दूर करने के लिए कई महत्वपूर्ण कानून लागू किए। हालांकि कानूनों तक सीमित न रहते हुए, उन्होंने ऐसे स्थायी ढांचे भी स्थापित किए, जैसे एम्प्लॉइज़ स्टेट इंश्योरेंस (ईएसआई) और एम्प्लॉइज़ प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ), जो आज भी लाखों कामगारों को चिकित्सा बीमा और सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान करते हैं।उनका श्रम कल्याण के प्रति दृष्टिकोण व्यापक और समावेशी था। यह केवल काम की परिस्थितियों को बेहतर बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य समाज में मौजूद संरचनात्मक असमानताओं को चुनौती देना भी था।उन्होंने एक सांस्कृतिक क्रांति की जरूरत पर भी जोर दिया, जो जाति-आधारित भेदभाव को खत्म कर सके। हालांकि यह स्थिति पहले से बेहतर हुई है, लेकिन आज के दौर में बहुत सी जगह पर मजदूरों के साथ शोषण होता है।
उन्होंने श्रम कल्याण में मौजूद गंभीर खामियों को दूर करने के लिए कई महत्वपूर्ण कानून लागू किए। हालांकि कानूनों तक सीमित न रहते हुए, उन्होंने ऐसे स्थायी ढांचे भी स्थापित किए, जैसे एम्प्लॉइज़ स्टेट इंश्योरेंस (ईएसआई) और एम्प्लॉइज़ प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ), जो आज भी लाखों कामगारों को चिकित्सा बीमा और सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान करते हैं।
श्रमिक राजनीति में अंबेडकर का हस्तक्षेप
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में छपे एक लेख के मुताबिक, डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारत के संविधान निर्माण और दलित समुदाय के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि, भारत के श्रमिकों के लिए उनके योगदान को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। साल 1923 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और साल 1927 में कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद, जब अंबेडकर भारत लौटकर बॉम्बे के सरकारी विधि महाविद्यालय में शिक्षक और बाद में प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत हुए, तो उन्हें संघर्ष करना पड़ा। महार जाति से होने के कारण, उन्हें रहने के लिए घर नहीं दिया गया। इसलिए उन्हें परेल में बॉम्बे विकास विभाग के एक किराए के घर में रहना पड़ा।यह घर श्रमिक वर्ग के सबसे कम आय वाले लोगों का निवास स्थान था, जो मुख्य रूप से कपड़ा उद्योग में काम करते थे। यहां के लोगों के साथ उनके मेलजोल और अनुभवों ने शायद उनके श्रमिक अधिकारों के संघर्ष की चिंगारी को जन्म दिया।
उन्होंने अपने प्रसिद्ध लेख भारत में जातियां: उनकी कार्यप्रणाली, उत्पत्ति और विकास में उन्होंने स्पष्ट किया कि जाति व्यवस्था केवल काम का विभाजन नहीं है, बल्कि यह श्रमिकों का विभाजन है। उन्होंने श्रमिकों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, यह समझा कि उनके साथ होने वाला शोषण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि जाति व्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए उन्होंने जाति के माध्यम से होने वाले भेदभाव और अत्याचारों के खिलाफ विरोध किया। जब उन्होंने 15 अगस्त 1936 को स्वतंत्र श्रमिक दल (आईएलपी) का गठन किया ,तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) नाराज हो गई क्योंकि पार्टी को लगा कि अब श्रमिकों के वोट बंट जाएंगे। इस पर अंबेडकर ने जवाब देते हुए कहा कि कम्युनिस्ट श्रमिकों के लिए काम कर रहे हैं, दलित श्रमिकों के लिए नहीं। वे भूमिहीन, गरीब किरायेदारों, किसानों और श्रमिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करके और उनके लिए पुरजोर संघर्ष करके इस खाई को भरना चाहते थे, ताकि भारत में जातिगत और पूंजीवादी ढांचों को खत्म किया जा सके।
महार जाति से होने के कारण, उन्हें रहने के लिए घर नहीं दिया गया। इसलिए उन्हें परेल में बॉम्बे विकास विभाग के एक किराए के घर में रहना पड़ा।यह घर श्रमिक वर्ग के सबसे कम आय वाले लोगों का निवास स्थान था, जो मुख्य रूप से कपड़ा उद्योग में काम करते थे।
खोटी प्रथा से श्रम कानून तक अंबेडकर की भूमिका
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में छपे लेख के मुताबिक, साल 1938 में पार्टी ने सीपीआई के साथ मिलकर बंबई के कपड़ा मिलों के मजदूरों को एकजुट किया। ये मजदूर उस कानून के खिलाफ थे, जिसमें हड़ताल पर रोक लगाई जा रही थी। आईएलपी ने इस कानून का विरोध बॉम्बे विधानसभा में भी किया। उसी साल, आईएलपी ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के साथ मिलकर कोंकण से बॉम्बे तक लगभग 20,000 किरायेदारों का मार्च निकाला, ताकि खोटी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई जा सके। खोटी प्रथा कोंकण क्षेत्र में चलने वाली एक व्यवस्था थी, जिसमें जमीदार लोग किसानों से लगान वसूलते थे। यह प्रणाली शोषणकारी थी। इसके खिलाफ हुआ यह आंदोलन आज़ादी से पहले का सबसे बड़ा किसान आंदोलन माना जाता है।
मजदूरों के लिए लगातार काम करने के अलावा, अंबेडकर को 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। सितंबर 1945 में उन्होंने एक ‘श्रम चार्टर’ पेश किया, जो आगे चलकर भारत में श्रमिकों के कल्याण की नीतियों का आधार बना।सितंबर 1943 में एक त्रिपक्षीय भारतीय श्रम सम्मेलन हुआ। इसमें अडारकर समिति की रिपोर्ट का अध्ययन किया गया और यह सुझाव दिया गया, कि मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा देने के तरीके खोजने के लिए एक अलग सामाजिक कल्याण समिति बनाई जाए। समिति ने अपने प्राथमिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए वेतन, आवास, रोजगार आदि का अध्ययन किया। अपनी 35 रिपोर्टों में इसने कपास, कोयला आदि के अलावा कई अन्य उद्योगों को भी शामिल किया, जिन पर पहले ध्यान नहीं दिया गया था।
उनके नेतृत्व में मातृत्व लाभ अधिनियम में दो बार महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। पहला बड़ा संशोधन 23 जुलाई 1943 को किया गया, जिसमें अधिनियम की धारा 5 से जुड़ी अस्पष्टताओं को दूर किया गया, ताकि महिला श्रमिकों को मिलने वाले लाभ स्पष्ट हो सकें। दूसरा संशोधन 4 अप्रैल 1945 को किया गया, जिसमें खासतौर पर खानों में काम करने वाली महिलाओं के लिए मिलने वाले लाभ और छुट्टियों की अवधि को बढ़ाया गया।
महिला श्रमिकों के अधिकारों के लिए अंबेडकर का संघर्ष
डॉ. बी. आर. अंबेडकर: आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन लेबर रिफॉर्म्स एंड पायनियर ऑफ वर्कर्स’ सोशल सिक्योरिटी नाम की एक रिसर्च के मुताबिक, साल 1929 का मातृत्व लाभ अधिनियम आजादी से पहले भारत का एक महत्वपूर्ण कानून था, जिसका उद्देश्य कार्यस्थल पर महिलाओं के मातृत्व से जुड़े अधिकारों की रक्षा करना था। इस कानून के बनने में डॉ.अंबेडकर, एन एम जोशी और एम के दीक्षित जैसे नेताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने इसे पारित कराने के लिए सक्रिय रूप से समर्थन किया।इस कानून की मांग मुख्य रूप से बॉम्बे की कपड़ा मिलों से उठी, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती थीं, लेकिन उनके मातृत्व और प्रजनन अधिकारों की अनदेखी की जाती थी। बाद में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के साल 1952 में लाए गए मातृत्व संरक्षण सम्मेलन ने आजाद भारत को महिलाओं के लिए अधिक मानवीय कार्य परिस्थितियां बनाने की दिशा में प्रेरित किया। इन्हीं प्रयासों के आधार पर साल 1961 का मातृत्व लाभ अधिनियम लागू किया गया, जिसका उद्देश्य सरकारी संस्थानों और कारखानों में काम करने वाली महिलाओं को मातृत्व सुरक्षा प्रदान करना था।
उनके नेतृत्व में मातृत्व लाभ अधिनियम में दो बार महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। यह कानून कुछ खास उद्योगों में काम करने वाली महिलाओं पर लागू होता था। पहला बड़ा संशोधन 23 जुलाई 1943 को किया गया, जिसमें अधिनियम की धारा 5 से जुड़ी अस्पष्टताओं को दूर किया गया, ताकि महिला श्रमिकों को मिलने वाले लाभ स्पष्ट हो सकें। दूसरा संशोधन 4 अप्रैल 1945 को किया गया, जिसमें खासतौर पर खानों (भूमिगत कार्य) में काम करने वाली महिलाओं के लिए मिलने वाले लाभ और छुट्टियों की अवधि को बढ़ाया गया।भूमिगत खानों में काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश को बढ़ाकर 16 हफ्ते का कर दिया गया,जिसमें 10 हफ्ते प्रसव से पहले और 6 हफ्ते प्रसव के बाद मिलते थे। इसके अलावा, कुल अधिकृत अवकाश को बढ़ाकर 26 हफ्तों का कर दिया गया।
इसमें यह भी व्यवस्था की गई कि अगर क्रेच की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो महिलाएं 10 हफ्तों तक आंशिक कामकर सकती हैं। हालांकि खानों में काम करने वाली महिलाओं के लिए और भी लचीली व्यवस्था रखी गई।इसके साथ ही साथ ही, मजदूरी में भी बढ़ोतरी की गई। जमीन के ऊपर काम करने वाली महिलाओं को 0.75 रुपये प्रतिदिन और भूमिगत काम करने वाली महिलाओं को 6 रुपये प्रति सप्ताह दिए जाने लगे।इन बदलावों से यह साफतौर पर देखा जा सकता है कि महिलाओं के काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत को समझा गया और उन्हें बेहतर समर्थन देने की दिशा में कदम उठाए गए। आज जब असंगठित क्षेत्र के मजदूर, महिला श्रमिक और हाशिए के समुदाय अभी भी कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, तब अंबेडकर के विचार और नीतियां हमें एक अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।

