संस्कृतिकिताबें आदिवासी अस्मिता और संघर्ष का दस्तावेज है रणेंद्र का ग्लोबल गाँव के देवता

आदिवासी अस्मिता और संघर्ष का दस्तावेज है रणेंद्र का ग्लोबल गाँव के देवता

रुमझुम और बालचन के बाद उनके भीतर लड़ने की ताकत कम होती दिखती है और आखिरकार वे मजबूरी में ‘ग्लोबल गाँव के देवताओं’ से समझौता कर लेते हैं। जब वे घर लौटते हैं, तो गाँव के लोग उनसे नाराज़ दिखते हैं।

‘ग्लोबल गाँव के देवता’ उपन्यास आदिवासी समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन और उनके संघर्षों पर आधारित है। इसके लेखक रणेंद्र ने अपनी रचनाओं के माध्यम से लगातार आदिवासी जीवन की सच्चाइयों और चुनौतियों को सामने लाने का काम किया है। वे झारखंड के आदिवासी समुदायों के काफी करीब रहे हैं, जिससे उन्हें उनके जीवन, परंपराओं और आपसी संबंधों को गहराई से समझने का अवसर मिला। इसी समझ के आधार पर उन्होंने साल 2009 में इस उपन्यास को साहित्य जगत में प्रस्तुत किया, जिसने आदिवासियों को लेकर फैली कई गलत धारणाओं को तोड़ने की कोशिश की। यह पुस्तक आदिवासी और वनवासी जीवन की पीड़ा, संघर्ष और वास्तविकताओं को सामने लाती है।

लेखक केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका के इंका, माया, एज्टैक और अन्य रेड इंडियन समुदायों के इतिहास और अनुभवों को भी जोड़ते हैं, जिससे यह कहानी और व्यापक हो जाती है। उपन्यास की मुख्य कथा एक शिक्षक (मास्टर जी) के माध्यम से सामने आती है, जो पीटीजी गर्ल्स रेजिडेंशियल स्कूल में नियुक्त होते हैं। शुरुआत में वे आदिवासी समुदाय को लेकर सुनी-सुनाई बातों से डरे हुए होते हैं और वहां रहना उन्हें कठिन लगता है। लेकिन, जब वे वहां जाकर लोगों के बीच रहते हैं, तो उनके सभी भ्रम टूट जाते हैं और वे आदिवासी जीवन की सच्चाई को करीब से समझने लगते हैं।

उपन्यास की मुख्य कथा एक शिक्षक (मास्टर जी) के माध्यम से सामने आती है, जो पीटीजी गर्ल्स रेजिडेंशियल स्कूल में नियुक्त होते हैं। शुरुआत में वे आदिवासी समुदाय को लेकर सुनी-सुनाई बातों से डरे हुए होते हैं और वहां रहना उन्हें कठिन लगता है।

अंधविश्वास, मान्यताएं और गाँव के लोग  

‘असुर’ शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के मन में एक डरावनी और नकारात्मक छवि बनती है। लेकिन मास्टर जी को अपने साथी रुमझुम से पता चलता है कि इसका अर्थ हमेशा ऐसा नहीं था। रुमझुम समझाता है कि प्राचीन असीरिया-बेबीलोन सभ्यता में ‘असुर’ का मतलब शक्तिशाली या बलवान व्यक्ति होता था। वहीं ऋग्वेद के शुरुआती श्लोकों में भी ‘असुर’ शब्द देवताओं के लिए इस्तेमाल हुआ है—मित्र, वरुण, अग्नि और रुद्र जैसे देवताओं को भी असुर कहा गया है। बाद के समय में इसका अर्थ बदल गया और इसे दानव या नकारात्मक रूप में देखने की परंपरा शुरू हो गई। इस तरह मास्टर जी के मन में असुरों को लेकर बनी कई गलत धारणाएं धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। हालांकि, इन धारणाओं के साथ-साथ कुछ ऐसी परंपराएं और मान्यताएं भी सामने आती हैं, जिन्हें समझना और स्वीकार करना आसान नहीं होता।

एक दिन मास्टर जी देखते हैं कि एक घायल व्यक्ति भागते हुए इतवारी के घर आता है। इतवारी उसे पहचानते हुए बताती है कि वह लालचन दादा हैं, जो उनके गांव के प्रधान हैं। बाद में पता चलता है कि उनकी चोट एक ऐसी मान्यता से जुड़ी है, जिसमें कुछ लोग यह विश्वास करते हैं कि बीज बोने से पहले उसमें खून मिलाने से फसल अच्छी होती है। इस घटना को देखकर मास्टर जी हैरान रह जाते हैं। यह उन्हें सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे कुछ परंपराएं और विश्वास, जो लंबे समय से चले आ रहे हैं, आज भी लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे प्रसंग हमें यह समझने का अवसर देते हैं कि किसी भी समुदाय को समझते समय उसके इतिहास, परिस्थितियों और मान्यताओं को संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ देखना कितना जरूरी है।

इतवारी उसे पहचानते हुए बताती है कि वह लालचन दादा हैं, जो उनके गांव के प्रधान हैं। बाद में पता चलता है कि उनकी चोट एक ऐसी मान्यता से जुड़ी है, जिसमें कुछ लोग यह विश्वास करते हैं कि बीज बोने से पहले उसमें खून मिलाने से फसल अच्छी होती है।

आदिवासी समाज और महिलाओं की स्थिति

आमतौर पर पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों को ही अधिक शक्तिशाली माना जाता है, लेकिन आदिवासी समाज इस धारणा को तोड़ता हुआ नजर आता है। यहां महिलाओं को ‘जनानी’ नहीं बल्कि ‘सियानी’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है समझदार और विवेकशील। यह संबोधन उनके प्रति सम्मान को दिखाता है। आदिवासी समाज में महिलाएं केवल घर तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियों में बराबर भागीदारी निभाती हैं। मास्टर जी रोज भौंरापाट से सखुआपाट जाकर बुधनी दी की चाय की दुकान पर बैठते थे, जहां उन्हें इलाके की खबरें मिलती थीं। यहीं उन्हें पता चलता है कि लालचन दा के चाचा की हत्या कर दी गई है और उनका शव अम्बाटोली देवी स्थान पर मिला। यह घटना जमीन विवाद से जुड़ी थी। इलाके में गोनू सिंह नाम का एक दबंग व्यक्ति लालचन दा की जमीन पर कब्जा करना चाहता था। सबको उस पर शक था, लेकिन डर और दबाव के कारण कोई खुलकर विरोध नहीं कर पाया, यहां तक कि पुलिस भी चुप रही।

कुछ समय बाद गोनू सिंह ने लालचन दा की जमीन पर जबरन खेती करने की कोशिश की। इसके विरोध में लालचन दा अपने साथियों के साथ वहां पहुंचे और दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़प हो गई। इस संघर्ष में कई लोग घायल हुए, जिनमें लालचन दा के छोटे भाई बालचन भी शामिल थे। आदिवासी समुदाय के लिए यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं था, बल्कि उनके अस्तित्व, सम्मान और पहचान की लड़ाई थी। इसी बीच एक और बड़ा खतरा सामने आता है, जब ‘वेदांग’ नाम की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी उस इलाके में अभयारण्य बनाने के नाम पर जमीन अधिग्रहण की कोशिश करती है। धीरे-धीरे लोगों को समझ आता है कि इसका असली उद्देश्य बॉक्साइट खनन है। इस स्थिति ने संघर्ष को और गहरा कर दिया। लालचन दा के नेतृत्व में ‘संघर्ष समिति’ बनती है, जिसमें रुमझुम, डॉक्टर बाबू, बुधनी दी, ललिता, एतवारी और अन्य ग्रामीण शामिल होते हैं। पूरा गांव एकजुट होकर अपने हक और जमीन की रक्षा के लिए खड़ा हो जाता है।

अगले दिन मास्टर जी जब अखबार में इस घटना की खबर ढूंढते हैं, तो वे हैरान रह जाते हैं। अखबार में रोज़ की तरह सामान्य खबरें और विज्ञापन तो होते हैं, लेकिन उस हिंसा और जान गंवाने वाले लोगों का कोई जिक्र नहीं होता। केवल एक छोटी-सी खबर में लिखा होता है कि पाथरपाट में पुलिस मुठभेड़ में छह नक्सली मारे गए।

अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई

धरना-प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी का महिलाओं के साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो जाती है। इसके बाद हालात बिगड़ते हैं और पुलिस की कार्रवाई में गोलीबारी होती है, जिसमें कई लोगों की जान चली जाती है। यह घटना समुदाय के संघर्ष और पीड़ा को और गहरा कर देती है, और यह दिखाती है कि उनके लिए यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों की है। अगले दिन मास्टर जी जब अखबार में इस घटना की खबर ढूंढते हैं, तो वे हैरान रह जाते हैं। अखबार में रोज़ की तरह सामान्य खबरें और विज्ञापन तो होते हैं, लेकिन उस हिंसा और जान गंवाने वाले लोगों का कोई जिक्र नहीं होता। केवल एक छोटी-सी खबर में लिखा होता है कि पाथरपाट में पुलिस मुठभेड़ में छह नक्सली मारे गए। यह देखकर मास्टर जी समझ जाते हैं कि सच किस तरह दबा दिया गया है और घटनाओं को किस तरह अलग रूप देकर पेश किया जाता है।

इन घटनाओं के बाद लालचन दा पूरी तरह टूट जाते हैं। रुमझुम और बालचन के बाद उनके भीतर लड़ने की ताकत कम होती दिखती है और आखिरकार वे मजबूरी में ‘ग्लोबल गाँव के देवताओं’ से समझौता कर लेते हैं। जब वे घर लौटते हैं, तो गाँव के लोग उनसे नाराज़ दिखते हैं। यहां तक कि उनका परिवार भी उनसे दूरी बना लेता है। माहौल ऐसा हो जाता है मानो यह समझौता सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की पीड़ा और बेबसी का प्रतीक हो। लेखक रणेंद्र इस संघर्ष को इतिहास से जोड़ते हुए दिखाते हैं कि यह लड़ाई नई नहीं है, बल्कि बहुत पुरानी है। वे लिखते हैं कि जिन संघर्षों को इतिहास में कई शक्तिशाली ताकतें खत्म नहीं कर सकीं, आज वही काम ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ कर रहे हैं। यह पंक्तियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि समय बदलने के साथ संघर्ष के रूप भले बदल जाएं, लेकिन मूल समस्या बनी रहती है।

फिर भी, इस कहानी में उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं होती। असुर समुदाय के बारे में कहा जाता है कि वे हार मानने वाले नहीं होते। इसी भावना के साथ सुनील, जो शहर के विश्वविद्यालय में पढ़ता है, अपने साथियों के साथ गांव लौटता है, ताकि इस संघर्ष को आगे बढ़ा सके। असुर समाज में महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यहां की परंपराओं में महिलाएं अपने फैसले खुद लेने की स्वतंत्रता रखती हैं, और रिश्तों को लेकर भी उनके अपने तरीके हैं। वे समझदार और सजग हैं, और कई बार अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती हुई भी दिखाई देती हैं। हालांकि, उन्हें भी कई तरह की चुनौतियों और शोषण का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे भीतर से मजबूत रहती हैं। ललिता और बुधनी दी जैसे पात्र इस बात का उदाहरण हैं कि इस संघर्ष में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं, बल्कि कई बार उनसे भी ज्यादा दृढ़ता के साथ।

About the author(s)

मेरा नाम खदीजा ताहेरा है। वर्तमान में एम. ए. (हिंदी) जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली से अपनी पढ़ाई कर रही हूं। मुझे ब्लॉग लिखने का बहुत शौक है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content