संस्कृतिकिताबें अमृता प्रीतम की प्रेम और विद्रोह का दस्तावेज़ है ‘रसीदी टिकट’

अमृता प्रीतम की प्रेम और विद्रोह का दस्तावेज़ है ‘रसीदी टिकट’

यह किताब साबित करती है कि उनकी ज़िंदगी बिल्कुल भी मामूली नहीं थी। इसमें प्रगतिशील लेखन की जद्दोजहद, विभाजन की त्रासदी और उस समय के एक असंभव-से प्रेम की कहानी दर्ज है।

साहित्य की दुनिया में कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जो केवल पन्नों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि सीधे दिल को छूती हैं। वे किसी पुरानी रसीद की तरह होती हैं, जो बरसों बाद हाथ लगे और पूरी ज़िंदगी का हिसाब खोल दे। ‘रसीदी टिकट’ अमृता प्रीतम की ऐसी ही किताब है। साल 1976 में पंजाबी भाषा में प्रकाशित यह आत्मकथा उनके जीवन के कई पहलुओं से परिचित कराती है। बाद में इसका अनुवाद अंग्रेज़ी समेत कई भाषाओं में भी हुआ। अमृता प्रीतम का नाम लेते ही पंजाबी साहित्य में एक बेचैनी और हलचल महसूस होती है, जो कभी थमती नहीं। साल 1919 में गुजरांवाला (जो अब पाकिस्तान में है) में जन्मी अमृता प्रीतम एक कवयित्री, उपन्यासकार और निबंधकार थीं। उन्होंने भारत-पाकिस्तान विभाजन की अमानवीय पीड़ा को सबसे पहले अपनी कविताओं में स्वर दिया।

उन्होंने अपने जीवन को एक अनोखी आत्मकथा के रूप में दर्ज किया, जिसका नाम रखा ‘रसीदी टिकट’। यह किताब आज भी महिलाओं की दबाई गई इच्छाओं, प्रेम की तड़प और साहित्यिक विद्रोह की प्रतीक मानी जाती है। यह केवल आत्मकथा नहीं है, बल्कि एक ऐसी लेखनी है, जो पितृसत्तात्मक समाज की नैतिक जंजीरों को तोड़ती है। ‘रसीदी टिकट’ अमृता की निजी संघर्ष की कहानी होने के साथ-साथ 20वीं सदी के उस दौर का आईना भी है, जिसमें एक पूरी पीढ़ी प्रेम, हार, बंटवारे और सृजन के बीच फंसी हुई थी। यह किताब साबित करती है कि उनकी ज़िंदगी बिल्कुल भी मामूली नहीं थी। इसमें प्रगतिशील लेखन की जद्दोजहद, विभाजन की त्रासदी और उस समय के एक असंभव-से प्रेम की कहानी दर्ज है।

उन्होंने अपने जीवन को एक अनोखी आत्मकथा के रूप में दर्ज किया, जिसका नाम रखा ‘रसीदी टिकट’। यह किताब आज भी महिलाओं की दबाई गई इच्छाओं, प्रेम की तड़प और साहित्यिक विद्रोह की प्रतीक मानी जाती है।

अमृता प्रीतम की रचनाएं भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में उतनी ही लोकप्रिय रहीं, जितना विभाजन ने इन दोनों देशों को अलग किया। ‘रसीदी टिकट’ उनकी दूसरी आत्मकथा है। उनकी पहली आत्मकथा का नाम ‘काला गुलाब’ था। यह किताब पारंपरिक, सीधी-सादी आत्मकथा नहीं है। इसमें यादें, सपने, डायरी के अंश, कविताएं और आध्यात्मिक चिंतन एक साथ आते हैं। अमृता अपनी कहानी माता-पिता की शादी से पहले की घटनाओं से शुरू करती हैं और दिल्ली में अपने जीवन के एक पड़ाव पर आकर समाप्त करती हैं।

मन का जद्दोजहद, विद्रोही स्वर और आत्मकथा

इस आत्मकथा में भाषा कवितामय है। एक स्त्री का जीवन सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल से टकराता हुआ दिखता है। किताब अमृता के विचारों की गहराई और सूक्ष्मता को सामने लाती है। उनके पिता कर्तार सिंह कभी साधु बनना चाहते थे, लेकिन राज बिबी की एक नज़र ने उनका जीवन बदल दिया। धन और वैराग्य, दोनों ही उनके लिए समान थे। अपनी माँ की मौत के बाद, मात्र दस वर्ष की उम्र में, अमृता को यह महसूस होने लगा कि पिता का वैराग्य उन्हें अस्वीकार कर रहा है। वे अक्सर रोती थीं, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आता था कि वे स्वीकार की जा रही हैं या ठुकराई जा रही हैं। यह असमंजस और पीड़ा उनके भीतर गहरे बैठ गई। इसी अस्वीकृति की भावना से बचने के लिए अमृता ने कविता लिखना शुरू किया। पिता ने उन्हें छंद और लय सिखाई, लेकिन अमृता की कविताएं विद्रोह से भरी थीं। यही विद्रोह आगे चलकर उन्हें साहित्य की सबसे सशक्त आवाज़ों में बदल देता है।

अमृता प्रीतम अपने लेखन में समय और स्मृतियों को फिर से जीवित कर देती हैं। वे अपनी ज़िंदगी के अनुभवों के ज़रिए समाज, धर्म और पितृसत्ता पर सवाल उठाती हैं। उनकी विद्रोही चेतना बचपन से ही दिखाई देने लगती है। वे लिखती हैं कि उनकी नानी घर में चार अलग गिलास रखती थीं। इन गिलासों का इस्तेमाल तब होता था, जब उनके पिता के मुस्लिम दोस्त घर आते थे और उन्हें चाय या लस्सी पिलानी होती थी। पिता को इस भेदभाव की जानकारी नहीं थी। जब अमृता को यह बात समझ में आई, तो उन्होंने नानी के इस व्यवहार का विरोध किया। इस विरोध का असर यह हुआ कि धीरे-धीरे उनके घर से यह भेदभाव खत्म हो गया। बचपन में माँ की मृत्यु ने अमृता के जीवन को गहराई से प्रभावित किया।

उनकी विद्रोही चेतना बचपन से ही दिखाई देने लगती है। वे लिखती हैं कि उनकी नानी घर में चार अलग गिलास रखती थीं। इन गिलासों का इस्तेमाल तब होता था, जब उनके पिता के मुस्लिम दोस्त घर आते थे और उन्हें चाय या लस्सी पिलानी होती थी। पिता को इस भेदभाव की जानकारी नहीं थी।

इस घटना के बाद उनका ईश्वर से विश्वास उठ गया। वे इसे ईश्वर के ख़िलाफ़ अपने पहले विद्रोह के रूप में देखती हैं। यह विद्रोह यहीं नहीं रुका। उनके जीवन में जब-जब उनके नारीत्व को चुनौती दी गई, तब-तब उनकी विरोधी प्रवृत्ति ने उन्हें सामना करने की ताक़त दी। एक विडंबना यह भी थी कि उन्हें कवि साहिर लुधियानवी से अमृता को प्रेम हो गया। न नानी यह जानती थीं और न खुद अमृता, कि जीवन उन्हें इस मोड़ पर ले आएगा। अमृता अपने सोलहवें साल को एक ‘चोर’ की तरह याद करती हैं, जिसने उनकी मासूमियत चुरा ली। यह वही समय था, जब उन्होंने स्कूल की पढ़ाई, धार्मिक पूर्वाग्रहों और पितृसत्तात्मक नियमों के ख़िलाफ़ बग़ावत की। उन्हें जो कुछ सिखाया गया था, वह उन्हें एक ऐसे बंधन जैसा लगा, जो शरीर और सोच के बढ़ने पर टूटने लगता है। वे जीवन को पूरी तरह जीना चाहती थीं। वे उन तारों से जुड़ना चाहती थीं, जिनकी पूजा दूर से करना उन्हें सिखाया गया था। यह आंतरिक विद्रोह उनके लिए साल 1947 के बंटवारे जैसा था, जब सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मूल्य टूटकर बिखर गए।

बंटवारे और निजी जीवन की त्रासदी बताती कहानी

बंटवारे की त्रासदी अमृता की चेतना में गहराई से समा गई। परिवारों का उजड़ना, दोस्तों का दुश्मन बन जाना, महिलाओं का अपहरण और बलात्कार, इन सबने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। वे लिखती हैं कि उन भयावह दिनों की आग आज भी उनके साथ है। वह आग उन्हें प्रियतम के चेहरे में, पड़ोसी देशों के हमलावरों में, वियतनाम की रातों में और चेकोस्लोवाकिया की बेबसी में दिखाई देती है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अज्ज आख़ां वारिस शाह नूं’ बंटवारे की पीड़ा की एक तेज़ चीख़ है, जिसने पाकिस्तानी कवियों को भी गहराई से छुआ। शादी अमृता के जीवन में एक और बंधन बनकर आई। तेरह साल की उम्र में उनका विवाह गुरबख्श सिंह से हुआ। इस विवाह से उनके दो बच्चे हुए—नवराज और कंदिया। लेकिन यह रिश्ता प्रेम से खाली था। अमृता के लिए एक महिला के रूप में पहचान माँ बनने तक सीमित कर दी गई थी।

मातृत्व की अपेक्षाओं ने उन्हें लगभग पच्चीस साल तक बांधे रखा। आखिरकार तलाक़ के बाद उन्होंने अपनी स्वतंत्रता को चुना। उनकी आत्मकथा में मातृत्व जैविक निर्भरता का प्रतीक बनकर उभरता है, जो पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं को जकड़े रखता है। तलाक़ के बाद साहित्य ही अमृता की असली पहचान बना। वे साफ़ कहती हैं कि उन्हें दूसरों की राय की परवाह नहीं है। उनकी एकमात्र इच्छा अपने भीतर शांति के साथ जीने की है। लेकिन साहित्य की दुनिया भी उनके लिए आसान नहीं थी। वह भी पुरुष-प्रधान थी। अमृता को कई बार संगठनों से बाहर किया गया और कविता के प्रतिनिधि मंडलों से दूर रखा गया। अपनी आत्मकथा के ‘द साइकिल ऑफ़ हेट्रेड’ अध्याय में वे लिखती हैं कि समाज महिलाओं को नक़ली सिक्कों की तरह तौलता है और उनकी इच्छाओं को दबाने के लिए अपमान और गंदगी का सहारा लेता है। अमृता की लेखनी उन दबी हुई भावनाओं और क्रोध को सामने लाती है, जो अक्सर माँ बनने और आज्ञाकारी होने की छवि के पीछे छिपा दी जाती हैं।

एक विडंबना यह भी थी कि उन्हें कवि साहिर लुधियानवी से अमृता को प्रेम हो गया। न नानी यह जानती थीं और न खुद अमृता, कि जीवन उन्हें इस मोड़ पर ले आएगा। अमृता अपने सोलहवें साल को एक ‘चोर’ की तरह याद करती हैं, जिसने उनकी मासूमियत चुरा ली।

प्रेम और अपनत्व का अनुभव

प्रेम अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ का केंद्र है। यह प्रेम केवल रोमांस नहीं, बल्कि इच्छा, स्वतंत्रता और मुक्ति का अनुभव है। साहिर लुधियानवी के प्रति उनका प्रेम गहरा था, लेकिन अधिकतर अनकहा रहा। अमृता साहिर के सिगरेट के ठूंठे उठाकर पीती थीं। यह उनके करीब होने की एक बेचैन कोशिश थी। वे लिखती हैं, “उस संपर्क ने मुझे सिर्फ़ एक औरत बना दिया, फिर न काग़ज़ की ज़रूरत रही, न कलम की।” साहिर के साथ उनके दो दिनों के मिलन को वे कविता की तरह याद करती हैं—“अजीब मिलन, कई वर्षों बाद जब दो ज़िंदगियां कविता की तरह धड़क उठीं।” इसके उलट, इमरोज़ के साथ अमृता का लिव-इन रिश्ता उनकी मुक्ति का प्रतीक था। इमरोज़ ने कैनवास पर लाल रंग से उनके माथे पर सिंदूर का टीका लगाया। यह किसी पारंपरिक विवाह का नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर साथ रहने का संकेत था। अमृता कहती हैं, “तुम मेरे लिए 15 अगस्त हो, क्योंकि तुम्हारे साथ मेरी आज़ादी आई।” वे साहिर और इमरोज़ के रिश्ते को भी अलग ढंग से समझाती हैं। अमृता कहती हैं कि साहिर उनके लिए खुला आसमान थे, जबकि इमरोज़ घर की छत। यह प्रेम सामाजिक नैतिकताओं से मुक्त था और पितृसत्ता की सीमाओं को तोड़ता था।

जीवन का यथार्थ और आत्मकथा

अमृता का प्रेम सीमाओं में बंधा नहीं था। यह साहिर और इमरोज़ तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि ज़ुल्फ़िया जैसी विदेशी कवयित्री के साथ बहनत्व में भी दिखा। ताशकंद में ज़ुल्फ़िया से उनकी मुलाक़ात भाषा की दीवारों से परे थी। शब्द भले कम थे, लेकिन आँसुओं ने एक गहरा रिश्ता बना दिया। साहित्यिक दृष्टि से रसीदी टिकट एक कन्फेशनल लेखन का उदाहरण है। अमृता अपनी ज़िंदगी के अंधेरे हिस्सों को छिपाती नहीं हैं। वे उन्हें पूरी ईमानदारी से सामने रखती हैं। यहां प्रेम धरती और आकाश के बीच की धड़कन बन जाता है, जैसे किसी सूफ़ी प्रेम की अनुभूति। यह किताब पढ़ते हुए लगता है कि यह पितृसत्तात्मक सोच के ख़िलाफ़ एक नारीवादी घोषणा है। अमृता की कलम महिलाओं के उस दबे हुए ग़ुस्से को उजागर करती है, जो अक्सर आज्ञाकारिता के पीछे छुपा रहता है। वे अपनी कलम को अपना सहारा मानती हैं और उससे लिपटकर रोती भी हैं।

हालांकि रसीदी टिकट की भाषा काव्यात्मक और भावुक है, लेकिन इसकी संरचना बिखरी हुई लगती है। इसी वजह से इसे कई बार एक ‘अधूरी आत्मकथा’ कहा जाता है। फिर भी यह रचना अमृता की विद्रोही चेतना का मजबूत प्रमाण है। एक साधारण सा टिकट, जो उनकी ज़िंदगी की सबसे क़ीमती स्मृति बन जाता है। किताब में रूस और यूरोप की यात्राओं का वर्णन भी खास है। टॉलस्टॉय का ज़िक्र और मॉस्को की सड़कों का चित्रण इसे यात्रा-वृत्तांत जैसा रूप देता है। अमृता प्रीतम की ज़िंदगी अपने समय से बहुत आगे थी। लिव-इन रिश्ता, तलाक़ और आर्थिक आत्मनिर्भरता उनके जीवन के सहज निर्णय थे। उन्होंने उस राष्ट्रवादी सोच से खुद को अलग रखा, जहां महिलाओं को संस्कृति की रखवाली तक सीमित कर दिया जाता है। बंटवारे के समय वे सैनिकों से महिलाओं के सम्मान की अपील करती हैं, जो राष्ट्रवाद से आगे की मानवीय सोच को दिखाता है। आज #MeToo के दौर में अमृता और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। उनकी लेखनी दर्द को शब्द देती है और समाज को आईना दिखाती है। रसीदी टिकट यह याद दिलाती है कि कैसे एक महिला ने सेंसरशिप, पूर्वाग्रह और प्रेम की तड़प के बीच अपनी आवाज़ को बचाए रखा। आलोचनाओं के बावजूद यह किताब सृजन की जीत है। अमृता के शब्द आज भी गूंजते हैं कि “मैं वैसा जीना चाहती हूं, जैसा मैं सोचती हूं।”

About the author(s)

दिल्ली विश्वविद्यालय की पत्रकारिता की छात्रा हूं। बिहार के सत्याग्रह की भूमि से आती हूं। देश की राजनीतिक गतिविधियों में दिमाग खपाने का निजी शौक है। लेकिन "Politics is a dirty game" सर्वविदित कथन कहने में परहेज़ नहीं करती हूं! किताबें पढ़ती हूं पर इसमें भी राजनीतिक और उपन्यास को महत्व देती हूं। लेखनी से पहले शोध आवश्यक समझती हूं। महिला होने के नाते उनके हक की बात करती हूं पर मामला ज्यादा गड़बड़ तब हो जाता है, जहां कोई पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित इंसान महिला होने का बोध कराने पर अड़ जाता है। मेरे शब्द मेरा नजरिया है।

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