समाजपर्यावरण पर्यावरणीय क्षरण और बच्चों की दुनिया: क्या हम जिम्मेदार हैं?

पर्यावरणीय क्षरण और बच्चों की दुनिया: क्या हम जिम्मेदार हैं?

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत में जलवायु आपदाओं के कारण 20 लाख से अधिक बच्चे प्रभावित हुए। ऐसे में माता-पिता के लिए बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना कठिन होता जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय क्षरण (Environmental Degradation) एक गंभीर समस्या बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, वायु और जल प्रदूषण, जंगलों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों की कमी और बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही हैं, बल्कि मनुष्यों के जीवन पर भी गहरा असर डाल रही हैं। इस क्षरण का प्रभाव विशेष रूप से बच्चों और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ रहा है। माता-पिता को अब पारंपरिक जीवनशैली से हटकर नई चुनौतियों के अनुरूप अपनी पारिवारिक योजनाओं, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर निर्णय लेने पड़ रहे हैं। पर्यावरणीय क्षरण का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल लगभग 6 लाख बच्चों का वायु प्रदूषण के कारण असमय मौत हो रही है। भारत में भी वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।

देश के 30 फीसद से अधिक बच्चे प्रदूषणजनित बीमारियों से प्रभावित हैं। इसके अलावा, जल संकट और खाद्य असुरक्षा भी बच्चों के स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं। दूषित जल पीने से डायरिया, पीलिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट अनुसार, सूखा प्रभावित राज्यों में स्कूल छोड़ने की दर में 22 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। कुपोषण भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है, जिससे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो रही है। मानसिक स्वास्थ्य भी पर्यावरणीय संकट से अछूता नहीं है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, हीटवेव) के कारण बच्चों में चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। लगातार बदलते मौसम, अनिश्चितता और आपदाओं का डर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल लगभग 6 लाख बच्चों का वायु प्रदूषण के कारण असमय मौत हो रही है। भारत में भी वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं।

बच्चों की शिक्षा और विकास पर प्रभाव

तस्वीर साभार: Financial Express

पर्यावरणीय क्षरण शिक्षा प्रणाली को भी बाधित कर रहा है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कई स्कूल प्रदूषण, बाढ़ और गर्मी के कारण अक्सर बंद होते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बाढ़ और सूखे के कारण हर साल हजारों स्कूल प्रभावित होते हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और खासकर लड़कियों की शिक्षा पर इसका नकारात्मक प्रभाव अधिक पड़ता है, क्योंकि अक्सर उन्हें घरेलू कामों में लगा दिया जाता है। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण बच्चों की बाहरी गतिविधियां भी सीमित हो गई है। वायु प्रदूषण के कारण माता-पिता बच्चों को बाहर खेलने देने से बचते हैं, जिससे उनकी शारीरिक गतिविधि घट रही है और मोटापा और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा, गर्मी और अत्यधिक ठंड के कारण स्कूलों में उपस्थिति दर में गिरावट आ रही है।

आर्थिक असुरक्षा और पारिवारिक योजनाओं पर प्रभाव

पर्यावरणीय क्षरण केवल स्वास्थ्य और शिक्षा को प्रभावित नहीं करता, बल्कि परिवारों की आर्थिक स्थिरता पर भी असर डालता है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण कृषि उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। भारत में लगभग 60 फीसद किसान जलवायु परिवर्तन के कारण आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। बेमौसम बारिश, सूखा और बाढ़ के कारण फसलें बर्बाद हो रही हैं, जिससे किसानों की आय घट रही है और उनके बच्चों की शिक्षा और पोषण पर असर पड़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में भी बढ़ते जल और वायु प्रदूषण के कारण चिकित्सा खर्च बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा डेटा के आधार पर, यह अनुमान लगाया गया है कि 2019 में भारत में कुल स्वास्थ्य सेवा लागत 103.7 बिलियन डॉलर थी। 2019 में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों में 11.5 फीसद की वृद्धि के साथ, वायु प्रदूषण से संबंधित बीमारियों के लिए स्वास्थ्य सेवा लागत लगभग 11.9 बिलियन डॉलर होगी। आर्थिक अस्थिरता के कारण कई परिवार बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर आवश्यक खर्च करने में असमर्थ हो जाते हैं। जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असुरक्षा का प्रभाव माता-पिता की पारिवारिक योजनाओं पर भी पड़ रहा है। कई माता-पिता कम बच्चों की योजना बना रहे हैं ताकि वे अपने सीमित संसाधनों से उन्हें बेहतर जीवन दे सकें। ऐसा अनुमान है कि जलजनित रोगों के कारण भारत में प्रति वर्ष लगभग 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक बोझ पड़ता है।

डबल्यूएचओ के अनुसार, भारत में हर साल 3 मिलियन से अधिक लोग प्रदूषणजनित बीमारियों के इलाज पर अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं।

बढ़ते प्रदूषण के कारण बच्चों की जीवनशैली में बदलाव

पर्यावरणीय क्षरण के कारण बच्चों की दिनचर्या और जीवनशैली में भी नकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। बढ़ते तापमान, अनियमित मौसम और प्रदूषण के कारण बच्चों के खेलने-कूदने और बाहरी गतिविधियों के अवसर कम हो गए हैं। पहले बच्चे पार्कों, मैदानों और गलियों में खेलते थे, लेकिन अब प्रदूषण और जलवायु अस्थिरता के कारण माता-पिता उन्हें बाहर भेजने से हिचकिचाते हैं। वायु प्रदूषण और अत्यधिक गर्मी के कारण बच्चे ज्यादातर घरों में बंद रहने को मजबूर हो गए हैं, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो रहा है। बाहरी गतिविधियों में कमी आने के कारण बच्चे अब डिजिटल उपकरणों और स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहे हैं। इससे न केवल उनकी आँखों और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है, बल्कि उनकी सामाजिक और भावनात्मक क्षमताएं भी प्रभावित हो रही हैं।

तस्वीर साभार: India Today

पर्यावरणीय क्षरण के कारण प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। भारत में हर साल हजारों लोग बाढ़, चक्रवात और सूखे के कारण विस्थापित हो जाते हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में, लगभग 24.1 मिलियन बच्चे हर वर्ष बाढ़, चक्रवात, गर्म लहरों और अन्य आपात स्थितियों से प्रभावित होते हैं। ऐसे में माता-पिता के लिए बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना कठिन होता जा रहा है। बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य उत्पादन में भी गिरावट आ रही है, जिससे खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक वैश्विक खाद्य उत्पादन में 25 फीसद तक की गिरावट हो सकती है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों के पोषण और उनके संपूर्ण विकास पर पड़ेगा।

पर्यावरणीय क्षरण केवल एक पारिस्थितिक समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बच्चों और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ रहा है। माता-पिता को अपने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अब अधिक सतर्क निर्णय लेने पड़ रहे हैं। इस संकट से निपटने के लिए हमें तत्काल और प्रभावी कदम उठाने होंगे ताकि हम अपने बच्चों को एक सुरक्षित, स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य प्रदान कर सकें। पर्यावरण की रक्षा करना केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनिवार्यता है।

About the author(s)

मेरा नाम ज्योति कुमारी है।  मैं हिंदी साहित्य की छात्रा हूँ। सामाजिक रूढ़िवाद, भेदभाव और लैंगिग असामनता पर खूब लिखना और सीखना चाहती हूँ। इस विषय पर बात करने में रूचि रखती हूँ। साथ ही अपनी लेखनी के माध्यम से अपने गांव समाज की हर एक वर्ग की आवाज़ बनना चाहती हूँ जिन्हें सदियों से बोलने का मौका नहीं दिया गया है।

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