समाजकैंपस कैंपस की चमक के पीछे सपनों के साथ निकली लड़कियां और असमानता का यथार्थ

कैंपस की चमक के पीछे सपनों के साथ निकली लड़कियां और असमानता का यथार्थ

संस्थानों में आंतरिक शिकायत समितियां और कानून मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहुंच, संवेदनशीलता और भरोसेमंद प्रक्रिया पर सवाल बने रहते हैं। कई बार शिकायत करने पर सहयोग के बजाय चुप रहने की सलाह मिलती है, जो संस्थागत विफलता को उजागर करता है।

सपनों और उम्मीदों का झोला लेकर जब लड़कियां शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलती हैं, तो वे केवल एक नए संस्थान में प्रवेश नहीं करतीं हैं, बल्कि एक बिल्कुल नई दुनिया में कदम रखती हैं। यह बदलाव आज के समय में अधिकांश युवाओं की साझा सच्चाई है। कहीं पढ़ाई के लिए, तो कहीं नौकरी के लिए। लेकिन इस बदलाव का अनुभव लड़कियों के लिए अक्सर अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण होता है। अच्छी शिक्षा की तलाश में आज बड़ी संख्या में युवा घर से दूर जा रहे हैं। नए शहर, नया वातावरण और नई जिम्मेदारियां। यह सब आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। घर में जहां माता-पिता का मार्गदर्शन और निगरानी रहती है, वहीं कैंपस में निर्णय लेने की पूरी जिम्मेदारी खुद पर आ जाती है।

 समय का प्रबंधन, अनुशासन और सीमाएं तय करना यहां सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है, जो युवा इसे जल्दी समझ लेते हैं, उनके लिए आगे का रास्ता अपेक्षाकृत आसान हो जाता है, जबकि कई इसके अभाव में भटकाव और दबाव का सामना करते हैं। कैंपस का जीवन बाहर से जितना खुला और संभावनाओं से भरा दिखता है, भीतर से उतना ही दबावपूर्ण भी होता है। पढ़ाई का बोझ, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और खुद को साबित करने की लगातार चिंता युवाओं को थका देती है। लड़कियों के लिए यह दबाव और गहरा हो जाता है, क्योंकि उन्हें केवल अच्छी विद्यार्थी बनने की नहीं, बल्कि अच्छी लड़की बने रहने की अपेक्षा भी साथ लेकर चलनी पड़ती है।

पढ़ाई का बोझ, भविष्य को लेकर अनिश्चितता और खुद को साबित करने की लगातार चिंता युवाओं को थका देती है। लड़कियों के लिए यह दबाव और गहरा हो जाता है, क्योंकि उन्हें केवल अच्छी विद्यार्थी बनने की नहीं, बल्कि अच्छी लड़की बने रहने की अपेक्षा भी साथ लेकर चलनी पड़ती है।

आज़ादी और अकेलापन कैंपस का दोहरा सच

कैंपस लाइफ बाहर से आज़ादी और अवसरों से भरी दिखाई देती है। अपनी पसंद से रहना, अपने फैसले खुद लेना और रोज़मर्रा की निगरानी से मुक्ति, यह सब आकर्षक लगता है। लेकिन इसी आज़ादी के साथ एक गहरा अकेलापन भी जुड़ा होता है। परिवार से दूर होने पर भावनात्मक सहारा सीमित हो जाता है। ऐसे में अगर कोई युवा मानसिक रूप से तैयार न हो, तो यह आज़ादी दबाव में बदल सकती है। फिल्म थ्री इडियट्स का जॉय वाला दृश्य इसी सच्चाई की ओर इशारा करता है। अगर संकट के समय सहारा और संवाद न मिले, तो समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। कैंपस में गिरने पर संभालने के लिए परिवार जैसा नेटवर्क अक्सर मौजूद नहीं होता। यहां खुद को संभालना और मदद मांगना सीखना जरूरी हो जाता है।टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे साल 2023 के एक अध्ययन से पता चलता है कि विद्यार्थियों या युवा वयस्कों में चिंता, अवसाद और भावनात्मक तनाव का स्तर चिंताजनक रूप से अधिक है, और उनमें से कई सामाजिक कलंक के डर से पेशेवर मदद लेने में असमर्थ या अनिच्छुक हैं। 

गौरतलब है कि अध्ययन के मुताबिक दिल्ली के विद्यार्थी अन्य शहरों के विद्यार्थियों की तुलना में अधिक अवसाद का सामना कर रहे हैं। इस अध्ययन में हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता और दिल्ली सहित आठ प्रमुख शहरों के 18-29 साल की आयु वर्ग के 1,628 विद्यार्थियों का सर्वेक्षण किया गया। प्रतिभागियों में से 47.1 फीसदी पुरुष और 52.9 फीसदी महिलाएं शामिल थीं। करीब 70 फीसदी विद्यार्थियों ने मध्यम से गंभीर स्तर की चिंता महसूस करने की बात कही। वहीं लगभग 60 फीसदी विद्यार्थियों में अवसाद के लक्षण पाए गए और 70 फीसदी से अधिक विद्यार्थियों ने अत्यधिक तनाव का अनुभव किया। लगभग एक तिहाई ने कमजोर भावनात्मक संबंधों की सूचना दी, जबकि 15 फीसदी ने जीवन से असंतोष महसूस किया, जबकि करीब 8 फीसदी विद्यार्थियों में समग्र मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट दर्ज की गई। गौरतलब है कि,महिला विद्यार्थियों ने पुरुषों की तुलना में काफी अधिक तनाव और कम खुशहाली की सूचना दी।

इस अध्ययन में हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता और दिल्ली सहित आठ प्रमुख शहरों के 18-29 साल की आयु वर्ग के 1,628 विद्यार्थियों का सर्वेक्षण किया गया। प्रतिभागियों में से 47.1 फीसदी पुरुष और 52.9 फीसदी महिलाएं शामिल थीं। करीब 70 फीसदी विद्यार्थियों ने मध्यम से गंभीर स्तर की चिंता महसूस करने की बात कही।

लड़कियों के लिए अलग नियम, अलग अपेक्षाएं

शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलना किसी भी लड़की के जीवन का एक निर्णायक कदम होता है। यह केवल शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे से टकराने की प्रक्रिया भी है। कैंपस में प्रवेश के साथ ही लड़कियों पर सुरक्षा, मर्यादा और व्यवहार से जुड़ी अतिरिक्त शर्तें लागू हो जाती हैं। जहां लड़कों की आज़ादी को स्वाभाविक माना जाता है, वहीं लड़कियों की गतिविधियों को लगातार निगरानी और संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। यह अंतर व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित असमानता का हिस्सा है, जो नियमों और व्यवहार दोनों में दिखाई देता है। 

कैंपस में लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर कई बार पाबंदियां  लगा दी जाती हैं। इसका एक उदाहरण, द ट्रिब्यून में छपी एक खबर के मुताबिक, नवम्बर 2025 में मुरथल स्थित दीनबंधु छोटू राम विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीसीआरयूएसटी) की छात्राओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें शाम 6 बजे छात्रावासों में बंद कर दिया जाता है और सुबह 6:30 बजे ही बाहर जाने की अनुमति दी जाती है। छात्राओं ने कहा कि छात्रावास के अत्यधिक लंबे समय तक बंद रहने से न केवल उनकी आवाजाही प्रतिबंधित होती है, बल्कि यह विश्वविद्यालय के महिला विद्यार्थियों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण और लैंगिक पूर्वाग्रह को भी सामने लाता है। 

कैंपस में प्रवेश के साथ ही लड़कियों पर सुरक्षा, मर्यादा और व्यवहार से जुड़ी अतिरिक्त शर्तें लागू हो जाती हैं। जहां लड़कों की आज़ादी को स्वाभाविक माना जाता है, वहीं लड़कियों की गतिविधियों को लगातार निगरानी और संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।

यौन हिंसा और चुप्पी की मजबूरी

कैंपस में यौन हिंसा चाहे वह अनचाहे कमेंट हों, पीछा करना, हिंसा या ऑनलाइन हैरेसमेंट हो, ये सब एक कड़वी हकीकत है। अधिकांश लड़कियां इसे अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि मजबूरी में चुपचाप सहन करती हैं। परिवार की उम्मीदें, बदनामी का डर और पढ़ाई रुक जाने की आशंका उन्हें शिकायत दर्ज कराने से रोकती है। हालांकि संस्थानों में आंतरिक शिकायत समितियां (आईसीसी ) और कानून मौजूद हैं, लेकिन उनकी पहुंच, संवेदनशीलता और भरोसेमंद प्रक्रिया पर सवाल बने रहते हैं। कई बार शिकायत करने पर सहयोग के बजाय चुप रहने की सलाह मिलती है, जो संस्थागत विफलता को उजागर करता है। द वायर में छपे भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, देश में यौन हिंसा के 99.1 फीसदी मामले दर्ज नहीं किए जाते है। कैंपस में यह अंतर और भी अधिक साफ़ और गंभीर है। दिल्ली विश्वविद्यालय में साल 2018 में हुए एक अध्ययन से पता चला कि चार में से एक छात्रा ने हिंसा का सामना किया था। समाजशास्त्री डॉ. आकृति भाटिया ने एक शोध पत्र का हवाला देते हुए बताया कि कैंपस में हिंसा के 40 फीसदी मामले तो दर्ज ही नहीं होते हैं।

स्क्रॉल  में साल 2024 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की वर्तमान और पूर्व महिला छात्राओं के बीच साल 2022 में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 48 फीसदी छात्राओं को किसी न किसी रूप में लैंगिक हिंसा का सामना करना पड़ा,जैसे भद्दी टिप्पणियां करना और बिना सहमति के छूना जैसे अनुभव शामिल थे। इस सर्वे में शामिल 736 विद्यार्थियों में से करीब 80 फीसदी ने कहा कि कॉलेज या विश्वविद्यालय प्रशासन की उदासीनता ही कैंपस को असुरक्षित बनाती है। इसके अलावा आधे से भी कम विद्यार्थियों को अपने कॉलेज में आईसीसी के बारे में जानकारी थी। इसके अलावा, 70 फीसदी विद्यार्थियों ने बताया कि उनके कॉलेजों में आईसीसी के सदस्यों के नाम और संपर्क विवरण कहीं साफ़ तौर पर लगाए ही नहीं गए हैं। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि आईसीसी तक पहुंच अभी भी सीमित बनी हुई है।

इस सर्वे में शामिल 736 विद्यार्थियों में से करीब 80 फीसदी ने कहा कि कॉलेज या विश्वविद्यालय प्रशासन की उदासीनता ही कैंपस को असुरक्षित बनाती है। इसके अलावा आधे से भी कम विद्यार्थियों को अपने कॉलेज में आईसीसी के बारे में जानकारी थी।

बदलाव के लिए है बराबरी की ज़रूरत

शिक्षा को वास्तव में समान अवसरों का माध्यम बनाना है, तो कैंपस को केवल सुरक्षित घोषित करना पर्याप्त नहीं है, उसे बराबरी, सम्मान और भरोसे का स्थान बनाना होगा। सबसे पहले नियमों और अनुशासन में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना ज़रूरी है। सुरक्षा के नाम पर लगाए गए नियंत्रण, अलग-अलग समय-सीमाएं और व्यावहारिक पाबंदियां लड़कियों को सशक्त नहीं, बल्कि संकुचित करती हैं। इसके साथ ही, संस्थानों में मौजूद शिकायत तंत्र ख़ास कर यौन हिंसा से जुड़े मामलों में सिर्फ़ कागजी न रहकर संवेदनशील, पारदर्शी और भरोसेमंद होने चाहिए, ताकि लड़कियां डर या अपराधबोध के बिना अपनी बात रख सकें।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता को भी कैंपस की प्राथमिक ज़रूरत के रूप में स्वीकार करना होगा। अकेलापन, दबाव, असफलता का डर और परिवार की उम्मीदों का बोझ इन सबको व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि संरचनात्मक चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। काउंसलिंग, संवाद और सहयोग की मज़बूत व्यवस्था ही लड़कियों को टूटने से बचा सकती है। क्योंकि जब एक लड़की बिना डर, बिना संदेह और बिना अपराधबोध के सीख सकती है, तब ही शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को पूरा करती है। बराबरी सिर्फ़ नीति नहीं, बल्कि बदलाव की बुनियाद है और यही बुनियाद एक न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज की ओर ले जाती है।

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