समाजखेल कैसे खेल कमेंट्री में सेक्सिज़म महिला खिलाड़ियों को सीमित करती है

कैसे खेल कमेंट्री में सेक्सिज़म महिला खिलाड़ियों को सीमित करती है

पेरिस ओलंपिक 2024 में भारतीय शूटर मनु भाकर के साथ हुई घटना इसका उदाहरण है। दो ओलंपिक पदक जीतने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे उनकी मेहनत या रणनीति पर सवाल करने के बजाय उनकी सुंदरता और निजी रिश्तों पर टिप्पणी की गई।

कभी महिलाओं की बेड़ियां घर की चारदीवारी तक सीमित थीं। लेकिन आधुनिकता के विकास के साथ महिलाओं ने भी लंबा संघर्ष किया और आज वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। आज महिलाएं खेल, मनोरंजन, अंतरिक्ष, व्यापार और कई अन्य क्षेत्रों में अपनी मेहनत और लगन से नई ऊंचाइयां छू रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि जिन क्षेत्रों पर कभी पुरुषों का एकाधिकार था, क्या वहां महिलाओं के लिए जगह बनाना आसान रहा? जब भी महिलाएं पुरुषों के बराबर आगे बढ़ने की कोशिश करती हैं, तो उन्हें बार-बार उनके स्त्री होने का एहसास दिलाया जाता है। खेल का मैदान इसका साफ उदाहरण है, जहां सदियों तक पुरुषों का वर्चस्व रहा। महिलाओं ने संघर्ष कर इस दीवार को तोड़ा, लेकिन आज भी उन्हें बराबरी का सम्मान नहीं मिल पाया।

समाज अब भी महिलाओं को सुंदरता, आकर्षण और शारीरिक कमजोरी से जोड़कर देखता है। यह सोच सिर्फ समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि कोच, कमेंटेटर, साथी खिलाड़ी और खेल पत्रकार भी इसे दोहराते हैं। पेरिस ओलंपिक 2024 में भारतीय शूटर मनु भाकर के साथ हुई घटना इसका उदाहरण है। दो ओलंपिक पदक जीतने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे उनकी मेहनत या रणनीति पर सवाल करने के बजाय उनकी सुंदरता और निजी रिश्तों पर टिप्पणी की गई। यह सवाल उनकी उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ करता है और दिखाता है कि मीडिया तक आज भी महिलाओं को पुरुषवादी नजरिए से देखता है। भारत में महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, फिर भी उनकी कहानियां अक्सर पुरुषों से तुलना करके कही जाती हैं। ऐसे शब्द और तुलना महिलाओं को बराबरी के बजाय दूसरे दर्जे पर खड़ा कर देती हैं।

पेरिस ओलंपिक 2024 में भारतीय शूटर मनु भाकर के साथ हुई घटना इसका उदाहरण है। दो ओलंपिक पदक जीतने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे उनकी मेहनत या रणनीति पर सवाल करने के बजाय उनकी सुंदरता और निजी रिश्तों पर टिप्पणी की गई।

खेल कमेंट्री की भाषा, कॉवेरेज और लैंगिक भेदभाव

खेल कमेंट्री की भाषा अक्सर ऐसे रूपकों से भरी होती है, जो महिलाओं को पुरुषों से तुलना कर कमतर दिखाती है। क्रिकेट कमेंट्री में भारतीय महिला टीम की जीत को कई बार पुरुषों की तरह आक्रामक कहा जाता है, मानो आक्रामकता महिलाओं की स्वाभाविक विशेषता न हो। एक शोध पत्र बताता है कि खेल की भाषा महिलाओं को ‘सुंदर और नाजुक’ के रूप में दिखाती है, जबकि पुरुषों को ‘शक्तिशाली और रणनीतिक’ कहा जाता है। भारतीय संदर्भ में यह समस्या और गहरी है। साल 2023 महिला टी20 विश्व कप सेमीफाइनल में शेफाली वर्मा के आक्रामक जश्न पर सवाल उठाए गए, क्योंकि एक महिला से ऐसी आक्रामकता की उम्मीद नहीं की जाती। यह सोच महिलाओं को नाजुक और घरेलू छवि में बांध देती है। सानिया मिर्जा से बार-बार परिवार बसाने के सवाल पूछे जाते रहे जबकि पुरुष खिलाड़ियों से ऐसे सवाल नहीं किये जाते। पेरिस ओलंपिक में दीपिका कुमारी की हार के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें ‘हीरोइन से वैम्प’ तक कहा गया। एक अध्ययन के अनुसार, भारतीय अख़बारों में महिला एथलीटों की 60 प्रतिशत कवरेज उनके खेल की जगह उनकी शारीरिक बनावट पर केंद्रित होती है।

महिला खेलों को मीडिया कवरेज और लैंगिक भेदभाव

यूनेस्को की एक रिपोर्ट अनुसार बड़े स्पोर्ट्स फेस्टिवल्स के समय को छोड़कर, आंकड़े बताते हैं कि सभी स्पोर्ट्स में हिस्सा लेने वालों में 40 फीसद महिलाएं होती हैं, फिर भी महिलाओं के स्पोर्ट्स को सभी स्पोर्ट्स मीडिया कवरेज का सिर्फ़ 4 फीसद ही मिलता है। उस सीमित कवरेज में भी, महिलाओं को अक्सर ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है या उन्हें नीचा दिखाया जाता है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ फिजिकल एजुकेशन, स्पोर्ट्स एंड हेल्थ के एक शोध अनुसार साल 2017 तक देश के एक तिहाई हिस्से को यह भी नहीं पता था कि हमारे पास महिलाओं की इंटरनेशनल क्रिकेट टीम भी है क्योंकि कवरेज बहुत कम था। जबकि दोनों टीमें बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही थीं। लेकिन किसी को भी महिला टीम के बारे में, उनके मैच के समय, शेड्यूल, जीत या खिलाड़ियों के नाम के बारे में नहीं पता था। देश के 90 फीसद लोगों को यह भी नहीं पता था कि महिला क्रिकेट टीम की कप्तान का नाम क्या है, जिसने भारत के लिए लगभग 180 वनडे इंटरनेशनल मैच खेले हैं। महिला वर्ल्ड कप 2017 के दौरान सभी ग्रुप लीग मैच स्पोर्ट्स चैनलों पर टेलीकास्ट नहीं हो रहे थे। लेकिन जब हरमनप्रीत की पारी पर पूरी दुनिया की वाहवाही हुई, तो अचानक महिला क्रिकेट स्पोर्ट्स और न्यूज़ चैनलों पर छा गया और इससे टीआरपी बढ़ गई।

इसी तरह विनेश फोगाट की उपलब्धियों से ज़्यादा चर्चा उनके यौन उत्पीड़न मामले पर हुई। मीडिया अक्सर महिलाओं को ‘महिला पहले, एथलीट बाद में’ दिखाता है। यह असमान कवरेज महिलाओं को स्पॉन्सरशिप और संसाधनों से भी वंचित करती है। जहां पुरुष क्रिकेटर करोड़ों कमाते हैं, वहीं महिला खिलाड़ियों को बहुत कम भुगतान मिलता है। ऐसे सवाल भी महिलाओं से ही पूछे जाते हैं कि वे अपनी फीस या नीलामी राशि की हक़दार हैं या नहीं। यह भाषा और रवैया खेल में लैंगिक भेदभाव को सामान्य बनाती है।

एक शोध पत्र बताता है कि खेल की भाषा महिलाओं को ‘सुंदर और नाजुक’ के रूप में दिखाती है, जबकि पुरुषों को ‘शक्तिशाली और रणनीतिक’ कहा जाता है। भारतीय संदर्भ में यह समस्या और गहरी है। साल 2023 महिला टी20 विश्व कप सेमीफाइनल में शेफाली वर्मा के आक्रामक जश्न पर सवाल उठाए गए, क्योंकि एक महिला से ऐसी आक्रामकता की उम्मीद नहीं की जाती।

यह कहानी उन महिला एथलीटों की है जो मैदान पर जीतती हैं, लेकिन भाषा और व्यवहार से हारती हैं। साल 2003 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में मंदिरा बेदी को होस्ट के रूप में काम करते हुए पुरुष कमेंटेटरों की लिंगवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। उन्हें “सिर्फ सजावट” समझा गया। टॉक शो वॉट वुमेन वॉन्ट में मंदिरा ने बताया कि प्री-मैच शो के दौरान कई क्रिकेटर उन्हें घूरते थे। जब वे सवाल पूछती थीं, तो कहा जाता था कि ये कैसे सवाल हैं। कई बार पैनल में बैठे लोग भी उनके साथ बदतमीज़ी करते थे। यहां ताकि कि साल 2023 में हरभजन सिंह ने अनुष्का शर्मा और अथिया शेट्टी पर सेक्सिस्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें क्रिकेट की कितनी समझ है। महिला टी20 वर्ल्ड कप में न्यूज़ीलैंड से हार के बाद महिला खिलाड़ियों को सोशल मीडिया पर ‘रसोई में वापस जाने’ जैसी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

साल 2019 में हार्दिक पांड्या के कॉफी विद करण शो पर दिए गए सेक्सिस्ट बयानों के बाद बीसीसीआई को कार्रवाई करनी पड़ी। हालांकि इसपर माफ़ी मांगी गई, लेकिन यह समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचना नहीं था। वहीं पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर से जुड़ी कमेंट्री ने भी दिखाया कि कैसे महिलाओं को एक खिलाड़ी की नजर से नहीं बल्कि सेक्सिस्ट नज़र से देखा जाता है। भाषा यौन हिंसा का एक अहम कारक या जरिया बनती है। खेल में ऐसी भाषा का असर गंभीर है। यूनेस्को के अध्ययनों के अनुसार, 49 फीसद किशोर लड़कियां खेल छोड़ देती हैं और 21 फीसद महिला एथलीटों को यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। साल 2024 की सेज जर्नल की एक रिपोर्ट बताती है कि महिला क्रिकेट टीम की आलोचना पुरुष टीम की तुलना में ज्यादा सेक्सिस्ट होती है।

महिला खेलों को भारत में सिर्फ 4 प्रतिशत मीडिया कवरेज मिलती है, जबकि अमेरिका में यह 15 प्रतिशत है। इसी वजह से 90 प्रतिशत लोग भारतीय महिला क्रिकेट टीम या उसकी कप्तान को नहीं जानते। विनेश फोगाट की उपलब्धियों से ज़्यादा चर्चा उनके यौन उत्पीड़न मामले पर हुई।

हालांकि बदलाव की कोशिशें दिख रही हैं। बीसीसीआई की कार्रवाई और सानिया मिर्जा जैसी खिलाड़ियों की आवाज़ अहम हैं। मनु भाकर से शेफाली वर्मा तक, महिला एथलीट साबित कर रही हैं कि वे सिर्फ खिलाड़ी हैं, तुलना या टिप्पणी का विषय नहीं। समानता की शुरुआत भाषा बदलने से ही होगी। जेंडर-संवेदनशीलता के अध्ययन बताते हैं कि सेक्सिज़्म दो तरह का होता है। एक खुला और अपमानजनक और दूसरा ख़्याल रखने या तारीफ़ के नाम पर महिलाओं को सीमित कर देने वाला। खेल कमेंट्री में अक्सर यही दूसरा रूप दिखता है। यह सुनने में नरम लगता है, लेकिन असल में महिला खिलाड़ियों को पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं में बाँध देता है। कमेंट्री सिर्फ़ शब्दों का खेल नहीं है। इसका सीधा असर मीडिया कवरेज, कमाई और खिलाड़ियों के करियर पर पड़ता है। जब टीवी और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियां खेल के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी निजी छवि या व्यक्तित्व के ज़रिये दिखाई जाती हैं, तो उनकी मेहनत और प्रदर्शन पीछे छूट जाते हैं। इसका असर स्पॉन्सरशिप, ब्रांड डील और विज्ञापनदाताओं की प्राथमिकताओं पर भी पड़ता है।

कई बार कमेंटेटर अनजाने में ऐसी भाषा दोहराते हैं जो महिलाओं के खिलाफ़ धारणा बनाती है। जब किसी कमेंटेटर के अपमानजनक बयान सामने आए, तो सोशल मीडिया और पत्रकारिता जगत ने मिलकर सवाल उठाए। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि ब्रॉडकास्टर्स को जेंडर-सेंसिटिविटी ट्रेनिंग देनी चाहिए और कमेंट्री टीमों में विविधता बढ़ानी चाहिए। इससे यह साफ़ होता है कि बदलाव संभव है। लेकिन इस बदलाव की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ खिलाड़ियों पर नहीं डाली जा सकती। मीडिया हाउसों, खेल संघों और दर्शकों की भी इसमें भूमिका है। मीडिया संगठनों को स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने चाहिए कि खेल कवरेज में किस तरह की भाषा और लहजा स्वीकार्य है। लाइव ब्रॉडकास्ट की ट्रेनिंग में जेंडर जागरूकता को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। साथ ही, कमेंट्री में महिलाओं और अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों को शामिल करना ज़रूरी है, ताकि नैरेटिव अपने आप बदले। मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना समाज और खेल जगत—दोनों के लिए एक बेहतर शुरुआत हो सकती है।

About the author(s)

दिल्ली विश्वविद्यालय की पत्रकारिता की छात्रा हूं। बिहार के सत्याग्रह की भूमि से आती हूं। देश की राजनीतिक गतिविधियों में दिमाग खपाने का निजी शौक है। लेकिन "Politics is a dirty game" सर्वविदित कथन कहने में परहेज़ नहीं करती हूं! किताबें पढ़ती हूं पर इसमें भी राजनीतिक और उपन्यास को महत्व देती हूं। लेखनी से पहले शोध आवश्यक समझती हूं। महिला होने के नाते उनके हक की बात करती हूं पर मामला ज्यादा गड़बड़ तब हो जाता है, जहां कोई पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित इंसान महिला होने का बोध कराने पर अड़ जाता है। मेरे शब्द मेरा नजरिया है।

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