उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में लड़कियों की ज़िंदगी को समझना आसान नहीं है, जहां जेंडर, जाति और धर्म उनकी रोज़मर्रा की जरूरतों को आकार देते हैं और मिलकर तय करते हैं कि लड़कियां क्या करेंगी और किस हद तक अपने फैसले खुद ले पाएंगी, चाहे बात उनके काम की हो, शिक्षा की हो, या उनके सपनों की ही क्यों न हो। इन पहाड़ी इलाकों में जीवन की बुनियादी ज़रूरतें भी आसान नहीं हैं। पहाड़ों में पानी के स्रोत अक्सर घरों से दूर होते हैं, इसलिए दूर से पानी लाना, जंगलों से पशुओं के लिए चारा लाना, लकड़ी लाना और घरेलू काम के साथ – साथ खेतों का काम केवल महिलाओं के जिम्मे होता है।
भारत के टाइम यूज़ सर्वे की साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 से 59 साल की उम्र की महिलाओं में से करीब 41 फीसदी महिलाएं घर के सदस्यों की देखभाल में हिस्सा लेती हैं, जबकि पुरुषों में यह हिस्सा केवल 21.4 फीसदी है। इतना ही नहीं, जो महिलाएं देखभाल का काम करती हैं, वे रोज़ाना औसतन 140 मिनट इसमें लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 74 मिनट इसमें व्यतीत करते हैं। ग्रामीण लड़कियों की जिम्मेदारियां बहुत छोटी उम्र से ही शुरू हो जाती हैं, उनके लिए घर का काम केवल मदद नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे उनकी पहचान का हिस्सा बन जाता है।इसके विपरीत, लड़कों को इन जिम्मेदारियों से काफी हद तक दूर रखा जाता है। उन्हें पढ़ाई करने, खेलने और बाहर जाने के ज्यादा अवसर मिलते हैं। इस तरह बचपन से ही एक असमानता बन जाती है, जो समय के साथ सामान्य लगने लगती है। हालांकि कई लड़कियां खुद ही मानने लगती हैं कि उनका दायरा घर तक ही सीमित है और उन्हें ज्यादा सवाल नहीं पूछने चाहिए।
भारत के टाइम यूज़ सर्वे की साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 से 59 साल की उम्र की महिलाओं में से करीब 41 फीसदी महिलाएं घर के सदस्यों की देखभाल में हिस्सा लेती हैं, जबकि पुरुषों में यह हिस्सा केवल 21.4 फीसदी है। इतना ही नहीं, जो महिलाएं देखभाल का काम करती हैं, वे रोज़ाना औसतन 140 मिनट इसमें लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 74 मिनट इसमें व्यतीत करते हैं।
जाति और सामाजिक सीमाएं
जेंडर के साथ-साथ जाति भी लड़कियों की ज़िंदगी को गहराई से प्रभावित करती है। कई जगहों पर आज भी लड़कियों के रिश्ते, उनकी दोस्ती और उनका बाहर जाना जाति के आधार पर तय होता है। उन्हें यह सिखाया जाता है कि वे अपनी जाति के दायरे में ही रहें।अगर कोई लड़की इन सीमाओं को पार करने की कोशिश करती है, तो उसे परिवार और समाज दोनों के दबाव का सामना करना पड़ता है।एक किशोरी ने कहा, “अगर हम अपनी पसंद से कहीं जाना चाहें, तो सबसे पहले लोग हमारी जाति पर सवाल उठाते हैं।” इस तरह का दबाव लड़कियों को अपनी इच्छाओं को दबाने पर मजबूर करता है। वे हर समय इस डर में रहती हैं कि लोग क्या कहेंगे, और यही डर धीरे -धीरे उनके आत्मविश्वास को कम करता है।
यंग लाइव्स में छपे एक लेख के मुताबिक, हाल के सालों में भारत में उच्च शिक्षा में दाखिले में भारी वृद्धि देखी गई है। लेकिन स्नातक दर में आज भी लैंगिक असमानताएं बनी हुई हैं और खास तौर पर गरीब परिवारों और सामाजिक रूप से वंचित समूहों की युवा महिलाओं को प्रभावित करती हैं, जिसका उनके सशक्तिकरण और भविष्य के रोजगार अवसरों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की संभावना है। लेखकों ने गरीबी और जाति सहित कई ऐसे कारकों की पहचान की है जो लड़कियों की उच्च शिक्षा प्राप्त करने की क्षमता को असमान रूप से प्रभावित करते हैं। जो लड़कियां कम उम्र से ही घरेलू जिम्मेदारियों में लग जाती हैं, उनके लिए पढ़ाई जारी रखना और उच्च शिक्षा तक पहुंचना और भी मुश्किल हो जाता है।बचपन में शिक्षा की कमी और जल्दी काम का बोझ, दोनों मिलकर लड़कियों के भविष्य के अवसरों को सीमित कर देते हैं।
कई जगहों पर आज भी लड़कियों के रिश्ते, उनकी दोस्ती और उनका बाहर जाना जाति के आधार पर तय होता है। उन्हें यह सिखाया जाता है कि वे अपनी जाति के दायरे में ही रहें।अगर कोई लड़की इन सीमाओं को पार करने की कोशिश करती है, तो उसे परिवार और समाज दोनों के दबाव का सामना करना पड़ता है।
धर्म, पाबंदियां और लड़कियों का मानसिक संघर्ष
धर्म और परंपराएं भी इस सामाजिक ढांचे को और मजबूत करती हैं। कई धार्मिक मान्यताएं लड़कियों के लिए अलग नियम तय करती हैं, जैसे उन्हें कैसे कपड़े पहनने हैं, कहां जाना है और किस समय बाहर निकलना है। कुछ जगहों पर आज भी पिरियड्स के दौरान लड़कियों को अलग रखा जाता है और उन्हें धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जाता है। एक युवा लड़की ने बताया, “उन दिनों में हमें अलग रखा जाता है, और ऐसा लगता है जैसे हम कुछ गलत कर रहे हों।” इन अनुभवों का असर उनके आत्मसम्मान पर पड़ता है और कई बार वे खुद को कमतर महसूस करने लगती हैं। इसका उदाहरण के तौर पर सोशल पॉलिसी रिसर्च फाउंडेशन( एसपीआरएफ ) की साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश की शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में 82 फीसदी किशोरियों ने सैनिटरी पैड का इस्तेमाल किया, लेकिन फिर भी 37.5 फीसदी लड़कियां पिरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जा पाईं, जिससे पता चलता है कि सैनिटरी पैड तक पहुंच का मतलब सामाजिक समावेश नहीं है।
सामाजिक कलंक, पाबंदियां और निजी निपटान सुविधाओं की कमी बहिष्कार वाली प्रथाओं को बढ़ावा देती रहती हैं। लड़कियों को अक्सर पीरियड्स के दौरान रसोई, मंदिर या सार्वजनिक स्थानों में जाने से रोक दिया जाता है। जब जेंडर, जाति और धर्म तीनों एक साथ असर डालते हैं, तो उनका प्रभाव लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। लगातार काम का दबाव, अपनी इच्छाओं को दबाना और अपनी बात को व्यक्त न कर पाना उन्हें मानसिक रूप से थका देता है। एक किशोरी ने अपनी बात रखते हुए कहा, “हम दिनभर काम करते हैं, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि हम कैसा महसूस करते हैं।” गाँवों में मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करना अभी भी आसान नहीं है। अगर कोई लड़की अपनी परेशानी बताती है, तो उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या यह कहकर टाल दिया जाता है कि सबके साथ ऐसा होता है। धीरे धीरे यह स्थिति उन्हें अकेलापन महसूस कराने लगती है और वे अपनी भावनाओं को अपने अंदर ही दबाकर रखती हैं। जब उनके पास जानकारी और विकल्प कम होते हैं, तो वे उसी दायरे में रह जाती हैं जो समाज ने उनके लिए तय किया होता है। इससे उनके आगे बढ़ने के अवसर सीमित हो जाते हैं और वे अपने सपनों को पूरा नहीं कर पातीं।
कुछ जगहों पर आज भी पिरियड्स के दौरान लड़कियों को अलग रखा जाता है और उन्हें धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जाता है। एक युवा लड़की ने बताया, “उन दिनों में हमें अलग रखा जाता है, और ऐसा लगता है जैसे हम कुछ गलत कर रहे हों।” इन अनुभवों का असर उनके आत्मसम्मान पर पड़ता है और कई बार वे खुद को कमतर महसूस करने लगती हैं।
जागरूकता से सशक्तिकरण की ओर कदम
हालांकि अब धीरे धीरे बदलाव भी देखने को मिल रहा है। आज के दौर में लड़कियां पहले से ज्यादा जागरूक हो रही हैं। मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट 2024 की रिपोर्ट से पता चलता है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में मोबाइल इंटरनेट अपनाने में लैंगिक अंतर तीन सालों में पहली बार कम हुआ है, जो साल 2022 में 19 फीसदी से घटकर साल 2023 में 15 फीसदी हो गया है। मोबाइल इंटरनेट के इस्तेमाल में लैंगिक अंतर का कम होना इस वजह से हुआ है कि महिलाएं इसे पुरुषों की तुलना में तेज़ी से अपना रही हैं। साल 2023 में निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 12 करोड़ महिलाओं ने मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू किया, जबकि पुरुषों की संख्या 7 करोड़ रही। मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से उन्हें नई- नई जानकारियां मिल रही हैं, जिससे उनकी सोच बदल रही है। उत्तराखंड के कई इलाकों में महिलाएं और लड़कियां मिलकर समूह बना रही हैं। इन समूहों में वे अपनी बातें साझा करती हैं और एक दूसरे को समझती हैं।एक समूह की सदस्य ने बताया, “पहले हम अपनी बात कहने से डरते थे, लेकिन अब हम साथ में खड़े रहते हैं और खुलकर बात करते हैं।” इन समूहों से उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा है और वे खुद को अकेला महसूस नहीं करतीं। अब वे केवल घर तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि पढ़ना, काम करना और अपनी पहचान बनाना चाहती हैं।
लेकिन केवल लड़कियों के बदलने से समाज पूरी तरह नहीं बदलेगा। परिवारों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि लड़कियां सिर्फ जिम्मेदारियां निभाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उनके भी अपने सपने होते हैं।स्कूलों और समाज में मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बातचीत होनी चाहिए, ताकि लड़कियां अपनी भावनाओं को समझ सकें और बिना डर उन्हें व्यक्त कर सकें।सरकार को भी ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना चाहिए और जागरूकता बढ़ानी चाहिए। घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ, समाज के नियम और अपनी इच्छाओं को दबाना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। जरूरत है कि हम इन बातों को समझें और बदलाव की दिशा में काम करें।परिवार, समाज और सरकार को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जहां लड़कियां खुलकर अपनी बात कह सकें, अपने फैसले खुद ले सकें और अपने सपनों को पूरा कर सकें। तभी असली बदलाव संभव होगा।

