माता-पिता बनना लोगों के लिए एक खूबसूरत एहसास होता है। यह उनके सामने कई तरह के भावनात्मक बदलाव, नई चुनौतियां और नई ज़िम्मेदारियां लेकर भी आता है। महिलाओं को तो कानूनी तौर पर मैटरनिटी लीव की सुविधा दी गई है। लेकिन, पिताओं के लिए हमेशा पितृत्व अवकाश की व्यवस्था नहीं होती। सरकारी नौकरियों में पुरुषों को 15 दिन का सवैतनिक पितृत्व अवकाश मिलता है। मगर निजी या असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए इसे लेकर हर जगह कोई कानून नहीं है। अलग-अलग संस्थानों के अपने-अपने नियम हैं। कुछ गिने-चुने ऐसे भी हैं जहां कोई तयशुदा नियम नहीं हैं और पुरुष अपनी ज़रूरत के अनुसार ज़्यादा छुट्टियां भी ले सकते हैं।
वहीं कुछ ऐसे भी हैं जहां एक दिन का अवकाश भी नहीं है और पुरुषों को अपने बाकी अवकाशों को ही इस्तेमाल करना पड़ता है। पितृत्व अवकाश में मौजूद इन्हीं असंगतियों के मद्देनज़र मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पिताओं, चाहे वे दत्तक हों या जैविक, के लिए पितृत्व अवकाश को मान्यता देने वाले एक औपचारिक कानून की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। ऐसा विचार अदालत ने एक कॉर्पोरेट वकील हंसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर सुनवाई के दौरान किया। पितृत्व अवकाश क्यों ज़रूरी है इसे लेकर फेमिनिज़म इन इंडिया ने कुछ पिताओं से बात की।
पितृत्व अवकाश के साथ-साथ कार्यस्थलों को ऐसे लोगों के लिए ज़्यादा संवेदनशीलता बरतने की ज़रूरत भी है जो नए-नए पिता बने हैं। आप वीमेन बैक टू वर्क जैसे कितने भी आंदोलन चलाओ, लेकिन अगर आप फादर को सपोर्ट नहीं कर रहे हो तो कहीं-न-कहीं अप्रत्यक्ष रूप से आप मां पर यह बोझ डाल रहे हो कि वह नौकरी छोड़ दे।
बदलते समय की ज़रूरत है पितृत्व अवकाश
इमरान नोएडा में रहते हैं और दो जुड़वां बच्चियों के पिता हैं। वे एक अन्तरराष्ट्रीय संस्थान में काम करते हैं। उन्हें उनके संस्थान की तरफ से 20 दिन का पितृत्व अवकाश मिला था। वे कहते हैं, “पितृत्व अवकाश आज के आधुनिक युग की ज़रूरत है। पहले के समय में संयुक्त परिवार होते थे। पति के घर पर न रहने पर भी दादा-दादी या नाना-नानी, मां और बच्चे दोनों की देखभाल कर लेते थे। आज के समय में एकल परिवार हैं। ऐसे में माँ और बच्चे दोनों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए बच्चे के जन्म के बाद उसके पिता का घर पर होना बहुत ज़रूरी है।” इमरान ने आगे यह भी कहा कि अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों में तो फिर भी पितृत्व अवकाश का प्रावधान है। मगर भारतीय संस्थान लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा काम कराने की कोशिश करते हैं।
अशोका यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 73 प्रतिशत महिलाएं बच्चे के जन्म के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। यह एक बड़ा आंकड़ा है और इससे पता चलता है कि बच्चे के जन्म के बाद कितनी बड़ी संख्या में महिलाएं नौकरियां छोड़ देती हैं। प्रवीण सिंधु भीमा शिंदे महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के एक छोटे से गाँव के निवासी हैं। फिलहाल वे दिल्ली में रहते हैं और बीबीसी मराठी में काम करते हैं। उन्हें एक बेटा है। वे कहते हैं, “अभी पितृत्व अवकाश को लेकर कोई कानून नहीं है। अगर कुछ निजी संस्थान अवकाश दे रहे हैं तो यह उनकी अच्छाई है। अवकाश देने की उन पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। कानून होने पर सबको समान रूप से अवकाश मिल सकेगा।” उन्होंने आगे कहा कि जब बच्चा छह महीने का हो जाता है तो महिला फिर से वापस नौकरी पर लौट सके और इसमें उसका पार्टनर उनका सहयोग कर सके इसमें पितृत्व अवकाश की अहम भूमिका होती है।
जब बच्चा एकदम छोटा होता है तब तो प्राकृतिक रूप से उसके देखभाल की ज़्यादा ज़िम्मेदारी मां पर आ जाती है क्योंकि वह मां के दूध पर निर्भर करता है। लेकिन जैसे ही बच्चा छह महीने का होता है और टॉप फ़ीड पर आ जाता है तब पिता अपनी भूमिका अच्छे से निभा सकते हैं।
कुछ ऐसी ही बात इमरान ने भी कही। उनके शब्दों में, “जब बच्चा एकदम छोटा होता है तब तो प्राकृतिक रूप से उसके देखभाल की ज़्यादा ज़िम्मेदारी मां पर आ जाती है क्योंकि वह मां के दूध पर निर्भर करता है। लेकिन जैसे ही बच्चा छह महीने का होता है और टॉप फ़ीड पर आ जाता है तब पिता अपनी भूमिका अच्छे से निभा सकते हैं। मैं अपनी बात करूं तो जब मेरी बच्चियां छह महीने की हुईं तब उनको मेरी ज़रूरत ज़्यादा थी।” इमरान और प्रवीण दोनों ही पितृत्व अवकाश की वर्तमान व्यवस्था में कुछ लचीलेपन की ज़रूरत पर बल देते हैं। यानी, कुछ अवकाश पिता बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ले सके और कुछ उसके छह महीने के होने पर। इन दोनों ने ही इनके बच्चों के छह महीने के होने के बाद नौकरी पर वापस लौटने में अपनी पत्नियों का सहयोग दिया।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन को कम करने में मददगार
बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी के बाद अवसाद से गुज़रती हैं। वे अत्यधिक चिन्ता, उदासी या थकान का सामना करती हैं। इस स्थिति में उनके पति उनका सहयोग कर सकते हैं। इस पर भिलाई के रहने वाले चंद्रेश कहते हैं, “ऐसे समय में यदि पिता घर के कार्यों में सहयोग करे, बच्चे की देखभाल में भागीदारी निभाए और मां की भावनाओं को समझते हुए उसके साथ उपस्थित रहे, तो मां का मानसिक दबाव काफी कम हो सकता है। जब मां स्वयं भावनात्मक रूप से संतुलित और सुरक्षित महसूस करती है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव सीधे बच्चे के व्यवहार और मानसिक विकास पर पड़ता है।”
इमरान भी डिलीवरी के बाद के समय में महिला के साथ उसके पार्टनर के होने को अहम मानते हैं। वे कहते हैं, “आम तौर पर जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो बच्चे पर तो बहुत-से लोगों का ध्यान होता है, मगर मां को भी उतनी ही परवाह की ज़रूरत होती है। ऐसे में पार्टनर की मौजूदगी उसे भावनात्मक और मानसिक समर्थन दे सकती है। वह बच्चे के छोटे-छोटे कामों में सहयोग कर सकता है जिससे मां को कुछ देर आराम करने को मिल सके।”
आम तौर पर जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो बच्चे पर तो बहुत-से लोगों का ध्यान होता है, मगर मां को भी उतनी ही परवाह की ज़रूरत होती है। ऐसे में पार्टनर की मौजूदगी उसे भावनात्मक और मानसिक समर्थन दे सकती है। वह बच्चे के छोटे-छोटे कामों में सहयोग कर सकता है जिससे मां को कुछ देर आराम करने को मिल सके।
पुरुषों को सिर्फ कमाने वाले से बढ़कर देखने के लिए
हमारा समाज पितृसत्तात्मक है और आम तौर पर पुरुषों को ‘कमाने वाली’ और महिलाओं को ‘केयरटेकिंग’ भूमिकाओं में देखा जाता है। इस बारे में चंद्रेश कहते हैं, “मां और पिता के बीच जितना स्वस्थ और सहयोगपूर्ण भावनात्मक संबंध होता है, बच्चे का व्यक्तित्व उतना ही संतुलित और आत्मविश्वासी बनता है। पितृत्व अवकाश पिता को केवल ‘कमाने वाले’ की भूमिका से बढ़कर एक संवेदनशील, सहभागी और उत्तरदायी अभिभावक बनने का अवसर देता है।” आगे वे कहते हैं कि सालों तक लगातार नौकरी करते रहने से पुरुषों का जीवन एक कठोर दिनचर्या में बंध जाता है, जिसमें परिवार, स्वयं के आत्मचिंतन और रिश्तों को समझने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। पितृत्व अवकाश के दौरान मिला यह लंबा विराम केवल बच्चे की देखभाल का समय नहीं होता, बल्कि जीवन को दोबारा देखने और खुद में बदलाव लाने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी बनता है। इस अनुभव में पुरुषों के भीतर कई नए दृष्टिकोण खुलते हैं। वे परिवार, संबंध, देखभाल, धैर्य और अपनी भावनात्मक जिम्मेदारियों को अधिक गहराई से समझ पाते हैं। कई बार यही ठहराव उन्हें एक बेहतर पिता ही नहीं, बल्कि एक बेहतर मनुष्य भी बनाता है।
एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए
लैंगिक समानता लाने में पितृत्व अवकाश की अहमियत पर प्रवीण कहते हैं, “हमारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने बच्चे की परवरिश का बोझ मां पर डाला है। अगर हमें एक लैंगिक तौर पर समान समाज बनाना है तो पितृत्व अवकाश को वैध बनाना होगा ताकि यह एक संयुक्त ज़िम्मेदारी बन सके।” इसी पर इमरान कहते हैं, “पितृत्व अवकाश के साथ-साथ कार्यस्थलों को ऐसे लोगों के लिए ज़्यादा संवेदनशीलता बरतने की ज़रूरत भी है जो नए-नए पिता बने हैं। आप वीमेन बैक टू वर्क जैसे कितने भी आंदोलन चलाओ, लेकिन अगर आप फादर को सपोर्ट नहीं कर रहे हो तो कहीं-न-कहीं अप्रत्यक्ष रूप से आप मां पर यह बोझ डाल रहे हो कि वह नौकरी छोड़ दे।”
मां और पिता के बीच जितना स्वस्थ और सहयोगपूर्ण भावनात्मक संबंध होता है, बच्चे का व्यक्तित्व उतना ही संतुलित और आत्मविश्वासी बनता है। पितृत्व अवकाश पिता को केवल ‘कमाने वाले’ की भूमिका से बढ़कर एक संवेदनशील, सहभागी और उत्तरदायी अभिभावक बनने का अवसर देता है।
पितृत्व अवकाश एक सामाजिक ज़रूरत होने के साथ-साथ बेहतर समाज के निर्माण और भावी ज़िम्मेदार नागरिक तैयार करने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है। चंद्रेश कहते हैं, “अब तक पिता की भूमिका को अक्सर केवल आर्थिक योगदान तक सीमित करके देखा और स्वीकार किया गया है, जबकि भावनात्मक उपस्थिति, देखभाल और पालन-पोषण में उनकी सक्रिय भागीदारी समाज की अगली पीढ़ी को अधिक स्वस्थ, संवेदनशील और संतुलित बना सकती है। इसलिए पितृत्व अवकाश केवल एक कर्मचारी सुविधा नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता है।”
भविष्य के बेहतर नागरिक बनाने में बच्चे की परवरिश में मां और पिता दोनों के बराबर के योगदान को प्रवीण भी अहम मानते हैं। वे कहते हैं, “वर्तमान समय में काम के घंटों से काफी अतिरिक्त समय ट्रैवल वगैरह में चला जाता है और पिता बच्चे की परवरिश में ठीक से योगदान नहीं दे पाते। ऐसे में अगर बच्चा ज़िम्मेदार नागरिक न बन सके तो फिर इसकी पूरी ज़िम्मेदारी सरकार केवल माता-पिता पर नहीं डाल सकती। इसलिए भी पितृत्व अवकाश जैसे कानून बहुत ज़रूरी हो जाते हैं।”
इस प्रकार, पितृत्व अवकाश को कानूनी मान्यता देना आज के समय की ज़रूरत है। यह माता-पिता के बीच बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी को समान रूप से बांटने में मदद करता है, जिससे महिलाओं पर मानसिक दबाव कम होता है। इससे परिवार में भावनात्मक सहयोग बढ़ता है और माँ के साथ-साथ बच्चे का भी बेहतर विकास संभव होता है। इसके अलावा, पितृत्व अवकाश पुरुषों को केवल “कमाने वाले” की भूमिका से आगे बढ़ाकर एक ज़िम्मेदार और संवेदनशील अभिभावक बनने का अवसर देता है। इसलिए, पितृत्व अवकाश को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना एक स्वस्थ, बराबरी पर आधारित और प्रगतिशील समाज के निर्माण की दिशा में एक ज़रूरी कदम है।

