आजकल हर जगह पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की बात हो रही है। कभी बहुत तेज़ गर्मी पड़ती है, कभी अचानक बारिश हो जाती है, तो कभी पानी की कमी हो जाती है। ये सब अब हमारी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है। पहले जो चीज़ें धीरे-धीरे बदलती थीं, अब वो जल्दी-जल्दी बदल रही हैं.। इसका असर हम सब महसूस कर रहे हैं। लेकिन एक जरूरी सवाल है, जिस पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते, क्या इन सब चीज़ों का असर सब पर बराबर पड़ता है? हालांकि पर्यावरण की मार का सबको सामना करना पड़ता है, लेकिन सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है। इसकी वजह सिर्फ मौसम नहीं है, बल्कि हमारे समाज में बनी जिम्मेदारियां भी हैं, जो ज्यादातर महिलाओं के ऊपर डाल दी जाती हैं।
भारत के टाइम यूज़ सर्वे की साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 से 59 साल की उम्र की महिलाओं में से करीब 41 फीसदी महिलाएं घर के सदस्यों की देखभाल में हिस्सा लेती हैं, जबकि पुरुषों में यह हिस्सा केवल 21.4 फीसदी है। इतना ही नहीं, जो महिलाएं देखभाल का काम करती हैं, वे रोज़ाना औसतन 140 मिनट इसमें लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 74 मिनट इसमें व्यतीत करते हैं। ग्रामीण लड़कियों की जिम्मेदारियां बहुत छोटी उम्र से ही शुरू हो जाती हैं, उनके लिए घर का काम केवल मदद नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे उनकी पहचान का हिस्सा बन जाता है। इसके उलट, लड़कों को इन जिम्मेदारियों से काफी हद तक दूर रखा जाता है। इसी वजह से जब पर्यावरण में बदलाव आता है, जैसे पानी की कमी हो जाती है या गर्मी बहुत बढ़ जाती है, तो इसका असर सीधे महिलाओं पर पड़ता है। क्योंकि उनके दैनिक काम और भी ज़्यादा मुश्किल हो जाते हैं।
पहले पानी पास में मिल जाता था, लेकिन अब गर्मियों में बहुत दूर जाना पड़ता है। सुबह से ही काम शुरू हो जाता है और बहुत थकान हो जाती है। घर के आदमी ये काम नहीं करते, हमें ही करना पड़ता है।पानी की दिक्कत और महिलाओं की ज़िंदगी गांवों में पानी की समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। हैंडपंप सूखते जा रहे हैं, पानी देर से आता है, और कई बार पानी साफ भी नहीं होता।
पितृसत्ता और जल संकट का दोहरा बोझ
हमारे गांव और समाज में आज भी लड़का और लड़की के काम अलग-अलग माने जाते हैं। घर का काम, खाना बनाना, पानी लाना, सफाई करना और बच्चों की देखभाल ये सब काम ज़्यादातर महिलाओं के हिस्से में आते हैं। मुज़फ्फरनगर के पास के एक गांव में रहने वाली 39 वर्षीय कमला देवी, जो एक किसान परिवार से हैं, बताती हैं, “पहले पानी पास में मिल जाता था, लेकिन अब गर्मियों में बहुत दूर जाना पड़ता है। सुबह से ही काम शुरू हो जाता है और बहुत थकान हो जाती है। घर के आदमी ये काम नहीं करते, हमें ही करना पड़ता है। पानी की दिक्कत और महिलाओं की ज़िंदगी गांवों में पानी की समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। हैंडपंप सूखते जा रहे हैं, पानी देर से आता है, और कई बार पानी साफ भी नहीं होता। लेकिन इन सब चीज़ों का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है। अगर पानी समय पर नहीं आता, तो सारा काम रुक जाता है। कई बार पूरा दिन पानी के चक्कर में ही निकल जाता है। बच्चों का भी ध्यान रखना होता है और घर का भी।” संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में जिन ग्रामीण घरों में नल और पानी की सुविधा नहीं है, उनमें से 70 फीसदी से ज्यादा घरों में पानी लाने का काम महिलाएं करती हैं।
इससे महिलाओं का समय और ताकत दोनों लगती है, लेकिन उनकी इस मेहनत को अक्सर कोई खास महत्व नहीं दिया जाता। यह काम जरूरी तो माना जाता है, लेकिन इसे ‘काम’ की तरह नहीं देखा जाता।गर्मी और सेहत पर असरआ जकल गर्मी पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गई है। हीटवेव के समय तो हाल और भी खराब हो जाता है। ऐसे में घर के अंदर रसोई में काम करना बहुत मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब बिजली की दिक्कत हो। बागेश्वर के एक सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाली 19 वर्षीय पूजा, जो बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं, वह बताती हैं, “गर्मी में कॉलेज जाना ही मुश्किल हो जाता है। रास्ते में भी बहुत दिक्कत होती है। घर आकर काम भी करना पड़ता है। कई बार चक्कर आते हैं, लेकिन आराम नहीं कर पाते।” इससे साफ पता चलता है कि पर्यावरण की समस्या सिर्फ बाहर काम करने वालों को ही नहीं, बल्कि घर के अंदर काम करने वाली महिलाओं और लड़कियों को भी प्रभावित करती है।
“गर्मी में कॉलेज जाना ही मुश्किल हो जाता है। रास्ते में भी बहुत दिक्कत होती है। घर आकर काम भी करना पड़ता है। कई बार चक्कर आते हैं, लेकिन आराम नहीं कर पाते।
महिलाओं का अदृश्य श्रम और पर्यावरण
महिलाओं का बहुत सारा काम ऐसा होता है जो बाहर से दिखाई नहीं देता। जब पानी की कमी होती है या गर्मी बढ़ती है, तो ये अदृश्य काम और बढ़ जाता है। महिलाओं को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उनके काम को उतनी पहचान नहीं मिलती। गांव में कई महिलाएं सुबह से रात तक काम करती हैं, लेकिन उनकी थकान और परेशानी को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही वजह है कि उनकी सेहत भी धीरे-धीरे खराब होने लगती है।अगर हम ध्यान से देखें, तो महिलाएं ही रोज़ सस्टेनिबिलिटी को अपने जीवन में अपनाती हैं। वो पानी बचाने की कोशिश करती हैं, खाना बर्बाद नहीं करतीं और चीज़ों का बार-बार इस्तेमाल करती हैं।ये छोटे-छोटे काम मिलकर पर्यावरण को बचाने में मदद करते हैं। लेकिन अक्सर इन कामों को ‘साधारण’ समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
असल में यही काम सस्टेनिबिलिटी की नींव हैं और इसमें महिलाओं की भूमिका बहुत बड़ी है। बागेश्वर रहने वाली 30 वर्षीय रजनी, जो एक स्थानीय महिला समूह के साथ काम करती हैं, गांवों में जाकर महिलाओं को जागरूक करने का काम कर रही हैं,वो बताती हैं, “हम लोगों को बताते हैं कि पानी कैसे बचाना है, कचरा अलग कैसे करना है और साफ-सफाई का ध्यान कैसे रखना है। अब धीरे-धीरे महिलाएं इन बातों को समझने लगी हैं।”
हम लोगों को बताते हैं कि पानी कैसे बचाना है, कचरा अलग कैसे करना है और साफ-सफाई का ध्यान कैसे रखना है। अब धीरे-धीरे महिलाएं इन बातों को समझने लगी हैं।
ऐसे छोटे-छोटे प्रयास धीरे-धीरे बड़े बदलाव ला सकते हैं।अगर हमें इस समस्या को कम करना है, तो हमें अपनी सोच और व्यवस्था दोनों में बदलाव लाना होगा, घर के कामों को बराबर बांटना होगा। महिलाओं को फैसले लेने में शामिल करना होगा,गाँवों में पानी और बिजली की सुविधा बढ़ानी होगी,महिलाओं की सेहत पर ध्यान देना होगा,पर्यावरण के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी ,जब तक हम इन चीज़ों पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। हालांकि घरेलू जिम्मेदारियां जरूरी हैं, लेकिन उनका पूरा बोझ सिर्फ महिलाओं पर डालना सही नहीं है। हमें इस अदृश्य बोझ को समझना होगा और मिलकर इसे कम करने की कोशिश करनी होगी। तभी महिलाएं मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और खुश रह पाएंगी, और समाज भी सही दिशा में आगे बढ़ पाएगा।जलवायु संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी सवाल है और जब तक महिलाओं के अदृश्य श्रम को पहचान नहीं मिलेगी, तब तक कोई भी समाधान अधूरा रहेगा।

