इंटरसेक्शनलशरीर स्त्री का शरीर: जाति, पितृसत्ता और नियंत्रण की अदृश्य राजनीति

स्त्री का शरीर: जाति, पितृसत्ता और नियंत्रण की अदृश्य राजनीति

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता केवल पुरुषों के वर्चस्व की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह जाति और जेंडर के मेल से बनी एक जटिल सत्ता संरचना है। दलित नारीवादी चिंतकों उर्मिला पवार और शर्मिला रेगे ने अपनी पुस्तक ‘राइटिंग कास्ट राइटिंग जेन्डर’ में बताया है कि भारतीय समाज में पितृसत्ता को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

भारतीय समाज में स्त्री का शरीर सिर्फ़ एक जैविक अस्तित्व नहीं है। यह वह जगह है जहां समाज, जाति और पितृसत्ता अपने नियम सबसे ज़्यादा लागू करते हैं। महिला क्या पहने, किससे प्रेम करे, कब और किससे विवाह करे इन सभी बातों पर समाज की निगरानी रहती है। खासकर जाति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्त्री के शरीर पर सख्त नियंत्रण रखा गया है। ‘इज़्ज़त’, ‘परंपरा’ और ‘मर्यादा’ जैसे शब्दों के माध्यम से इस नियंत्रण को सही और स्वाभाविक बताया जाता है। इसी वजह से स्त्री का शरीर उसका अपना न रहकर समाज की सत्ता का माध्यम बन जाता है। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता केवल पुरुषों के वर्चस्व की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह जाति और जेंडर के मेल से बनी एक जटिल सत्ता संरचना है। दलित नारीवादी चिंतकों उर्मिला पवार और शर्मिला रेगे ने अपनी पुस्तक ‘राइटिंग कास्ट राइटिंग जेन्डर’ में बताया है कि भारतीय समाज में पितृसत्ता को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

उनके अनुसार स्त्री का शरीर वह माध्यम है, जिसके ज़रिए जाति की सीमाओं को नियंत्रित किया जाता है। इस व्यवस्था में विवाह केवल निजी संबंध नहीं, बल्कि जाति को आगे बढ़ाने का एक साधन है। स्त्री के शरीर और उसके रिश्तों से जुड़े फैसलों पर समाज नियंत्रण रखता है। पीरियड्स, यौन शुद्धता, विवाह और विधवापन जैसी अवस्थाएं स्त्री को नियंत्रित करने के सामाजिक तरीके बन गए हैं। नारीवादी इतिहासकार गेराल्डीन फोर्ब्स ने अपनी किताब ‘वुमन इन मॉडर्न इंडिया’ में लिखा है कि ब्रिटिश काल और उससे पहले भी स्त्री की यौनिकता को सामाजिक नैतिकता के नाम पर नियंत्रित किया जाता था। यह नियंत्रण केवल नैतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी था, क्योंकि इससे जाति व्यवस्था को बनाए रखने में मदद मिलती थी। स्त्री का अपनी पसंद से प्रेम या विवाह करना, या मातृत्व से जुड़े फैसले लेना, समाज के नियमों के खिलाफ माना जाता था। अंतरजातीय विवाह को विशेष रूप से खतरे के रूप में देखा गया, क्योंकि इससे जाति की सीमाएं टूट सकती थीं।

नारीवादी इतिहासकार गेराल्डीन फोर्ब्स ने अपनी किताब ‘वुमन इन मॉडर्न इंडिया’ में लिखा है कि ब्रिटिश काल और उससे पहले भी स्त्री की यौनिकता को सामाजिक नैतिकता के नाम पर नियंत्रित किया जाता था। यह नियंत्रण केवल नैतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी था, क्योंकि इससे जाति व्यवस्था को बनाए रखने में मदद मिलती थी।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता केवल हिंसा के ज़रिए ही नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति के माध्यम से भी अपना नियंत्रण स्थापित करती है। ‘इज़्ज़त’, ‘संस्कार’ और ‘परंपरा’ जैसे शब्द स्त्री के शरीर पर नियंत्रण को नैतिक रूप देते हैं। अगर कोई स्त्री अपने जीवन या शरीर के बारे में खुद निर्णय लेना चाहती है, तो उसे अक्सर असंस्कारी या परिवार तोड़ने वाली कहा जाता है। इस तरह सामाजिक शर्म और डर का उपयोग करके स्त्री को नियंत्रित किया जाता है। नारीवादी विद्वानों कुमकुम सांगरी और सुधा राघवन ने भी अपने शोध में दिखाया है कि धार्मिक ग्रंथों, सामाजिक परंपराओं और कानूनों के माध्यम से स्त्री के शरीर को नियंत्रित किया गया है। यह नियंत्रण केवल घर तक सीमित नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी मौजूद है। चाहे वह विवाह से जुड़े कानून हों, प्रजनन के अधिकार हों या यौन हिंसा से जुड़े न्याय के ढाँचे, अक्सर कानून भी स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि परिवार और समाज के दायरे में ही देखता है।

दलित और बहुजन महिलाओं का दोहरा दमन

भारतीय जाति व्यवस्था में सभी महिलाओं का अनुभव एक जैसा नहीं होता। समाज में जाति और पितृसत्ता दोनों मिलकर महिलाओं के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन दलित और बहुजन स्त्रियों के लिए यह दमन अधिक गहरा और खतरनाक होता है। नारीवादी विद्वान शर्मिला रेगे के अनुसार, दलित महिलाएं जाति और जेंडर दोनों कारणों से विशेष रूप से दमन और हिंसा का सामना करती हैं। उनका शरीर केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न का विषय नहीं होता, बल्कि वह जातिगत असमानता का सार्वजनिक प्रदर्शन बन जाता है।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता में स्त्री का शरीर जाति की सीमाओं को बनाए रखने का माध्यम बन जाता है। उसकी यौनिकता, प्रजनन और स्वतंत्रता पर नियंत्रण रखकर ही जाति व्यवस्था को बनाए रखा जाता है।

दलित स्त्रियों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा और सामाजिक अपमान की घटनाएं सिर्फ व्यक्तिगत अपराध नहीं होतीं, बल्कि पूरे समुदाय को डराने का एक तरीका होती हैं। इनके ज़रिए यह संदेश दिया जाता है कि किसे कितनी आज़ादी मिल सकती है और किसे अपनी इच्छा से जीने का अधिकार नहीं है। इस तरह दलित और बहुजन स्त्रियों पर होने वाला दोहरा दमन उनकी पहचान, शरीर और अधिकारों को लगातार चुनौती देता है। इसे समझना जरूरी है, ताकि हम महिला हिंसा को केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक घटना न मानें, बल्कि सामाजिक और संरचनात्मक असमानता का हिस्सा समझें।

सत्ता के दायरे में स्त्री का शरीर

‘किसका शरीर, किसके नियम’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और राजनीतिक सवाल है। यह उस व्यवस्था को चुनौती देता है, जिसमें स्त्री के शरीर पर फैसला लेने का अधिकार अक्सर उसके अपने पास नहीं होता। पिता, पति, परिवार, समाज, धर्म या राज्य, ये सभी किसी न किसी रूप में उस पर नियंत्रण रखते हैं। इसका मतलब है कि स्त्री को अपने शरीर और जीवन से जुड़े फैसलों में पूरी आज़ादी नहीं मिल पाती। नारीवादी लेखिका सिमोन द बोउवार ने अपनी किताब द सेकंड सेक्स में लिखा था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे समाज बनाता है। भारतीय समाज में यह प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है क्योंकि यहां जाति और जेंडर दोनों मिलकर स्त्री की पहचान तय करते हैं। समाज तय करता है कि स्त्री क्या पहने, किससे दोस्ती या प्रेम करे और कब विवाह करे। उसके शरीर को केवल उसका निजी अधिकार नहीं माना जाता, बल्कि उसे समाज और जाति के नियमों से जोड़ा जाता है।

स्त्री का शरीर और अधिकार की लड़ाई

इस व्यवस्था में स्त्री के अधिकार केवल कानूनी मुद्दा नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सवाल भी हैं। जब तक समाज और कानून स्त्री के अपने शरीर पर उसके अधिकार को पूरी तरह स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक जातिगत और लैंगिक समानता केवल एक आदर्श ही रहेगी। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता में स्त्री का शरीर जाति की सीमाओं को बनाए रखने का माध्यम बन जाता है। उसकी यौनिकता, प्रजनन और स्वतंत्रता पर नियंत्रण रखकर ही जाति व्यवस्था को बनाए रखा जाता है। सम्मान और परंपरा जैसी भाषा इस नियंत्रण को सही ठहराती है, जबकि हिंसा और सामाजिक बहिष्कार इसे लागू करते हैं। इसलिए स्त्री की मुक्ति केवल व्यक्तिगत आज़ादी का सवाल नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और जातिगत भेदभाव के खत्म होने से भी जुड़ा मुद्दा है। किसका शरीर, किसके नियम; इस सवाल का जवाब तभी बदलेगा, जब समाज यह स्वीकार करेगा कि स्त्री का शरीर उसका अपना है और उसके जीवन के फैसले लेने का अधिकार भी उसी के पास होना चाहिए।

About the author(s)

मैं एक फ्रीलांस हिन्दी राइटर हूं। मेरे लेखन सफर की शुरुआत आकाशवाणी से हुई, जहाँ मैंने पाँच वर्षों तक कैजुअल अनाउंसर के रूप में अपनी आवाज़ और अभिव्यक्ति को निखारा। इसके बाद मैंने दैनिक भास्कर और ईटीवी न्यूज़ चैनल में काम करते हुए पत्रकारिता और मीडिया की बारीकियों को करीब से समझा। अब तक मैं कई शानदार शॉर्ट फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिख चूकी हूं और रचनात्मक लेखन की नई दिशाओं को तलाश रही हूँ। मैं महिलाओं से जुड़े मुद्दों, उनकी चुनौतियों और सशक्तिकरण पर बेहतरीन लेख लिखना पसंद करती हूँ। जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव ने मुझे और मजबूत बनाया है। मैं हमेशा सीखने की चाह रखती हूँ और अपने शब्दों को अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। ट्रैवल मेरी पसंद है जहां से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती है।

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