समाजकैंपस जाति, वर्ग और जेंडर के आधार पर शैक्षिक संस्थानों में होता सॉफ्ट बुलिंग

जाति, वर्ग और जेंडर के आधार पर शैक्षिक संस्थानों में होता सॉफ्ट बुलिंग

साइंस डायरेक्ट पर प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सॉफ्ट बुलिंग को समझने के लिए समूह की शक्ति संरचना को समझना जरूरी है। हर समूह में कुछ ऐसे सदस्य होते हैं, जिनके पास अधिक प्रभाव होता है। यह प्रभाव उनकी योग्यता से नहीं, बल्कि उनकी लोकप्रियता, सामाजिक नेटवर्क या शिक्षकों से निकटता के कारण होता है।

शैक्षणिक संस्थानों में समूह परियोजनाएं केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होतीं। इनका उद्देश्य विद्यार्थियों में सहयोग, संवाद और नेतृत्व की क्षमता विकसित करना होता है। सिद्धांत रूप में, ये गतिविधियां अलग-अलग दृष्टिकोणों का सम्मान करना और साझा जिम्मेदारी निभाना सिखाती हैं। लेकिन वास्तविकता में, कई बार ये समूह समाज में मौजूद असमानताओं का ही प्रतिबिंब बन जाते हैं। समूह के भीतर भी वही भेदभाव और सत्ता संबंध दिखने लगते हैं, जो व्यापक समाज में मौजूद हैं। आज के समय में समूह परियोजनाओं के भीतर ‘सॉफ्ट बुलिंग’ एक गंभीर समस्या बनकर सामने आई है। यह पारंपरिक रैगिंग या खुले उत्पीड़न से अलग होती है। यह इतनी सूक्ष्म और अदृश्य होती है कि कई बार शिक्षक और अन्य लोग भी इसे पहचान नहीं पाते।

इसमें किसी विद्यार्थी का सीधे अपमान नहीं किया जाता, बल्कि उसे जानबूझकर अनदेखा किया जाता है। उसके विचारों को महत्व नहीं दिया जाता या उसे समूह से अलग-थलग महसूस कराया जाता है। अक्सर इस तरह के व्यवहार को ‘आपसी मनमुटाव’ कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं होता। इसके पीछे जेंडर, जाति और वर्ग से जुड़े पूर्वाग्रह काम करते हैं। इस तरह की अदृश्य मानसिक हिंसा विद्यार्थियों के आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है। इसका उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

सॉफ्ट बुलिंग का एक प्रमुख रूप लैंगिक भेदभाव के रूप में सामने आता है। रिसर्च गेट पर प्रकाशित एक शोध के अनुसार, महिला विद्यार्थियों के विचारों को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता। समस्या केवल यह नहीं है कि उन्हें बोलने का मौका कम मिलता है, बल्कि यह भी है कि बोलने पर उनके सुझावों को कम महत्व दिया जाता है।

सॉफ्ट बुलिंग का एक प्रमुख रूप लैंगिक भेदभाव के रूप में सामने आता है। रिसर्च गेट पर प्रकाशित एक शोध के अनुसार, महिला विद्यार्थियों के विचारों को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता। समस्या केवल यह नहीं है कि उन्हें बोलने का मौका कम मिलता है, बल्कि यह भी है कि बोलने पर उनके सुझावों को कम महत्व दिया जाता है। उनके विचारों को कमतर आंकना सॉफ्ट बुलिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन की नित्या (नाम बदला हुआ) बताती हैं, “महिला विद्यार्थियों को अक्सर केवल ‘डॉक्यूमेंटेशन’, ‘संचार’ या ‘प्रेजेंटेशन डिजाइन’ जैसे काम दिए जाते हैं। हमें तकनीकी या निर्णय लेने वाले कामों से दूर रखा जाता है। यह मान लिया जाता है कि तकनीकी क्षमता पुरुषों में अधिक होती है, खासकर STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) विषयों में।” इस तरह का व्यवहार लैंगिक पूर्वाग्रह को मजबूत करता है। जाति से जुड़ा भेदभाव भी समूह के भीतर एक बड़ी समस्या है।

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन और रिसर्च गेट के शोध बताते हैं कि कई बार सवर्ण वर्चस्व वाले समूहों में सूक्ष्म भेदभाव दिखाई देता है। किसी विद्यार्थी की भाषा, जाति, धर्म या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसकी क्षमता को कम आंका जाता है। हाशिए के समुदायों से आने वाले विद्यार्थियों को अक्सर महत्वपूर्ण फैसलों से दूर रखा जाता है या उन्हें कम जिम्मेदारी दी जाती है। इससे उनमें अलगाव और बहिष्कार की भावना पैदा होती है। लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन की छात्रा नादिया (नाम बदला हुआ) बताती हैं, “नई दिल्ली में मुझे अपनी धार्मिक पहचान के कारण कई बार भेदभाव का सामना करना पड़ा। मुझे समूह में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया और कई बार अलग-थलग महसूस कराया गया।” वर्ग आधारित भेदभाव भी इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू है। उच्च-मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों के पास बेहतर संसाधन, अंग्रेजी भाषा पर पकड़ और अधिक आत्मविश्वास होता है। इससे वे समूह में केंद्र में आ जाते हैं।

ग्रामीण पृष्ठभूमि और बाहरी दुनिया के सीमित अनुभव के कारण मुझे कॉलेज में संवाद करने में काफी कठिनाई हुई। हिंदी और अंग्रेजी में आत्मविश्वास की कमी और क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव के कारण मैं समूह में सहज महसूस नहीं कर पाईं। इस वजह से मुझे ‘सॉफ्ट बुलिंग’ और अकेलेपन का सामना करना पड़ा।

वहीं, ग्रामीण या आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी भाषा और संसाधनों की कमी के कारण असहज महसूस करते हैं। उन्हें अक्सर कम महत्व दिया जाता है। बाहरी शहरों से आने वाले विद्यार्थियों को भी अकेले रहना और नए माहौल में ढलना पड़ता है, जिससे उनकी स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। इस तरह, समूह परियोजनाएं जो सहयोग और समानता सिखाने के लिए बनाई गई हैं, कई बार असमानता और बहिष्कार का अनुभव बन जाती हैं। इसे पहचानना और संबोधित करना जरूरी है, ताकि शैक्षणिक संस्थान वास्तव में सुरक्षित और समावेशी स्थान बन सकें। लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन की राधिका, बताती हैं, “ग्रामीण पृष्ठभूमि और बाहरी दुनिया के सीमित अनुभव के कारण मुझे कॉलेज में संवाद करने में काफी कठिनाई हुई। हिंदी और अंग्रेजी में आत्मविश्वास की कमी और क्षेत्रीय भाषा के प्रभाव के कारण मैं समूह में सहज महसूस नहीं कर पाईं। इस वजह से मुझे ‘सॉफ्ट बुलिंग’ और अकेलेपन का सामना करना पड़ा। मैं अक्सर खुद को समूह का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बाहरी व्यक्ति महसूस करती थीं।”

शक्ति का असंतुलन और समूह की राजनीति

साइंस डायरेक्ट पर प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सॉफ्ट बुलिंग को समझने के लिए समूह की शक्ति संरचना को समझना जरूरी है। हर समूह में कुछ ऐसे सदस्य होते हैं, जिनके पास अधिक प्रभाव होता है। यह प्रभाव उनकी योग्यता से नहीं, बल्कि उनकी लोकप्रियता, सामाजिक नेटवर्क या शिक्षकों से निकटता के कारण होता है। जब निर्णय लेने की शक्ति कुछ लोगों तक सीमित हो जाती है, तो बाकी सदस्यों की राय को नजरअंदाज करना आसान हो जाता है। कई बार जिन छात्रों के पास कथित तौर पर सामाजिक रूप से कम शक्ति होती है, उन पर ही गलतियों का दोष डाल दिया जाता है। विभाग के अंदर बनी मित्र मंडलियां भी समूह के काम को प्रभावित करती हैं।

अनन्या (नाम बदला हुआ) का मानना है कि यह व्यवस्था अनुचित है, क्योंकि अंक विद्यार्थियों के वास्तविक योगदान के आधार पर मिलने चाहिए। यह मतभेद दिखाता है कि वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली में सुधार की जरूरत है।

अगर समूह के सदस्य पहले से दोस्त हैं, तो नए सदस्य को खुद को अलग और असहज महसूस होता है। महत्वपूर्ण फैसले पहले ही ले लिए जाते हैं और नए सदस्य को छोटे या कम महत्वपूर्ण काम दिए जाते हैं। अंतर्मुखी विद्यार्थियों के लिए अपनी बात रखना और भी कठिन हो जाता है। कई बार दोस्तों की गलतियों को नजरअंदाज किया जाता है, जबकि अन्य विद्यार्थियों की छोटी गलतियों को भी गंभीर माना जाता है। कुछ मामलों में शिक्षक भी अनजाने में कुछ विद्यार्थियों को ज्यादा महत्व देते हैं, जिससे यह असमानता और मजबूत हो जाती है।

अकादमिक मूल्यांकन प्रणाली की कमियां

समूह परियोजनाओं की मूल्यांकन प्रणाली में भी कई खामियां हैं। अक्सर पूरे समूह को एक ही ग्रेड दिया जाता है, जिससे मेहनत करने वाले और काम न करने वाले विद्यार्थियों के बीच का अंतर खत्म हो जाता है। जिन विद्यार्थियों ने अधिक योगदान दिया होता है, उन्हें अपने काम को साबित करने का अवसर नहीं मिलता। कई विभागों में व्यक्तिगत योगदान को दर्ज करने या सहकर्मी मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं होती। इसका परिणाम यह होता है कि जो विद्यार्थी ज्यादा प्रभावशाली होते हैं, वे रिपोर्ट तैयार करते हैं और अपने अनुसार पूरी प्रक्रिया को प्रस्तुत करते हैं। इस विषय पर मेघा (नाम बदला हुआ) बताती हैं कि उन्हें इस बात से परेशानी नहीं है कि सभी को समान अंक मिलते हैं, जब तक उनके अंक प्रभावित न हों। वहीं, अनन्या (नाम बदला हुआ) का मानना है कि यह व्यवस्था अनुचित है, क्योंकि अंक विद्यार्थियों के वास्तविक योगदान के आधार पर मिलने चाहिए। यह मतभेद दिखाता है कि वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली में सुधार की जरूरत है।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव और अदृश्य हिंसा

सॉफ्ट बुलिंग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह दिखाई नहीं देती और इसे साबित करना मुश्किल होता है। इससे प्रभावित विद्यार्थी सामाजिक अस्वीकृति और अकादमिक दबाव दोनों का सामना करते हैं। कई बार विद्यार्थी इस व्यवहार को सामान्य मान लेते हैं और खुद को ही दोष देने लगते हैं। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के शोध के अनुसार, इस तरह का आत्म-दोष छात्रों के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। इस समस्या का समाधान केवल नियम बनाने से संभव नहीं है। इसके लिए संवेदनशीलता और संवाद जरूरी है। शैक्षणिक संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समूह परियोजनाएं केवल अंक पाने का माध्यम न बनें, बल्कि सहयोग और सम्मान को भी बढ़ावा दें। शिक्षकों और प्रशासन को सॉफ्ट बुलिंग के संकेतों को पहचानना चाहिए और समय पर हस्तक्षेप करना चाहिए। एक स्वस्थ और समावेशी परिसर वही है, जहां हर विद्यार्थी सुरक्षित महसूस करे और उसकी पहचान और गरिमा का सम्मान किया जाए। 

About the author(s)

मेरा नाम कोपल पोरवाल है। मैं लेडी श्रीराम कॉलेज फ़ॉर वीमेन में बी.ए. (ऑनर्स) जर्नलिज़्म की द्वितीय वर्ष की छात्रा हूँ। हिंदी लेखन और Canva डिज़ाइन मेरी प्रमुख रुचियाँ हैं। मेरे लिए नारीवाद समानता के साथ-साथ समावेशिता और न्याय का सिद्धांत है। लिखने के माध्यम से मैं स्वयं को और समाज को एक नया दृष्टिकोण दिखाना चाहती हूँ।

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