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हमारे समाज के व्याकरण में शर्म का पर्यायवाची महिला से जोड़ा जाता है| शर्मीली महिला, यानी कि सभ्य महिला जो कभी अपनी बात न रखे| अपने से जुड़े हर मुद्दे पर चुप्पी साधे और हर रस्म-परंपरा के सामने बिना कुछ सोचे-समझे घुटने टेकते हुए पितृसत्ता को सलाम करे| पर माफ़ करियेगा मैं अपनी बातों को ब्लीच नहीं करती। बदलते वक्त ने मुझे अपने या यों कहें कि महिलाओं के संदर्भ में इतना निडर बनाया कि अब मैं अपने मासिक धर्म से लेकर मासिक धर्म में जबरदस्ती सम्भोग की बात करने में सक्षम हूँ। पर मैं हमेशा से ऐसी नहीं थी| क्योंकि मेरी माँ साहेब ऐसा नहीं करती थी। कब कागा उनको आकर छू जाता मुझे बचपन में ढूँढने पर भी यह राज़ पता ही नहीं चला। अब कागा कब आया इसका ध्यान रखते-रखते मैं बड़ी और मेरी माँ बूढी हो गयी।

मासिक धर्म के उन महीनो में पहले मेरी माँ को घर के कोने में बिठाया जाता फिर मेरी बड़ी बहिन को और मेरे चाचा जी की बेटी को और छुट्टियों में जब बुआ आये तो उसको भी। लेकिन मुझे वो कागा नहीं मिला जो सबको एक साथ छू जाता।
मैं ख्वाबों की दुनिया में बड़ी हुई थी| पर एक दिन स्कूल में मेरी स्कर्ट पर किसी ने अचानक कुछ दाग देखा। हमारे स्कूल की नन्स देखते ही मुझे सिक रूम में ले गयी जहाँ मैं अक्सर गणित न पढ़ना पड़े इसलिए बीमारी का बहाना बना चली जाती थी।

उस दिन मुझे पता चला मुझे भी कागा छू गया और इसके साथ ही, शुरू हो गया नसीहतों का सिलसिला –

‘लड़कों से दूर रहना।‘
‘उधर बैठो।‘
‘आचार की बरनी को हाथ मत लगाना।‘
‘मंदिर में गलती से मत जाना।‘
‘इधर बैठकर चटाई पर खाना खाओ।‘

मुझ जैसी चिरैया को समझ नहीं आया कि कैसे अचानक ही मैं स्वतंत्र रूप से उड़ते-उड़ते एक प्रथाओं के पिंजरे में कैद हो गयी। उन दिनों ऐसा लगता जैसे दादी के कुँए से दूर उसमें रहने वाले कछुए को भी पता चल गया कि मैं बड़ी हो गयी थी।
क्राइस्ट से दूर, स्कूल से छुट्टियां, फिर गुरुद्वारा मंदिर मस्जिद दूर ये सब कब मेरे ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया पता ही नहीं चला। पिता के स्नेह से दूर। दादी ज़रा सा देख लेती पिता से सवाल-जवाब करते तो बस डाँट देती ‘जाओ बड़ी हो गयी हो पिताजी के सामने नहीं आते बचपन खत्म। लड़कियां ज्यादा नहीं बोलती। लड़कियां ये नहीं करती लड़कियां वो नहीं करती।‘ जैसे लड़कियों के लिए एक अलग सी फेहरिस्त बनी हुई थी।

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जब मेरी बड़ी बहिन को मासिक धर्म हुआ तो वो करीब पन्द्रह साल की थी। और मैं दस साल की। बिस्तर की चादर पर जब खून के दाग देखे और बहिन को छटपटाते देखा तो दौड़कर माँ के पास गयी और कहा – ‘माँ जीजी को चोट लगी है। ज़रा दवा दे दो वो रो रही है और चादर पर खून है।‘ माँ तो बस कमरे की तरफ चल दी तेज गति से। दादी ने मेरा मुँह पीछे से आकर भींच दिया और बोली ‘चल बाहर जाकर खेल’ और मैं दालान में जाकर चुपचाप बैठ गयी| बस सोचती रही कि जीजी को चोट कैसे लगी..? फिर थोड़ी देर बाद देखा तो जीजी को कमरे के एक कोने में उनके बैठने-सोने के लिए एक पुरानी गद्दी दे दी गयी थी। जीजी वहीँ नीचे सोती नीचे ही खाती और पीतल की एक थाली में भोजन परोसा जाता।
यह सब देखकर मैं उदास थी। पर उस वक़्त मेरे लिए कुछ भी जान पाना नामुमकिन-सा था। माँ के साथ भी तो हर महीने ऐसा होता था। चाचियों और बुआ के साथ भी दादी ऐसा ही करती थी।

किसी ने इसपर कोई बात नहीं की पर एकदिन माँ बोली कि ‘तुम्हें याद है जैसे मुझे कागा छू गया था। वैसे ही तुम्हारी बहिन को भी छू गया।‘ इसके बाद से जीजी से मैंने ढ़ेरों सवाल करने शुरू कर दिए –

‘ये आदमियों को क्यों नहीं होता? दादी बताओ?’
‘ये कब बन्द होगा?’
‘ऐसा क्यों होता है?’
‘भाई को क्यों नहीं होता?’

इन सब सवालों के जवाब तलाशते-तलाशते कब शादी हो गयीकब बेटी हो गयी समय जैसे करवट ले सोता उठता रहा मेरे संग।

‘मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी कभी उन भ्रांतियों में फंसे जिनमें मैंने अपना बचपन गुजारा है|’

मेरी आठ साल की बेटी टेक्नोलॉजी से अच्छी तरह परिचित है| उसके पास किसी भी विषय की जानकारी के लिए गूगल मौजूद है, जिसका इस्तेमाल करना वो बखूबी जानती है| एकदिन वह बोली – ‘माँ मैंने की मेन्सट्रोपीडिया कॉमिक ऑनलाइन आर्डर कर दी है।‘

उसकी इस बेबाकी ने मुझे एक झटके में मेरा वो बचपन याद दिला दिया जब मुझे उस कागा का असली नाम तक नहीं मालूम था| कागा के नाम पर माँ साहेब से लेकर जीजी तक हमेशा चुप रहीं| किसी ने कभी इसपर कोई बात नहीं की, नतीजतन बचपन में मैं कागा के असली नाम पीरियड, मासिक धर्म या मेन्सट्रूएशन को कभी जान नहीं पायी| पर मैंने कभी-भी अपनी बेटी को इन सभी ज़रूरी बातों से दूर नहीं रखा, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि जिस तरह मैंने अपने बचपन को इन सभी बातों के तथ्य जानने में गुजारी और कई तरह के भ्रम में भी रही वैसे मेरी बेटी कभी रहे|

अब कागा नहीं पीरियड् आएगा 

हमारे समाज में मासिक धर्म पर बात नहीं की जाती है, जिससे लड़कियां अपने तन के भूगोल से जुड़े तमाम तथ्यों को लेकर कई तरह की भ्रांतियों में जीने लगती है| इसके तहत उन्हें काफी समय तक मासिक धर्म के नाम तक की जानकारी नहीं होती और वो मेरी तरह उसे ‘कागा’ या किसी और नाम से पुकारने लगती है| ऐसे में, मासिक धर्म से जुड़ी बातें जानना तो दूर की बात है| पर अब समय बदल रहा है| जमाना अब कागा का नहीं पीरियड्स का है और कुछ हद तक लड़कियां भी इसके साथ कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ रही है| लेकिन दूसरी वास्तविकता यह भी है कि आज भी बहुत सारी लड़कियां मेरी तरह मासिक धर्म को लेकर कई तरह की भ्रांतियों में फंसकर अपना बचपन गुजार रहीं है| ऐसे में यह भी ज़रूरी है कि समाज और जमाना मिलकर उन लड़कियों तक भी अपनी पहुंच बढायें जिससे वे भी जमाने के साथ कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ सकें|

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Featured Image Credit: Menstrual Hygiene Day

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