समाजख़बर निजी संपत्ति संचयन और भारतीय परिवारों में स्त्री की स्वतंत्रता और चयन की स्थिति

निजी संपत्ति संचयन और भारतीय परिवारों में स्त्री की स्वतंत्रता और चयन की स्थिति

अंशुमान सिंह के माता-पिता का इंटरव्यू देखकर जिस तरह से लोग स्मृति पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं  वे उनके पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है वहां किसी ने उनका का पक्ष जानने की कोशिश भी नहीं की। शहीद के पिता इंटरव्यू में कहते हैं कि "मैं तो अपने छोटे बेटे यानी कि स्मृति के देवर के साथ बहू की शादी करने को तैयार था लेकिन वह चली गयी।

शहीद अंशुमान की पत्नी के हवाले से भारतीय परिवारों में स्त्री की स्वतंत्रता पर परिवार समाज की द्वेषीय स्थिति को समझा जा सकता है। पूंजी और पितृसत्ता हमेशा सगे होते हैं। दोनों एक-दूसरे का संरक्षण करते हैं। दो साल पहले एक फ़िल्म आयी थी “पगलैट”। इस फिल्म फ़िल्म की नायिका संध्या अंग्रेजी में एम.ए. टॉपर है लेकिन वो नेट जेआरएफ न करके शादी कर लेती है। उसकी शादी के पाँच महीने बाद ही उसके पति की मौत हो जाती है। लड़की बीमा के पचास हजार रुपये छोड़कर आत्मनिर्भर बनने के लिए घर से जली जाती है। इस तरह पगलैट लड़की को फ़िल्म में समझदार दिखाया गया है। लोग इस फ़िल्म में लड़की के इस कदम की खूब सराहना करते हैं क्योंकि भारतीय समाज सदियों से स्त्री की हिस्सेदारी को स्वीकार नहीं करना चाहता है। वह चाहता है स्त्री न पिता की संपत्ति में हिस्सा ले न पति की। स्त्री हर जगह बस त्याग करती रहे और पितृसत्ता के उपभोग की वस्तु बनी रहे। 

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक ख़बर सुर्खियों में छाई रही कि शहीद अंशुमान सिंह की पत्नी स्मृति सिंह बीमा आदि के पैसे और कीर्तिचक्र सम्मान लेकर अपने पिता के घर चली गयीं। परिवार, समाज सब उनको लानत भेज रहे हैं। उनके खिलाफ बयानबाजी से सोशल मीडिया भर गया है। भारतीय समाज जिस हद तक स्त्रीद्वेषी है उसकी बानगी घटना के बाद परिवार, समाज से आई प्रतिक्रियाएं साफ जाहिर करती है। शहीद के माता-पिता बाकायदा एक इंटरव्यू देते हैं और अपनी बहू स्मृति सिंह के पैसे और मेडल लेकर जाने पर बेहद नाराज़गी दिखाते हैं।

लगातार सोशल मीडिया पर ये बात कहकर स्मृति सिंह को ट्रोल किया जा रहा है कि वो दूसरी शादी कर लेगी, शहीद के पैसे को खर्च करेगी, खुश रहेगी आदि-आदि। ये बातें कितनी दुर्भाग्यपूर्ण हैं आखिर लोग किस युग की बात कर रहे हैं।

ये समाज किस हद तक पितृसत्तात्मक है उसकी थाह शहीद के माता-पिता के बयान से मिलती है। उनकी प्रतिक्रियाएं एक स्त्री की अस्मिता और स्वतंत्रता को लगातार ख़ारिज करती दिखीं। शहीद अंशुमान की पत्नी स्मृति सिंह पर उनकी माँ की ये टिप्पणी बेहद आपत्तिजनक है कि ”बहुएँ भाग जाती हैं।“ जिस स्त्री को बहू की भूमिका में ही रखकर परिवार समाज और लगभग राज्य भी देखता है वो मनुष्य है और हर मनुष्य को अपना जीवन जीने का अधिकार है। स्मृति सिंह एक पढ़ी-लिखी वयस्क लड़की हैं उन्हें अपने निर्णय लेने का और चयन का अधिकार है इसे अगर भारतीय परिवार और समाज नहीं स्वीकार कर रहा है तो ये उसके प्रतिगामी मूल्यों में फंसे रह जाने की बात है।

अंशुमान सिंह के माता-पिता का इंटरव्यू देखकर जिस तरह से लोग स्मृति पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं  वे उनके पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है वहां किसी ने उनका का पक्ष जानने की कोशिश भी नहीं की। शहीद के पिता इंटरव्यू में कहते हैं कि “मैं तो अपने छोटे बेटे यानी कि स्मृति के देवर के साथ बहू की शादी करने को तैयार था लेकिन वह चली गयी। वे पूरे इंटरव्यू में पितृसत्ता की जितनी हनक होती है उसी के साथ अपनी बात कहते रहे जैसे कि बहू की शादी मैं खुद अपने घर करता आदि बातें। ये बातें सामन्ती समाज की संरचना के लिहाज से महान दिख सकती हैं लेकिन एक स्त्री की स्वतंत्रता चयन और इच्छा के विरुद्ध है।

स्मृति सिंह या कोई भी स्त्री कोई वस्तु नहीं है कि पितृसत्ता उन्हें जहां रख दें वे वहीं पड़ी रहें। स्मृति एक पढ़ी-लिखी आधुनिक और वयस्क स्त्री हैं। यह उनका अधिकार और चयन है कि वह कहां रहना चाहती है और किसको अपना जीवनसाथी चुनेगी या नहीं चुनेगी। इंटरव्यू में यह बात भी कही गई कि अगर बहू मेरे छोटे बेटे से विवाह नहीं करना चाहती तो मैं छोटे बेटे का जो पहला बच्चा होता उसे दे देता। आज के आधुनिक समाज में इतने प्रतिगामी विचार की बात करना अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण बात है। एक लोकतांत्रिक मूल्यों से बने देश में एक आधुनिक चेतनाशील स्त्री के लिए ऐसी बातें तय करना कहां से न्यायसंगत हो सकता है।

एंगेल्स अपनी किताब “परिवार निजी संपत्ति और राज्य की उत्त्पत्ति” में कहते हैं कि सम्पत्ति ही आधार है परिवार नाम की सामाजिक संस्था बनने की जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया है। लगातार सोशल मीडिया पर ये बात कहकर स्मृति सिंह को ट्रोल किया जा रहा है कि वो दूसरी शादी कर लेगी, शहीद के पैसे को खर्च करेगी, खुश रहेगी आदि-आदि। ये बातें कितनी दुर्भाग्यपूर्ण हैं आखिर लोग किस युग की बात कर रहे हैं। निश्चित रूप में माता-पिता बुजुर्ग हैं लेकिन पत्नी के समक्ष पूरी उम्र पड़ी हुई है। आखिर समाज किस बात की सजा दे रहा एक स्त्री को। उसे रोज़ नये-नये ट्रोलिंग संदेश, प्रेस रिलीज़, यूट्यूब वीडियो के ज़रिये से प्रताड़ित किया जा रहा है।

इतना ही नहीं शहीद के माता-पिता सेना में निकटतम परिजन (एनओके) की परिभाषा को बदलने की मांग करते नजर आये। एक उच्च मध्यवर्गीय परिवार की सुविधाएं जिस तरह की होती हैं उसको केंद्र में वे बहस कर सकते हैं लेकिन निम्नमध्यवर्गीय परिवारों की स्थित अलग होती है। सेना में सैनिक के स्तर पर भर्ती होने वाले अधिकांश युवा निम्नमध्यवर्गीय व ग्रामीण समाज से होते हैं, उन युवाओं की शादी भी कम पढ़ी-लिखी और ग्रामीण परिवेश की लड़कियों से होती है। ऐसे घरों से आयीं ज्यादातर लड़कियों का जीवन आत्मनिर्भर नहीं होता है। बहुत भेदभावों, पिछड़ेपन और रूढ़ियों के बीच उनका जीवन कटता है। कम उम्र में ही उनकी शादी हो जाती है और जल्दी ही बच्चों की जिम्मेदारी उनपर आ जाती है। समाज की पितृसत्तात्मक संरचनाएं और राज्य की गैरजिम्मेदाराना प्रकृति में कुछ पैसा और सुविधाएं ही हैं जो सैनिकों की बीवियों/विधवाओं और बच्चों के काम आती हैं। इसी पैसे के आधार पर कितनी ही लड़कियों की पढ़ाई और फिर नौकरी मिलती है। अगर ऐनओके की नीतियों को बदलकर इस पर भी उनका हक़ छीन लिया जाएगा फिर उनके पास जीवन यापन का क्या आधार बचेगा।

कैप्टन अंशुमन सिंह तो सेना में डॉक्टर थे, सेना में डॉक्टर होना कोई साधरण बात नहीं है, इससे पता चलता है उनका परिवार ठीक-ठाक और सम्पन्न मध्यवर्गीय परिवार होगा। अगर इस देश की शक्ति संस्थाएं सम्पन्न वर्ग (मध्यवर्ग) को ध्यान में रखकर डिज़ाइन की जाएंगी, तो यह वंचित वर्गों के मनुष्यों के साथ अन्यायपूर्ण ढाँचा होगा। भारतीय समाज जिस ढाँचे में ढला है वहां पिता की संपत्ति में बेटियों को सम्पत्ति में अधिकार के लिए कानून तो बन गये लेकिन उनका प्रभाव समाज में दिखता नहीं। पति की सम्पत्ति में पत्नी के अधिकार को भी समाज बहुत आश्वस्त नहीं दिखता। यहां जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है लगता है उससे भी वे स्त्री को बेदखल करना चाहते हैं।

तस्वीर साभारः India Today

सोशल मीडिया पर एक आधारहीन बहस लगातार चल रही हैं वहां कोई तथ्य नहीं होता एक स्त्री है, जवान है, विधवा है तो उसे जीने का अधिकार नहीं। देवर से शादी जैसी बात जो एकदम से संपत्ति के संचय पर आधारित है जिस घर में इतने प्रतिगामी मूल्यों की बात हो रही हो वहां एक आधुनिक विचार की पढ़ी-लिखी स्वतंत्र चेतना की स्त्री कैसे रह सकती है। समाज अगर इस कदर स्त्री विरोधी है जो स्त्री को मनुष्य नहीं मान रहा है तो आखिर इसमें स्त्री का क्या दोष और वो कितनी सदियों तक पितृसत्ता की धुरी पर नाचती रहेगी। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने लगा उसे स्मृति का बता कर यह दिखाने की कोशिश कर रहे कि पिछली जुलाई में ही शहीद की विधवा हुई स्त्री नाच रही है। उस वीडियो में साड़ी का विज्ञापन है और कुछ प्लीजेंट डांस मूव से हैं। वीडियो को पोस्ट करके लोग स्त्रीद्वेष से भरे बयान जारी कर रहे हैं जबकि वो वीडियो वास्तव में उनका नहीं है। लेकिन यहां बात समाज के मर्दवादी नज़रिए की है कि अगर वो वीडियो उनका ही होता तो वो कौन सा अपराध कर रही थीं क्या साथी खो देना जीवन जीना छोड़ देना होता है। वह वीडियो रेशमा सबेस्टियन का है जो फैशन, मॉडलिंग करते हुए इंस्टाग्राम इन्फ्लूएंसर है। उनका चेहरा-मोहरा उनसे मिलता है उसके वीडियो को स्मृति का वीडियो बता पूरा स्त्री द्वेषी समाज उसके ख़िलाफ़ घृणा का बाजार खड़ा कर लिया। इतनी ट्रोलिंग और हेट कमेंट का सामना रेशमा को करना पड़ा कि उन्होंने कमेंट ऑप्शन बंद कर दिया।

सोशल मीडिया पर आये दिन किसी न किसी स्वतंत्र चेतना की स्त्री को अपमानित किया जा रहा है, जिस तरह से समाज प्रतिगामी मूल्यों की तरफ गया है उसमें राज्य की बड़ी भूमिका है। एक स्त्री जब अपने लिये अपनी इच्छा का जीवन चुनती है तो ऐसे माहौल में से यदि कोई महिला निकल जाती है तो घर परिवार समाज मीडिया में सार्वजनिक बयान देने लगते हैं कि बहुएं घर छोड़कर चली जाती हैं। गौरतलब बात है कि आखिर ऐसा करने वाली बहुएं कौन हैं यही समय के परिदृश्य पर अंकित नयी स्त्री है जो तोड़ रही है पितृसत्ता के छल-छंद को और अपने लिये अपनी इच्छा का जीवन चुन रही है और तब सारा मर्दवादी समाज जिसमें धार्मिक कट्टरपंथी समाज ज्यादा सक्रिय है मिलकर औरत को गाली देते हैं, धमकी देते हैं। स्मृति सिंह का एक स्त्री होने के नाते अपने बारे में फ़ैसला लेना कोई अपराध नहीं और वो एक मनुष्यगत अधिकार भी है। वह वहीं चीजें अपने साथ लेकर गयी जो उन्हें अंशुमान सिंह की जीवनसाथी होने के कारण उन्हें मिली थी।

समाज की पितृसत्तात्मक संरचनाएं और राज्य की गैरजिम्मेदाराना प्रकृति में कुछ पैसा और सुविधाएं ही हैं जो सैनिकों की बीवियों/विधवाओं और बच्चों के काम आती हैं। इसी पैसे के आधार पर कितनी ही लड़कियों की पढ़ाई और फिर नौकरी मिलती है। अगर ऐनओके की नीतियों को बदलकर इस पर भी उनका हक़ छीन लिया जाएगा फिर उनके पास जीवन यापन का क्या आधार बचेगा।

आज जब चारों तरफ से स्मृति सिंह को अपमानित करने के लिए ट्रोलिंग की जा रही है। तो सवाल उठता है कि आखिर क्यों समाज स्त्री को महज पति और ससुराल के दायरे में बांधकर रखना चाहता है। क्या किसी स्त्री के जीवन में पति का न होना, उसकी ज़िंदगी से हर तरह के जीवन मूल्य और रंग खत्म हो जाते हैं। वह चाहे तो क्या अपना नया साथ का जीवन शुरू नहीं कर सकती है? अगर उसे नया वैवाहिक जीवन भी शुरू करना है तो उसका विकल्प भी क्या वह घर ही है? लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि किसी स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व आखिर ये समाज कब स्वीकार करेगा।

एक स्त्री का जीवन पति से ही नहीं शुरू होता है और न ही पति पर ही ख़त्म होता है। जिस तरह से मीडिया पर ससुराल वाले कुछ भी कहे जा रहे हैं वो बेहद एकतरफा बातें हैं जबकि वहां पर उनका कोई बयान नहीं आया है। घर के अंदर क्या घटा कोई नहीं जानता। लेकिन उसे जानने की जरूरत क्या किसे है यहाँ मीडिया ट्रायल केवल महिलाओं का ही होता है, खासकर अगर वो अकेली और मुक्त होना चाहती हो।परिवार, समाज की धारणा में शादी के बाद एक स्त्री की स्वतंत्र पहचान ख़त्म हो जाती है, लेकिन नयी चेतना से लैस स्त्री उनको स्मृति सिंह की तरह ही अनदेखा करती है और आगे कदम बढ़ाकर अपनी इच्छा और आजादी का जीवन को चुनती है।


About the author(s)

रूपम मिश्र

रूपम मिश्र मूल रूप से कवि हैं विभिन्न पत्र , पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हैं । 7 जून1983 को उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव तिलहरा( सुजानगंज) में जन्म। प्रारंभिक से लेकर स्नातक तक शिक्षा जौनपुर जिले में पूर्वांचल में ही हुई। प्रतापगढ़ जिले में पट्टी तहसील के बिनैका गाँव में रहनवारी हैं।

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