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विश्व स्तर पर कोविड-19 आने के बाद लोगों के इंटरनेट और फोन इस्तेमाल करने पर निर्भरता अधिक बढ़ी है। फोन का उपयोग हम अपने काम के साथ-साथ मनोरंजन के लिए भी करते हैं। हमारे देश में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करनेवालों की संख्या अधिक है, इसलिए फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टि्वटर, व्हाट्सएप जैसी सभी सोशल साइट्स को यहां बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जाता है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म मनोरंजन और सूचना का सबसे बड़ा साधन बन चुका है। इसी मनोरंजन और सूचना की आड़ में होता है ‘साइबर क्राइम।’ अपराध की श्रेणी में साइबर क्राइम इंटरनेट के आगमन के साथ जुड़ा है। 

साइबर क्राइम का सबसे ज्यादा सामना दुनियाभर में महिलाएं करती हैं। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर महिलाओं के लिए भद्दे जोक्स, ट्रोलिंग से लेकर उनके सोशल मीडिया हैंडल अकाउंट में आनेवाले अश्लील मेसेज तक में ऑनलाइन हिंसा, उत्पीड़न के कई मामले देखे जा सकते हैं। ऑनलाइन एब्यूजिंग एक ट्रेंड की तरह हर दिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर होती है। साइबर क्राइम के तहत औरतों के साथ हिंसा करने की अलग-अलग तकनीक अपनाई जाती है। ऑनलाइन हिंसा का सामना हर उम्र की महिलाओं को करना पड़ता है। 

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ऑनलाइन हिंसा इस बात का प्रमाण है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का केवल माध्यम बदलता है हिंसा करने वाला नहीं और ना ही ऐसा करने के पीछे का उद्देश्य।

साइबर क्राइम का बदलता स्वरूप

साइबर क्राइम के अंदर कई प्रकार के अपराध आते हैं। इसमें हैकिंग, साइबर स्टॉकिंग, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, आईडी चोरी, इनबॉक्स में अश्लील मैसेज करना, ट्रोलिंग, आदि अपराध शामिल हैं। समय के साथ साइबर क्राइम ने अपना रूप बदलते हुए ‘ऑनलाइन लिंग आधारित हिंसा’ को अपना नया हथियार बनाया है। ट्रोलिंग, धमकियां अश्लील मैसेज, भद्दे कमेंट, ‘ऑनलाइन लिंग आधारित हिंसा’ का केंद्र बिंदु हैं। पितृसत्तात्मक विचारधारा का प्रभाव ऑनलाइन हिंसा में साफ़ देखा जा सकता है। 

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सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म स्वतंत्रता देता है कि कोई भी व्यक्ति इसका उपयोग कर सकता है। हालांकि, इस तथाकथित पुरुष प्रधान समाज को औरतों की स्वतंत्रता हज़म नहीं होती। औरतों की आज़ादी का हनन ये लोग बेतुके जोक्स, मेसेजेस, ट्रोलिंग धमकियों के ज़रिए करते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी महिलाओं व लड़कियां खुद को स्वतंत्र, सुरक्षित महसूस नहीं करती। जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा पड़ता है। महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा होना उस मानसिकता को दिखाता है, जो महिलाओं के प्रति पितृसत्ता की सोच है।

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ऑनलाइन हिंसा का महिलाओं पर कितना असर

महिलाओं के खिलाफ होने वाली ऑनलाइन हिंसा में सबसे ज्यादा टारगेट की जाती हैं वे औरतें जो खुले विचारों की हैं और अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर सामाजिक, राजनीतिक, लैंगिक मुद्दों पर अपने विचार लिखने में हिचकिचाती नहीं हैं। स्वतंत्र विचारों वाली इन महिलाओं को ट्रोलिंग के ज़रिये परेशान किया जाता है, भद्दी गालियों, धमकियों भरे पोस्ट इन औरतों को टारगेट करके पोस्ट किए जाते हैं। ऑनलाइन ट्रोलिंग का असर महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है, कई बार वे तनाव का शिकार हो जाती हैं। सोशल मीडिया पर उनके साथ होनेवाली ऑनलाइन हिंसा का प्रभाव उनके निजी जीवन को प्रभावित कर देगा, इस बात का डर महिलाओं को मानसिक तनाव की ओर धकेलता है।  

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म स्वतंत्रता देता है कि कोई भी व्यक्ति इसका उपयोग कर सकता है। हालांकि, इस तथाकथित पुरुष प्रधान समाज को औरतों की स्वतंत्रता हज़म नहीं होती। औरतों की आज़ादी का हनन ये लोग बेतुके जोक्स, मेसेजेस, ट्रोलिंग धमकियों के ज़रिए करते हैं।

युवा लड़कियों के लिए कितना सेफ स्पेस है सोशल मीडिया

ऑनलाइन हिंसा और ट्रोलिंग का सामना युवा, टीनएज लड़कियां भी बड़ी संख्या में करती हैं। कम उम्र की लड़कियां अमूमन सोशल मीडिया के इस स्याह पक्ष के इनजान होती हैं। ऐसे में जब वे ऑनलाइन हिंसा का सामना करती हैं तो इसका उनके मनौविज्ञान पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। जब उनके कमेंट बॉक्स या इनबॉक्स में अश्लील मैसेजेस आते हैं। उनके पोस्ट पर धमकियां और कमेंट आते हैं तो यह डर इतना ज्यादा होता है कि कई लड़कियां अपना संपर्क ऑनलाइन दुनिया से एकदम तोड़ लेती हैं। कई केस में तो लड़कियों को धमकियों का सामना करना पड़ता है। धमकी का डर इस कदर मन में घर करता है कि लड़कियां अपने आसपास के माहौल में भी डर कर रहती हैं। हमेशा उन्हें लगता है कि कहीं कोई उनका पीछा कर रहा है। इनबॉक्स का वह शख्स उनके निजी जीवन के बारे में सब कुछ जानता है।

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कानून और समाधान

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बेखौफ ट्रोलिंग करते ट्रोल्स को न किसी कानून का डर होता है ,न सरकार का। हालांकि इंटरनेट पर होनेवाले अपराधों के लिए कानूनी तौर पर दंड का प्रावधान है। हालांकि ये कानून लागू होते नहीं दिखाई पड़ते, अगर ऐसा होता तो इंटरनेट महिलाओं के लिए इतना असुरक्षित स्पेस नहीं बन जाता। भारतीय कानून में कई जटिलताएं हैं, सभी लोगों की इन तक पहुंच नहीं है। उसी का परिणाम है कि ये धाराएं और कानून एक वक्त पर केवल कागज़ी लगते हैं, इनका वास्तविकता में अमल नहीं होता। वहीं, हमारी पुलिस या न्याय व्यवस्था ऑनलाइन हिंसा को लेकर बहुत अधिक सक्रिय नहीं है। इसके पीछे कारण हैं महिलाओं के खिलाफ रोज़मर्रा के जीवन में गाली- गलौच, मारपीट, अभद्र व्यवहार का होना आम बात है। औरतों के खिलाफ़ हिंसा का सामान्यीकरण सोशल मीडिया पर भी हो चुका है। ऑनलाइन हिंसा इस बात का प्रमाण है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का केवल माध्यम बदलता है हिंसा करने वाला नहीं और ना ही ऐसा करने के पीछे का उद्देश्य।

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तस्वीर साभार : omidyarnetwork

पेशे से एक पत्रकार ,जज्बातों को शब्दों में लिखने वाली 'लेखिका'
हिंदी साहित्य विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से BA(Hons) और MA(Hons) मे शिक्षा ग्रहण की फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में शिक्षा ली । मूलतः उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध रखती हूँ और दिल्ली में परवरिश हुई । शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेशों में नारी आस्मिता पर पितृसत्ता का प्रभाव देखा है जिसे बेहतर जानने और बदलने के लिए 'फेमनिज़म इन इंडिया' से जुड़ी हूँ और लोगों तक अपनी बात पहुँचाना चाहतीं हूँ।

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