संस्कृतिसिनेमा केयर वर्क और पेरेंटहुड पर जरूरी सवाल खड़े करती मजेदार सीरीज़ है ‘सिंगल पापा’

केयर वर्क और पेरेंटहुड पर जरूरी सवाल खड़े करती मजेदार सीरीज़ है ‘सिंगल पापा’

जब बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादातर पिता-पुत्र की कहानियां भी मर्दानगी और ताक़त के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं 'सिंगल पापा' एक मर्द को संवेदनशील, डरे हुए और बच्चे की देखभाल में जूझते हुए दिखाने की कोशिश अच्छी कर  रही है।

नेटफ्लिक्स पर दिसंबर 2025 को आई वेब सीरीज़ ‘सिंगल पापा’ उन विषयों में से एक है जो भारतीय ओटीटी पर कम ही देखने को मिलते हैं। क्राइम थ्रिलर और रोमांस की भीड़ में यह एक ताज़ा हवा का झोंका है। एक ऐसी कहानी जो पितृत्व, गोद लेने और परिवार की परिभाषा पर सवाल खड़े करती है। कुणाल खेमू अभिनीत यह छह एपिसोड की सीरीज़  है तो एक कॉमेडी ड्रामा, लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह पितृसत्ता, लैंगिक भूमिकाओं और देखभाल के काम पर एक ज़रूरी बयान है। इशिता मोइत्रा और नीरज उधवानी द्वारा निर्मित इस सीरीज़ को नारीवादी नज़रिए से देखना दिलचस्प है।

यह कुछ सवाल तो उठाती है, लेकिन कुछ अहम मुद्दों को छू भी नहीं पाती। जब बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादातर पिता-पुत्र की कहानियां भी मर्दानगी और ताक़त के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं ‘सिंगल पापा’ एक मर्द को संवेदनशील, डरे हुए और बच्चे की देखभाल में जूझते हुए दिखाने की कोशिश अच्छी कर  रही है। यह रिफ्रेशिंग है, लेकिन साथ ही यह सोचने पर मजबूर भी करता है कि क्या यही कहानी एक औरत की होती तो क्या हम इसे इतना ‘ख़ास’ मानते?

जब बॉलीवुड और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादातर पिता-पुत्र की कहानियां भी मर्दानगी और ताक़त के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं ‘सिंगल पापा’ एक मर्द को संवेदनशील, डरे हुए और बच्चे की देखभाल में जूझते हुए दिखाने की कोशिश अच्छी कर  रही है।

सीरीज़ की शुरुआत गौरव गहलोत की ज़िंदगी से होती है। शुरुआत में ही दिखाया जाता है कि गौरव की पत्नी उसे इसी वजह से छोड़ देती है कि गौरव बच्चा चाहता है, और उसकी पत्नी साफ़ मना कर देती है। वह जानती है कि गौरव सिर्फ़ बच्चा पैदा करना चाहता है, लेकिन एक पिता की असली ज़िम्मेदारियों को कभी नहीं समझ पाएगा। गौरव ख़ुद एक ‘मैन-चाइल्ड’ है – अपने रोज़मर्रा के काम तक ख़ुद नहीं करता। जो आदतें, जो परिपक्वता, जो गंभीरता एक पिता बनने के लिए ज़रूरी है, वह सब उसमें नहीं है। उसकी पत्नी को अपना भविष्य उसके साथ सही नहीं दिखता। वह जानती है कि अगर बच्चा हुआ, तो सारी ज़िम्मेदारी बच्चे की देखभाल, रातों को जागना, हर छोटी-बड़ी ज़रूरतें सब कुछ उसी के कंधों पर आ जाएगा। उसका ऐसा मानना या लगना इसलिए भी सही हो जाता है क्योंकि हमारे पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा ही होता आया है। अमूमन पुरुष बच्चा तो चाहते हैं, लेकिन उसे पालने की असली मेहनत, त्याग या जिम्मेदारी से या तो दूर भागते हैं या पूरी तरह निभाने से चूक जाते हैं।

पितृत्व की जिम्मेदारी और भारतीय सोच

लेकिन, सीरीज़ इससे बढ़कर आगे कई और मुद्दों पर बात करती है। हालांकि जबकि यहां एक बड़ी बात छिपी है। कितनी औरतें ऐसे अपरिपक्व पार्टनर्स के साथ रहने पर बाध्य होती हैं जो पिता बनना तो चाहते हैं, लेकिन पितृत्व की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं। यह वह हक़ीक़त है जो लाखों औरतें रोज़ जीती हैं। गौरव की पत्नी का फ़ैसला दरअसल एक साहसिक क़दम है। वह जानती है कि ऐसे व्यक्ति के साथ बच्चा करने का मतलब एक बच्चे की माँ नहीं, बल्कि दो बच्चों की माँ बनना है। इसलिए, वो अलग हो जाने का फैसला करती है। हालांकि सीरीज़ इस पहलू को उतनी गंभीरता से नहीं दिखाती। तलाक के बाद गौरव को एक दिन अपनी कार में एक नवजात बच्चा मिलता है और यहीं से असल कहानी शुरू होती है।

गौरव जो ख़ुद अपनी ज़िंदगी में पूरी तरह जिम्मेदार नहीं था, फ़ैसला करता है कि वह इस बच्चे को गोद लेगा। वह समझता है कि वह पिता बनना चाहता है। लेकिन, यह फ़ैसला सुनते ही उसके परिवार में भूचाल आ जाता है। एक तलाक़शुदा मर्द, जो अकेला है, जो अपना जीवन भी ठीक से नहीं जी पा रहा, वह बच्चा गोद ले रहा है? समाज क्या कहेगा? लोग क्या सोचेंगे? मनोज पाहवा और आयशा राज़ा मिश्रा, जो गौरव के माता-पिता का किरदार निभाते हैं, शुरू से ही पूरी तरह से इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हैं। 

गौरव ख़ुद एक ‘मैन-चाइल्ड’ है – अपने रोज़मर्रा के काम तक ख़ुद नहीं करता। जो आदतें, जो परिपक्वता, जो गंभीरता एक पिता बनने के लिए ज़रूरी है, वह सब उसमें नहीं है। उसकी पत्नी को अपना भविष्य उसके साथ सही नहीं दिखता।

लेकिन, गौरव नहीं मानता और यहां से गोद लेने की प्रक्रिया का लंबा सफ़र शुरू होता है जिसके माध्यम से कई और महवत्वपूर्ण मुद्दों को छूने की कोशिश की गई है। नेहा धूपिया गोद लेने की एजेंसी की अधिकारी श्रीमती नेहरा का किरदार निभाती हैं, जो उससे सख़्त सवाल पूछती हैं। वह जानना चाहती हैं कि एक एकल पुरुष अकेला मर्द, जो अपनी शादी तक नहीं बचा पाया, बच्चा गोद क्यों लेना चाहता है और क्या वह सच में पालन-पोषण कर पाएगा? ये सवाल ज़रूरी हैं और गौरव के लिए यह एक असली परीक्षा बन जाती है। गौरव को हर क़दम पर साबित करना पड़ता है कि वह एक अच्छा पिता बन सकता है। क़ानूनी दांवपेच, समाज के ताने, परिवार का दबाव, और ख़ुद अपनी अक्षमता से लड़ते हुए वह धीरे-धीरे बदलता है।

माँ के प्यार का मिथक तोड़ती कहानी

‘सिंगल पापा’ एक ऐसी सीरीज़ है जो बिना सीधे कहे एक बड़ा सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ़ माँ का प्यार ही बच्चे को बड़ा कर सकता है? हमारे समाज में यह मान लिया गया है कि माँ बनना एक ‘नैचुरल प्रोसेस’ है, कि औरतें जन्म से ही बच्चों की देखभाल करना जानती हैं। लेकिन सच तो यह है कि यह पितृसत्ता की एक सोच है। सीरीज़ पूरी तरह गौरव की ‘सिंगल पापा’ बनने की यात्रा दिखाती है, लेकिन अगर गौर से देखें तो यह दरअसल मातृत्व की ही बात कर रही है। जब गौरव बच्चे को दूध पिलाता है, रात भर जागता है, उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखता है, तो वह वही सब कुछ कर रहा है जो एक माँ करती है। उसका बेटा अमूल एक स्वस्थ और ख़ुश बच्चे की तरह बड़ा होता है। यहीं सीरीज़ का असली संदेश छिपा है। यह दिखाता है कि अगर कोई भी इंसान – चाहे मर्द हो या औरत – प्यार, भरण-पोषण और देखभाल करे, तो नतीजा एक जैसा ही होगा। ‘माँ का प्यार’ कोई जादुई चीज़ नहीं है जो सिर्फ़ औरतों में होती है। यह वह भावना और मेहनत है जो कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के लिए कर सकता है।

सीरीज़ में दयानंद शेट्टी का किरदार भी दिलचस्प और बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने एक पुरुष आया की भूमिका निभाई है जो बच्चे की देखभाल में माहिर है। एक बिहारी ‘मैनी’ यानी पुरुष आया, जो शारीरिक रूप से मज़बूत दिखता है लेकिन अत्यंत संवेदनशील और देखभाल करने वाला है।  उसकी मौजूदगी यह दिखाती है कि देखभाल का काम किसी एक जेंडर का नहीं है। छह एपिसोड की यह सीरीज़ दिखाती है कि कैसे एक मर्द को पितृत्व साबित करने के लिए न केवल क़ानूनी बल्कि सामाजिक बाधाओं से भी लड़ना पड़ता है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती है कि अगर यही कहानी एक अकेली औरत की होती, तो क्या उसे भी इतनी सहानुभूति मिलती? सीरीज़ बिना शोर किए, बिना भारी संवाद दिए, बड़े सवाल खड़े करती है। यह पितृत्व को जिस सहजता से प्रस्तुत करती है, वह इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

‘सिंगल पापा’ एक ऐसी सीरीज़ है जो बिना सीधे कहे एक बड़ा सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ़ माँ का प्यार ही बच्चे को बड़ा कर सकता है? हमारे समाज में यह मान लिया गया है कि माँ बनना एक ‘नैचुरल प्रोसेस’ है, कि औरतें जन्म से ही बच्चों की देखभाल करना जानती हैं। लेकिन सच तो यह है कि यह पितृसत्ता की एक सोच है।

पितृत्व की नई परिभाषा गढ़ती कहानी

‘सिंगल पापा’ पितृत्व को एक संवेदनशील और भावनात्मक यात्रा के रूप में दिखाती है। परंपरागत रूप से, भारतीय सिनेमा और समाज में पुरुषों को केवल कमाने वाले के रूप में देखा जाता रहा है, जबकि देखभाल और पालन-पोषण को औरतों का ‘प्राकृतिक’ काम माना जाता है। यह सीरीज़ इस धारणा को सीधे चुनौती देती है। गौरव का किरदार दिखाता है कि पुरुष भी उतने ही भावुक, असुरक्षित और देखभाल करने वाले हो सकते हैं। जब वह बच्चे को संभालने में जूझता है, रातों को जागता है, और अमूल के लिए अपना पूरा जीवन बदल देता है, तो यह साफ़ हो जाता है कि पालन-पोषण कोई जेंडर-आधारित योग्यता नहीं है। ‘सिंगल पापा’ एक दिल को छूने वाली और मनोरंजक सीरीज़ है जो सिर्फ पितृत्व ही नहीं बल्कि पेरेंटहुड पर एक नया नज़रिया पेश करती है। यह दिखाती है कि पुरुष भी संवेदनशील, देखभाल करने वाले और पूरी तरह समर्पित पेरन्ट हो सकते हैं। कुणाल खेमू का अभिनय शानदार है और पूरी कास्ट ने बेहतरीन काम किया है।

हालांकि नारीवादी दृष्टिकोण से देखें तो यह सीरीज़ लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देने में आंशिक रूप से सफल है। यह पुरुषों को भावनात्मक प्राणी के रूप में दिखाकर और देखभाल के काम में उनकी भागीदारी को सामान्य बनाकर एक अहम योगदान देती है। फिर भी, भारतीय ओटीटी की दुनिया में जहां ज़्यादातर सामग्री क्राइम थ्रिलर या रोमांटिक ड्रामा है, ‘सिंगल पापा’ एक ताज़ी हवा का झोंका है। यह परिवार के साथ बैठकर देखने लायक़ है और पितृत्व, गोद लेने और परिवार की परिभाषा या परिवार के बीच भावनात्मक जुड़ाव पर ज़रूरी बातचीत शुरू करती है। अगर आप एक ऐसी सीरीज़ की तलाश में हैं जो आपको हंसाए, रुलाए और सोचने पर मजबूर करे, तो ‘सिंगल पापा’ ज़रूर देखना जाना चाहिए। यह हर मायने में संपूर्ण तो नहीं लेकिन एक ज़रूरी बातचीत जरूर शुरू करती है।  

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