आज के आधुनिक समाज में महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही हैं। चाहे वह कॉर्पोरेट ऑफिस हो, फैक्ट्री, अस्पताल, शिक्षा संस्थान या स्वरोजगार, महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। द इंडिया फ़ोरम पत्रिका में छपे भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ ) के आयोजित नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस), 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण महिलाओं की श्रम बल प्रतिशत दर (एलएफपीआर) में पिछले साल की तुलना में 6.1 फीसदी संख्या की बढ़ोतरी हुई, जबकि शहरी महिलाओं की श्रम बल प्रतिशत दर में 2.6 फीसदी संख्या की बढ़ोतरी देखी गई ।
लेकिन महिलाओं की ये यह प्रगति कई समस्याओं और चुनौतियों से घिरी हुई है। शैक्षणिक कैंपस – विश्वविद्यालय, कॉलेज, कोचिंग संस्थान और स्कूल महिलाओं के लिए ज्ञान का केंद्र होने के साथ-साथ रोजगार का प्रमुख स्रोत भी हैं। भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यरत महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लेकिन कैंपस का माहौल, जो बौद्धिक स्वतंत्रता और समानता का प्रतीक माना जाता है, कई महिलाओं के लिए असुरक्षा, भेदभाव और मानसिक दबाव का केंद्र भी बन जाता है। कैंपस में काम करने वाली महिलाएं जेंडर आधारित भेदभाव, सुरक्षा चिंताओं, कार्य-जीवन संतुलन और सामाजिक दबावों का सामना करती हैं।लेकिन अक्सर समाज और प्रशासन उनकी समस्याओं को अनदेखा कर देते हैं।
भारत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आयोजित नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण महिलाओं की श्रम बल प्रतिशत दर में पिछले साल की तुलना में 6.1 फीसदी संख्या की बढ़ोतरी हुई, जबकि शहरी महिलाओं की श्रम बल प्रतिशत दर में 2.6 फीसदी संख्या की बढ़ोतरी देखी गई ।
पुरुष-प्रधान सुरक्षा व्यवस्था में महिला गार्डों की अनदेखी
भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में महिला सुरक्षा गार्डों की भूमिका तेजी से महत्वपूर्ण हो रही है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों के कैंपस, जहां हजारों छात्र-छात्राएं पढ़ाई के लिए आते हैं, वहां सुरक्षा सुनिश्चित करना एक चुनौतीपूर्ण काम है। खास तौर पर महिला गार्ड्स, जो अक्सर छात्रावासों, प्रवेश द्वारों और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी करती हैं, न केवल कैंपस की सुरक्षा का प्रतीक हैं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा को बढ़ावा देने वाली एक सकारात्मक पहल का हिस्सा भी हैं। लेकिन, समाज की पितृसत्तात्मक संरचना और संसाधनों की क मी के कारण ये महिलाएं कई समस्याओं का सामना करती हैं। सुरक्षा क्षेत्र मुख्य रूप से पुरुष-प्रधान होने के कारण महिला गार्ड्स को अक्सर कमजोर या अक्षम माना जाता है। इन महिला कर्मचारियों के साझा अनुभवों से पता चलता है कि महिला गार्ड्स को छात्रों या सहकर्मियों से तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
बारहवीं कक्षा तक पढ़ी, 36 वर्षीय एक महिला सुरक्षा गार्ड जो केंद्रीय विश्वविद्यालय में 5 साल से सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहीं हैं, वो बताती हैं, “जब हम लोग बाहर किसी को बताते हैं कि हम सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते हैं, तो लोग कहते हैं, तुम क्या सुरक्षा दोगी तुम्हें तो खुद सुरक्षा की ज़रूरत है। ये सुनकर बहुत बुरा लगता है। इस ज़िम्मेदारी के काम को हम पूरे दिन धूप में लाइब्रेरी के बाहर, हॉस्टल के बाहर, डिपार्टमेंट के बाहर खड़े होकर करते हैं, उसे लोग नकार देते हैं। यहां तक कि कभी-कभी तो हमारे साथ काम कर रहे पुरुष सुरक्षा गार्ड तक हमें कमज़ोर आंकते हैं।” इस विषय पर एक और महिला गॉर्ड बताती हैं, कि “मेरी कभी-कभी नाइट शिफ्ट में ड्यूटी लगती है, सारी रात वहीं खड़े होकर गुजारनी पड़ती है। रात की ड्यूटी में डर भी लगता है और घर की चिंता बराबर बनी रहती है। पीरियड्स के दौरान रात को नाइट शिफ्ट करते समय सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। हम लोग चाहते हैं कि हमारी नाइट शिफ्ट खत्म कर दी जाए या फिर पीरियड्स के दौरान नाइट शिफ्ट ना लगाई जाए।”
जब हम लोग बाहर किसी को बताते हैं कि हम सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते हैं, तो लोग कहते हैं, तुम क्या सुरक्षा दोगी तुम्हें तो खुद सुरक्षा की ज़रूरत है। ये सुनकर बहुत बुरा लगता है। इस ज़िम्मेदारी के काम को हम पूरे दिन धूप में लाइब्रेरी के बाहर, हॉस्टल के बाहर, डिपार्टमेंट के बाहर खड़े होकर करते हैं, उसे लोग नकार देते हैं।
कैंपस की अदृश्य रीढ़: महिला सफाई कर्मचारियों का संघर्ष
भारतीय कॉलेज और विश्वविद्यालय कैंपस हजारों छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों का केंद्र होते हैं। इन विशाल परिसरों को साफ-सुथरा रखने का जिम्मा अक्सर सफाई कर्मचारियों के कंधों पर होता है। सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक क्लासरूम, हॉस्टल, कैंटीन, शौचालय और लॉन, हर कोने को चमकाने वाली ये कर्मचारी कैंपस की अदृश्य रीढ़ हैं। भारतीय शैक्षणिक संस्थानों के कैंपस चाहे दिल्ली विश्वविद्यालय हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया या आईआईटी आदि या कोई भी कैंपस हो। इनकी चमक-दमक के पीछे सफाई कर्मचारियों का कठिन परिश्रम छिपा होता है। इसमें महिलाओं की संख्या काफी मात्रा में है। लेकिन इस स्वच्छता की नींव रखने वाली महिला सफाई कर्मचारी अक्सर अदृश्य रह जाती हैं।
दलित समुदाय से आने वाली अधिकांश महिलाएं सदियों पुरानी जातिगत भेदभाव का सामना करती हैं। एक महिला सफाई कर्मचारी जो तेलंगाना, हैदराबाद की हैं और केंद्रीय विश्वविद्यालय में पिछले 4 साल से काम कर रही हैं, बताती है, “हम लोग सुबह क्लासेस शुरू होने से पहले ही कैंपस में आ जाते हैं और सबसे आखिर में जाते हैं। क्लासरूम, हॉस्टल, टॉयलेट सब साफ करते हैं। पर हमारे लिए न साफ़ पानी है, न बैठने के लिए कोई जगह हमें लोग देखकर ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे हम इंसान ही नहीं हैं।” हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में छपे एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 5 मिलियन स्वच्छता कर्मचारी मौजूद हैं, जिनमें से लगभग 2 मिलियन उच्च जोखिम वाले कामों में लगे हुए हैं, जिनमें मानव मल के साथ सीधा संपर्क शामिल है।इन कर्मचारियों पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। इनमें से करीब 40 फीसदी शहरी इलाकों में काम करते हैं और उनमें से लगभग आधी महिलाएं हैं। राज्य व्यवस्था और आम समाज दोनों ही इन्हें बड़े स्तर पर नज़रअंदाज़ करते हैं।
हम लोग सुबह क्लासेस शुरू होने से पहले ही कैंपस में आ जाते हैं और सबसे आखिर में जाते हैं। क्लासरूम, हॉस्टल, टॉयलेट सब साफ करते हैं। पर हमारे लिए न साफ़ पानी है, न बैठने के लिए कोई जगह हमें लोग देखकर ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे हम इंसान ही नहीं हैं।
द हिन्दू में छपी एक खबर के मुताबिक, मद्रास हाई कोर्ट ने साल 2023 में यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास कैंपस में मैनुअल स्कैवेंजिंग की घटना पर गंभीर नोटिस दिया था, जिससे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि कैंपस भी इससे अछूते नहीं हैं। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक, चेन्नई के अंबटूर में साल 2025 में महिला सफाई कर्मचारियों ने पर्यवेक्षकों पर यौन हिंसा के आरोप लगाए और अतिरिक्त काम की शिकायत की, जबकि काकतीय मेडिकल कॉलेज में लगभग 8 महीने सैलरी न मिलने से हड़ताल हुई। महिला सफाई कर्मचारियों को कैंपस में कई चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं, जो शारीरिक से लेकर सामाजिक स्तर तक फैली हैं। एक महिला सफाई कर्मचारी जो तेलंगाना, हैदराबाद की हैं जो तीसरी कक्षा तक पढ़ी हैं, वो केंद्रीय विश्वविद्यालय में पिछले 2 साल से काम कर रही हैं, बताती हैं, “कई बार छात्र शौचालय के भीतर गंदगी छोड़ देते हैं। कई बार नालियों में हाथ डालकर सफाई करनी पड़ती है और दस्ताने तक नहीं दिए जाते। इस तरह काम करने से हमारे स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है जब हम उनसे अपने लिए सुविधा मांगते हैं तो कहा जाता है । यह तुम्हारा ही काम है, ये तो करना ही पड़ेगा।”
लैंगिक समानता के आदर्श बनाम ठेका श्रमिकों की हकीकत
शैक्षणिक कैंपस ज्ञान, प्रगति और समानता के प्रतीक माने जाते हैं, लेकिन यहां काम करने वाली महिला सुरक्षा गार्ड और महिला सफाई कर्मचारियों के अनुभव बताते हैं, कि वास्तविकता इससे काफी अलग है। सुरक्षा गार्ड हों या सफाई कर्मी दोनों वर्ग की महिलाएं बहुस्तरीय चुनौतियों का सामना कर रही हैं। एक ओर उन्हें पितृसत्तात्मक सोच, असुरक्षा, तिरस्कार और कार्यस्थल पर सम्मान की कमी का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य जोखिम, अपर्याप्त सुविधाएं और न्यूनतम वेतन जैसी समस्याएं भी उन्हें परेशान करती हैं। यह शोषण केवल लैंगिक नहीं, बल्कि जाति, वर्ग और ठेका व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के लिए कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।
मेरी कभी-कभी नाइट शिफ्ट में ड्यूटी लगती है, सारी रात वहीं खड़े होकर गुजारनी पड़ती है। रात की ड्यूटी में डर भी लगता है और घर की चिंता बराबर बनी रहती है। पीरियड्स के दौरान रात को नाइट शिफ्ट करते समय सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। हम लोग चाहते हैं कि हमारी नाइट शिफ्ट खत्म कर दी जाए या फिर पीरियड्स के दौरान नाइट शिफ्ट ना लगाई जाए।
कार्यस्थल पर महिलाओं की यौन उत्पीड़न (रोकथाम और निवारण) अधिनियम, 2013 (पॉश एक्ट) के तहत हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) का गठन अनिवार्य है। लेकिन हकीकत यह है कि कोंट्रेक्ट पर काम करने वाली महिला सुरक्षा गार्ड और सफाई कर्मियों को अक्सर इस कानून के बारे में जानकारी ही नहीं दी जाती और न ही उन्हें शिकायत दर्ज कराने के लिए सहज माहौल मिलता है। इस प्रकार श्रम कानून, जैसे न्यूनतम वेतन अधिनियम, समान पारिश्रमिक का सिद्धांत, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े प्रावधान, कागज़ों में तो मौजूद हैं, लेकिन ठेका/अनुबंध प्रणाली के कारण इनका पालन अक्सर कमजोर हो जाता है। ठेका कंपनियों के माध्यम से नियुक्त इन महिलाओं को स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएं बीमा, चिकित्सा सहायता, अवकाश, या सुरक्षा उपकरण अक्सर नहीं मिल पाते, जिससे उनका शोषण और असुरक्षा बढ़ जाती है।
कैंपस को चलने में इन महिला कर्मचारियों का भी उतना ही योगदान हैं, जितना अन्य कर्मचारियों का है। लेकिन इन्हें वह सम्मान, सुविधा और सुरक्षा नहीं मिल पाती है, जिसकी वे हकदार हैं। उनके अनुभव यह दिखाते हैं कि लैंगिक समानता और श्रमिक सम्मान के आदर्शों तक पहुंचने से पहले अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। इसलिए ज़रूरी है कि शैक्षणिक संस्थान नीति, व्यवहार और व्यवस्था तीनों स्तरों पर सुधार लाए, जिससे कैंपस केवल छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि वहां पर कार्यरत हर महिला के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सहयोगी वातावरण बन सके।

