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भारत में मैनुअल स्कैवेंजर्स का रोज़गार और सूखे शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम 1993 और मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 (पीईएमएसआर) के बावजूद आज भी नालियों या मैनहोल की सफाई करते मैनुअल स्कैवेंजर्स दिखाई देते हैं। घर के शौचालय की टंकी की सफाई की जरूरत हो, तो भी किसी सफाई कर्मचारी को बुलाया जाता है जो बिना किसी सफाई उपकरण, सहयोग और उचित मज़दूरी के अपने हाथों से ही सफाई करने को इस जातिवादी समाज में मजबूर हैं। सदियों पुरानी इस पितृसत्तात्मक और जातिवादी प्रथा को भारत में दलित जातियों के लिए तय कर दिया गया है जो कि न सिर्फ जातिगत हिंसा बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन भी है। साथ ही ऐसा करना इसमें शामिल लोगों की गरिमा, शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति से समझौता करना है। महिलाओं का पुरुष सफाई कर्मचारियों की तुलना में अनौपचारिक कार्यबल में प्रतिनिधित्व अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं का पुरुषों की तुलना में आजीविका और आय की चुनौतियों के कारण वे विशेष रूप से असुरक्षित और कमजोर स्थिति में होती हैं।

एसोसिएशन ऑफ रूरल, अर्बन एण्ड नीडी (अरुण), सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीईएस) और वाटरऐड ने साल 2018 में मैनुअल स्कैवेंजिंग में शामिल महिलाओं की स्थिति पर किया। सर्वेक्षण में 14 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 75 प्रतिशत महिलाओं ने सूखे शौचालयों और खुले नालों की मैनुअल सफाई करने की जानकारी दी। पहले से मौजूद ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे और नियमों के कारण इन महिलाओं को ना सिर्फ जाति बल्कि लिंग आधारित भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है। स्वच्छता कर्मचारियों के कल्याण के लिए वैधानिक संस्था, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2017 से भारत में हर पांच दिनों में एक मैनुअल स्कैवेन्जर की मौत हो रही है। सफाई कर्मचारियों/मैनुअल स्कैवेंजर्स पर किया गया हर सर्वेक्षण बताता है कि ये कई पीढ़ियों से इसी काम में लगे हैं। आर्थिक, शैक्षिक या सामाजिक तौर पर पिछड़े होना और इनका सामाजिक बहिष्कार, लिंग और जाति आधारित भेदभाव और हिंसा का प्रचलन इसके प्रमुख कारण हैं।

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क्यों मैनुअल स्कैवेंजिंग महिलाओं के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण है? 

अक्सर, मैनुअल स्कैवेंजर्स अपने शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को नजरंदाज़ कर लगभग हर दिन इस काम को करने के लिए इस जातिवादी व्यवस्था के तहत मजबूर रहते हैं। एसोसिएशन ऑफ रूरल, अर्बन एण्ड नीडी (अरुण), सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज (सीईएस) और वाटरऐड के सर्वेक्षण में शामिल 92 प्रतिशत महिलाओं ने सूखे शौचालयों की सफाई करने की सूचना दी जो अकेले किया जाने वाला एक अमानवीय, कठिन और जोखिम भरा काम है। इस सर्वेक्षण के अनुसार 50 प्रतिशत पुरुषों और महिलाओं ने जातिगत भेदभाव का सामना या अनुभव करने की जानकारी दी। महिलाओं में जातिगत हिंसा और शोषण के प्रति जागरूकता तुलनात्मक रूप से कम या अलग होने के कारण लगभग 65 फीसदी महिलाएँ यह महसूस करती है कि उनके साथ भेदभाव जाति के आधार पर किया जाता है। जबकि पुरुषों में यह 75 प्रतिशत पाया गया।

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मैनुअल स्कैवेंजिंग की सदियों पुरानी इस पितृसत्तात्मक और जातिवादी प्रथा को भारत में दलित-बहुजन जातियों के लिए तय कर दिया गया है जोकि न सिर्फ जातिगत हिंसा बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन भी है।

हालांकि दोनों ही ने अन्य जाति के लोगों द्वारा हिंसा की सूचना दी लेकिन यह संख्या महिलाओं में कहीं अधिक पाई गई। पितृसत्तात्मक समाज में रहने के कारण उन्हें ना सिर्फ काम पर बल्कि घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। सर्वेक्षण के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अलग-अलग जगहों से कहीं ज्यादा हिंसा का सामना करना पड़ा। पीईएमएसआर अधिनियम 2013 के कार्यान्वयन की समीक्षा और चार राज्यों में किया गया अध्ययन महिलाओं का विशेष रूप से मानवीय अपशिष्ट (मैला) ढोने और सूखे शौचालयों की सफाई में संलग्न होने की व्यापकता दर्शाता है। ऐसे में महिलाएं आम तौर पर अकेले नियोक्ता के आमने-सामने आती हैं। इस लिए वे उनके द्वारा किए जाने वाले आर्थिक, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न और हिंसा का अधिक सामना करती हैं।

सर्वेक्षण के दौरान लगभग सभी मैनुअल स्कैवेंजर ने उनका धर्म पूछे जाने पर उन्होंने अपनी जाति और समुदाय का उल्लेख किया। साथ ही, उनका समुदाय पूछे जाने पर कई लोगों ने ‘हिंदू’ होने का ज़िक्र किया। मैनुअल स्कैवेंजिंग में लगे सभी लोगों को अनुसूचित जाति या दलित समुदाय से पाया गया। सर्वेक्षण में भाग लेनेवाले सभी मैनुअल स्कैवेंजर्स में से 91 प्रतिशत या तो कभी स्कूल नहीं गए थे या केवल पांच साल तक स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी। सूखे शौचालयों की सफाई में लगी 92 फीसद महिलाओं ने कभी स्कूल नहीं जाने या सिर्फ पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई करने की जानकारी दी। वहीं, 51 प्रतिशत पुरुषों ने बताया कि वे कभी स्कूल नहीं गए हैं। लगभग 31 प्रतिशत पुरुषों ने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की सूचना दी। अपनी आजीविका चलाने के लिए हर दिन प्रत्येक मैनुअल स्कैवेंजर तीन से छह शौचालयों की सफाई करते हैं। सर्वेक्षण की माने तो, वे मात्र 30 रुपए से 2000 के बीच प्रति माह कमा पाते हैं। कभी-कभी इन्हें पारिश्रमिक के बदले अनाज या रोटियां ही जाती हैं। यह सामाजिक व्यवस्था की विडंबना ही है कि इस गरिमाहीन और अमानवीय काम के बाद भी इनका जातिगत और आर्थिक शोषण किया जाता है। इस भयानक आर्थिक तंगी से जूझते हुए इनके लिए दैनिक कामों, शिक्षा या स्वास्थ्य के लिए खर्च करना लगभग नामुमकिन ही हो जाता है। सामाजिक तौर पर अपनाए ना जाने के कारण मुफ़्त शिक्षा या स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का या तो इन्हें जानकारी नहीं होती या वहां तक पहुंच के रास्ते इनके लिए बंद ही रहते हैं। अकसर, इनके मोहल्लों के नामकरण कर दिए जाते हैं जहां किसी का प्रवेश तक निषेध होता है।

महिला सफाई कर्मचारियों और मैनुअल स्कैवेंजर्स को बतौर नागरिक और श्रमिक अपने अधिकारों का दावा करने, उचित वेतन, कल्याण कार्यक्रमों के लाभ, निर्णायक प्रक्रियाएं और उनके कानूनी समाधान में भेदभाव का सामना करना पड़ता है जबकि श्रमिक संघ इन्हें सुरक्षा प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, लेकिन अमूमन ये संघ स्थायी श्रमिकों के लिए होते हैं। अधिकांश महिलाओं का संविदा कर्मचारी के रूप में काम करने से इन्हें इस सुविधा से वंचित होना पड़ता है। वाटरऐड के सर्वेक्षण के माध्यम से 85 प्रतिशत महिलाओं ने जाति के आधार पर भेदभाव महसूस करने की बात की लेकिन सिर्फ 50 प्रतिशत महिलाओं ने इस काम से मुक्ति और बदलाव की आकांक्षा जताई। सामुदायिक नेतृत्व और पहल की बात करें, तो उनकी भागीदारी और योगदान इसमें मामूली पाया गया। केवल छह महिलाओं ने बताया कि उन्होंने किसी भी प्रकार के अन्याय के मामले में अधिकारियों से संपर्क या शिकायत दर्ज की है। आंकड़ों से पता चलता है कि 85 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि वे अपनी जाति के कारण इस काम में लगी हुई हैं। हालांकि पुरुषों की तुलना में भारी संख्या में महिलाओं ने किसी दूसरे रोज़गार की तलाश करने या मैनुअल स्कैवेंजिंग से बाहर आने की कोशिश करने और गरिमापूर्ण जीवन जीने की इच्छा जाहिर की।

अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था वाटरऐड और अर्बन मैनेजमेंट सेंटर (यूबीसी) ने भारत में कोविड-19 के दौरान सफाई कर्मचारियों के स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और स्वच्छता की चुनौतियों पर एक सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण के अनुसार महिला सफाई कर्मचारियों को अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में रोजगार लाभ, बीमा और अन्य सहायता उपायों के मामले में कम कवरेज मिली। पहले से ही जातिगत शोषण का सामना कर रहे इस समुदाय में महिलाओं की स्थिति और बदतर पाई गई। इनमें सार्वजनिक परिवहन तक पहुंच और कमी के बीच काम पर आने-जाने से अत्यधिक शारीरिक तनाव में माहवारी के दौरान काम करने में कठिनाई शामिल थी। लॉकडाउन में सार्वजनिक शौचालयों पर तालाबंदी के कारण उनका निष्क्रिय होना भी एक अतिरिक्त समस्या पाई गई। इसके अलावा बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का कार्यभार भी उनके लिए चुनौतियों का कारण बना रहा।

जातिवाद और मैनुअल स्कैवेंजिंग

देश में साल 1993 के मैनुअल स्कैवेंजर्स पर अधिनियम के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाथ से मैला ढोने की प्रथा को मानवाधिकार कानून का उल्लंघन बताया है। इस फैसले के बाद कोर्ट ने सभी राज्यों को 1993 से स्कैवेंजिंग करते हुए जान गंवाने वालों की पहचान करने और ऐसे प्रत्येक परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। लेकिन साल 2019 की द वायर की एक रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश राज्यों ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के डेटा उपलब्ध कराने के अनुरोध का आंशिक जवाब दिया है। साथ ही, केवल 20 राज्यों ने इस अनुरोध का कोई भी जवाब दिया है। हमारी जातिवादी सामाजिक व्यवस्था ने इस प्रथा का इतना सामान्यीकरण कर दिया है कि आम जनता को यह सामान्य और उचित लगता है। जातिगत तौर पर सवर्ण जातियों का वर्चस्व बना रहे और वे अपने विशेषाधिकारों के उपभोग करते रहें, इसलिए जातिगत शोषण के आधार पर टिकी यह व्यवस्था रोक के बावजूद चली जा रही है। ऐसे में इन कामगारों का पीढ़ी दर पीढ़ी, अधिनियम के कार्यान्वयन की विफलता और उचित अवसर के अभाव में पिछड़ते जाना ही स्वाभाविक है। आज भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां यह अमानवीय प्रथा खत्म नहीं हुई है।

द डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट अनुसार स्वच्छ भारत अभियान के तहत निर्मित शौचालयों को या तो ट्विन पिट, सेप्टिक टैंकों के साथ सोक पिट, सिंगल पिट्स से जोड़ा गया है या सीवरेज लाइनों से जोड़ा गया है। इनमें ट्विन पिट को छोड़ दोनों प्रकारों में यांत्रिक या मानवीय तरीके से शौचालय को साफ करने की आवश्यकता होती है। ग्रामीण स्तर पर इन शौचालयों की अधिकता होने और यांत्रिक सफाई के लिए सक्शन पंप की कमी के कारण स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में अधिकांश शौचालयों को मैन्युअल तरीके से साफ किया जाएगा। महिलाएं सूखे शौचालयों की सफाई में अधिक शामिल होती हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े होने के कारण दूसरे काम या अवसर की तलाश करने का विशेषाधिकार इनके पास नहीं होता। हालांकि पिछले वर्ष सरकार ने मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को और सख्त बनाने की योजना के लिए विधेयक पेश करने की बात की थी लेकिन देश में लंबे अरसे से विभिन्न अधिनियमों के मौजूद होने के बावजूद मैनुअल स्कैवेंजर्स की सामाजिक, शैक्षिक या आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। जातिवाद और पितृसत्तात्मक सोच की समाप्ति, सामाजिक जागरूकता, मैनुअल स्कैवेंजर्स का पुनर्वास एवं वैकल्पिक रोज़गार और प्रशासनिक जवाबदेही के समन्वय से ही इनका सामूहिक उत्थान संभव है।


तस्वीर साभार : ORF

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