इंटरसेक्शनलजेंडर विकलांग महिलाओं के लिए पीरियड्स देखभाल के नाम पर नियंत्रण, निर्भरता और बहिष्कार

विकलांग महिलाओं के लिए पीरियड्स देखभाल के नाम पर नियंत्रण, निर्भरता और बहिष्कार

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में लगभग 1.8 अरब व्यक्ति हर महीने पीरियड्स का अनुभव करते हैं। लेकिन इनमें से लाखों व्यक्ति इसे गरिमापूर्ण और स्वस्थ तरीके से प्रबंधित करने में असमर्थ हैं।

किसी भी महिला के जीवन में पीरियड्स एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में लगभग 1.8 अरब व्यक्ति हर महीने पीरियड्स का अनुभव करते हैं। लेकिन इनमें से लाखों व्यक्ति इसे गरिमापूर्ण और स्वस्थ तरीके से प्रबंधित करने में असमर्थ हैं। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब हम विकलांग लड़कियों और महिलाओं की बात करते हैं। विकलांग महिलाओं को पीरियड्स से जुड़े प्रबंधन में सामान्य महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक,  सिस्टेमैटिक रिव्यू ऑफ़ मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट नामक शोध में पाया गया कि, विकलांग लड़कियों और महिलाओं के लिए पीरियड्स गहरी शर्म और सामाजिक बहिष्कार का कारण बन जाता है। इस शोध में यह भी सामने आया कि पीरियड्स से जुड़ी चुनौतियों के कारण कई महिलाओं को सामाजिक अलगाव और कुछ मामलों में तो उन्हें जबरन नसबंदी तक का सामना करना पड़ता है। 

दुनिया भर में लगभग 1 अरब लोग विकलांगता के साथ जीवन जी रहे हैं, जिनमें लगभग 10 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं। इसके साथ ही अगर जेंडर के आधार पर देखें तो, विकलांगता महिलाओं और लड़कियों में अधिक पाई जाती है। जहां पुरुषों और लड़कों में यह संभावना लगभग 12 प्रतिशत है। वहीं महिलाओं और लड़कियों में 19 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। विकलांग महिलाओं की समस्याओं को और गहरा करने में पानी, स्वच्छता और साफ़-सफाई की सुविधाओं की अनुपलब्धता एक प्रमुख कारण है। समुदायों, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और सार्वजनिक स्थलों पर विकलांग-अनुकूल शौचालयों और साफ़-सफाई की सुविधाओं का अभाव उन्हें शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक जीवन में पूरी भागीदारी से वंचित करता है। इसके साथ ही, पीरियड्स से जुड़ी शिक्षा का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। यह उनके लिए केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उनके जीवन को प्रभावित करने वाला एक गहरा सामाजिक और मानसिक संकट बन जाता है।

आम दिनों में मुझे चलने-फिरने में जो कठिनाई होती है, उसकी तो मुझे आदत हो चुकी है। लेकिन पीरियड्स के दौरान परेशानी बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है। इस समय हार्मोनल बदलाव के साथ-साथ मेरे पैर में बहुत तेज़ दर्द होता है। चलना, फिरना,उठना-बैठना और शौच जाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

शारिरिक विकलांगता और चुनौतियां 

शारीरिक रूप से विकलांग महिलाओं के लिए पीरियड्स के दौरान सबसे बड़ी चुनौती चलने-फिरने में आने वाली कठिनाई और बुनियादी सुविधाओं की कमी होती है। व्हीलचेयर उपयोग करने वाली या चलने में कठिनाई का सामना करने वाली महिलाओं के लिए शौचालय तक पहुंचना, वहां सुरक्षित रूप से बैठना या खड़े होना, पैड बदलना और साफ़-सफाई बनाए रखना बहुत कठिन होता है। भारत की साल 2011 की जनगणना के अनुसार, विकलांग लोगों का सबसे बड़ा समूह 20.3 फीसदी शारीरिक या चलने में विकलांगता से संबंधित है। ज़्यादातर सार्वजनिक और निजी स्थानों पर बने बाथरूम विकलांग लोगों के अनुकूल नहीं होते, जिससे पीरियड्स के दौरान उनकी निर्भरता और असहजता बढ़ जाती है। वर्ल्ड बैंक की साल 2018 की मेंस्ट्रुअल हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 500 मिलियन महिलाएं पीरियड्स प्रबंधन के लिए पर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं और उत्पादों से वंचित हैं।

 जिस कारण उनमें संक्रमण, स्वास्थ्य जोखिम और सामाजिक अलगाव का खतरा बढ़ जाता है। बिहार के अररिया जिले की रहने वाली अनीता (बदला हुआ नाम) एक घरेलू महिला हैं। पोलियो के कारण उनका एक पैर खराब हो गया है। वह बताती हैं, “आम दिनों में मुझे चलने-फिरने में जो कठिनाई होती है, उसकी तो मुझे आदत हो चुकी है। लेकिन पीरियड्स के दौरान परेशानी बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है। इस समय हार्मोनल बदलाव के साथ-साथ मेरे पैर में बहुत तेज़ दर्द होता है। चलना, फिरना,उठना-बैठना और शौच जाना बहुत मुश्किल हो जाता है।” इस विषय पर आगे वह कहती हैं, “दर्द और कमज़ोरी की वजह से मैं पीरियड्स के दौरान साफ़-सफाई का भी ठीक से ध्यान नहीं रख पाती हूं। कई बार इससे मुझे शर्मिंदगी महसूस होती है। आम दिनों में भी मैं घर से बहुत कम निकलती हूं। लेकिन पीरियड्स के दौरान तो बिल्कुल भी बाहर नहीं जाती।”

पीरियड जागरूकता के अभाव में जब मुझे पहली बार पीरियड हुआ, तो मैं बहुत डर गई थी। मुझे समझ ही नहीं आया कि मेरे साथ क्या हो रहा है। देख नहीं पाने की वजह से मुझे पीरियड की शुरुआत से ही बहुत परेशानी होती थी। उम्र के साथ मुश्किलें और बढ़ती गईं।

दृष्टिबाधित, डीफ और डम्ब महिलाओं की पीरियड्स से जद्दोजहद

अगर बात करें ऐसी महिलाओं की जो देखने में असमर्थ हैं। उनके लिए भी पीरियड्स बहुत चुनौतियों भरा होता है। पीरियड्स में होने वाले दर्द और हार्मोनल बदलाव के साथ -साथ स्वच्छता प्रबंधन भी उनके लिए एक बड़ी और अक्सर अनदेखी चुनौती बन जाती है। भारत में लगभग 18.8 फीसदी  विकलांग लोग देखने संबंधी समस्या से ग्रस्त हैं। लेकिन पीरियड्स से जुड़ी जानकारी और सुविधाएं उनके लिए लगभग अनदेखी ही रह जाती हैं। बिहार के पूर्णिया की रहने वाली 37 वर्षीय सुल्ताना (बदला हुआ नाम) एक अविवाहित घरेलू महिला हैं। वह बताती हैं, “पीरियड जागरूकता के अभाव में जब मुझे पहली बार पीरियड हुआ, तो मैं बहुत डर गई थी। मुझे समझ ही नहीं आया कि मेरे साथ क्या हो रहा है। देख नहीं पाने की वजह से मुझे पीरियड की शुरुआत से ही बहुत परेशानी होती थी। उम्र के साथ मुश्किलें और बढ़ती गईं। जब मैं छोटी थी, तो मेरी माँ मेरा ख्याल रखती थीं। लेकिन माँ के गुजर जाने के बाद मुझे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा। मैं खुद नहीं देख पाती कि खून कितना है या पैड सही तरीके से लगा है या नहीं। कई बार कपड़ों पर धब्बे लग जाते हैं और मुझे बहुत असहजता महसूस होती है।”

वो महिलाएं जिन्हें बोलने और सुनने में परेशानी होती है, उन्हें पीरियड्स के दौरान सबसे बड़ी चुनौती जानकारी और संचार की कमी होती है। भारत में कुल विकलांग जनसंख्या का लगभग 18.9फीसदी डीफ और लगभग 7 फीसदी डम्ब हैं। शोध बताते हैं कि डीफ किशोरियों को पीरियड्स से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी कम होने के कारण वो, दर्द, इंफेक्शन या पीरियड्स में आने वाली अनियमितता जैसी समस्याओं के बारे में डॉक्टर या परिवार से संवाद नहीं कर पातीं। पूर्णिया जिले की रहने वाली 36 वर्षीय रेशमा घरेलू कामगार हैं, उन्हें सुनने और बोलने में कठिनाई होती है। चूंकि रेशमा साफ़ साफ़ बोल नहीं पातीं हैं, इसलिए हमने उनकी माँ से बात की। उनकी माँ कहती हैं, “रेशमा को बचपन से ही सुनने और बोलने में समस्या थी, वो बचपन से गुस्से वाली थी। उसके पीरियड्स आम लड़कियों की तरह समय पर ही शुरू हुए और हर माह समय पर ही आते थे। लेकिन धीरे-धीरे उसका गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगा और उसे पीरियड्स में भी समस्या होने लगी। फिर अचानक ही उसके पीरियड्स बंद हो गए।” जब हमने डॉक्टर से सलाह लेने के बारे में पूछा, तो उनकी माँ ने कहा, “हम बहुत गरीब हैं और रेशमा विकलांग है। हमारे लिए उसका पीरियड्स संभालना बहुत परेशानी वाला था, इसलिए हमने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया।”

रेशमा को बचपन से ही सुनने और बोलने में समस्या थी, वो बचपन से गुस्से वाली थी। उसके पीरियड्स आम लड़कियों की तरह समय पर ही शुरू हुए और हर माह समय पर ही आते थे। लेकिन धीरे-धीरे उसका गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगा और उसे पीरियड्स में भी समस्या होने लगी। फिर अचानक ही उसके पीरियड्स बंद हो गए।

बौद्धिक विकलांग किशोरियों की रोज़मर्रा की जद्दोजहद 

मानसिक या बौद्धिक विकलांगता के साथ रहने वाली महिलाओं और लड़कियों के लिए पीरियड्स प्रबंधन सबसे जटिल चुनौती माना जाता है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन, में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 80.9 फीसदी बौद्धिक विकलांग किशोरियां पीरियड्स को खुद प्रबंधित नहीं कर पाती हैं। जबकि 94.5 फीसदी लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जातीं। दर्द, भारी ब्लीडिंग, थकान और मूड में बदलाव जैसी समस्याएं उनके लिए अधिक भ्रम और तनाव पैदा करती हैं। क्योंकि वो अक्सर ये नहीं समझ पातीं कि उनके शरीर में क्या हो रहा है। पैड बदलना, शौचालय जाना और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। जिससे उन्हें पूरी तरह माँ या देखभाल करने वालों पर निर्भर रहना पड़ता है। बिहार के कटिहार ज़िले की रहने वाली 20 वर्षीय पिंकी मानसिक रूप से अक्षम हैं और पढ़ाई छूटने के बाद से घर पर ही रहती हैं।

 उनकी माँ बताती हैं, “पिंकी धीरे-धीरे पीरियड्स से जुड़ी बातें सीख रही है। शुरुआत में उसे बहुत दिक्कत होती थी।लेकिन अब मैंने उसे पीरियड्स के दौरान होने वाली समस्याएं और साफ सफाई बनाए रखना सिखा दिया है। शुरुआत में हम पिंकी को स्कूल भेजते थे और उसे पढ़ाई में बहुत रुचि थी। लेकिन जब उसे पीरियड्स आने लगे और उसकी मानसिक अक्षमता को लेकर चिंता बढ़ी, तो हमने उसे स्कूल भेजना बंद कर दिया। हमें डर था कि उसकी अक्षमताओं के कारण उसके साथ किसी भी तरह का शोषण हो सकता है।” बिहार के किशनगंज ज़िला की रहने वाली नौ वर्षीय फ़ातिमा की माँ कहती हैं, “फ़ातिमा बचपन से ही दूसरे बच्चों से अलग थी, इसलिए मैंने शुरू से उसकी ज़रूरतों को समझते हुए उसकी विशेष देखभाल की।एक दिन जब उसने अचानक वॉशरूम जाने को कहा, तो मुझे समझ आया कि उसका पीरियड शुरू हो गया है। इतनी कम उम्र में पीरियड शुरू होने से मैं बहुत घबरा गई थी। मुझे लगता है कि फ़ातिमा की देखभाल में किसी भी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। इस दौरान अतिरिक्त सतर्कता बहुत ज़रूरी हो जाती है। मैं हर एक-दो घंटे में उसका पैड बदलती हूं और उसकी साफ़-सफाई का पूरा ध्यान रखती हूं। ताकि उसे कोई असहजता न हो।”

मुझे लगता है कि फ़ातिमा की देखभाल में किसी भी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। इस दौरान अतिरिक्त सतर्कता बहुत ज़रूरी हो जाती है। मैं हर एक-दो घंटे में उसका पैड बदलती हूं और उसकी साफ़-सफाई का पूरा ध्यान रखती हूं। ताकि उसे कोई असहजता न हो।

मानसिक, सामाजिक और कार्यस्थल पर चुनौतियां

विकलांग महिलाओं के लिए पीरियड केवल शारीरिक अनुभव नहीं, बल्कि गहरे मानसिक, सामाजिक और आर्थिक दबावों से जुड़ा एक बहुस्तरीय अनुभव होता है। जब उन्हें अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। कई महिलाएं धीरे-धीरे खुद को बोझ समझने लगती हैं और अपनी असहजता या दर्द व्यक्त करने से बचने लगती हैं। जिससे उन्हें चिंता और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है। जबकि सामाजिक स्तर पर विकलांग महिलाओं की ख़ुद निर्णय लेने की आज़ादी को अक्सर देखभाल के नाम पर सीमित कर दिया जाता है। पीरियड के दौरान उन्हें क्या पहनना है, कहां बैठना है, किससे मिलना है या स्कूल और काम पर जाना है या नहीं, इन सब का फैसला परिवार या देखभाल करने वाले लोग लेते हैं। 

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, विकलांग महिलाओं की श्रम भागीदारी दर सामान्य महिलाओं से काफी कम होती है, और  स्वास्थ्य तथा कार्यस्थल सुविधाओं की कमी उनके रोजगार छोड़ने के जोखिम को और बढ़ा देती है। इससे उनकी आर्थिक सुरक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक स्थिति पर लंबा और गहरा असर पड़ता है।विकलांग महिलाओं और लड़कियों के लिए पीरियड केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, गरिमा और मानवाधिकार से जुड़ा मुद्दा है। शौचालयों और साफ़-सफाई सुविधाओं की कमी, शिक्षा का अभाव और सामाजिक असंवेदनशीलता उनकी मुश्किलों को कई गुना बढ़ा देती है। मानसिक रूप से अक्षम महिलाओं के मामले में यह स्थिति उन्हें शोषण और गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों के खतरे में डाल देती है। इसलिए ज़रूरी है कि पीरियड्स को केवल व्यक्तिगत समस्या न मानकर एक सामाजिक और नीतिगत मुद्दे के रूप में देखा जाए। विकलांग अनुकूल सुविधाएं, समावेशी पीरियड शिक्षा और संवेदनशील देखभाल व्यवस्था न केवल उनकी सेहत, बल्कि उनके आत्मसम्मान और आज़ादी के लिए भी ज़रूरी है। जब तक समाज और व्यवस्था मिलकर उनकी ज़रूरतों को नहीं समझेंगे, तब तक विकलांग महिलाओं की यह अदृश्य पीड़ा यूं ही अनदेखी बनी रहेगी।

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